aankh ki kirkiri by ravindranath tagore
aankh ki kirkiri by ravindranath tagore

जबरदस्ती हाथ छुड़ाकर विनोदिनी चली गई। महेन्द्र सुगंधित तकिए पर सिर रखे बिछावन पर पड़ा रहा। उसके कलेजे में खलबली मच गई। सूनी सांझ, सूना कमरा-नव वसन्त की बयार-विनोदिनी का मन मानो पकड़ में आया-आया; लगा महेन्द्र अब अपने को संयमित नहीं कर पाएगा। जल्दी से उसने बत्ती बुझा दी, दरवाजा बन्द कर लिया और समय से पहले ही बिस्तर पर सो गया!

बिछावन भी तो यह पिछले वाला नहीं। चार-पांच गद्दे पड़े थे। काफी नर्म। एक खुशबू यहां भी। अगरु की, खस की या काहे की थी, ठीक-ठीक समझ में न आई। महेन्द्र बार-बार इस-उस करवट लेटने लगा-मानो कोई भी पुरानी एक निशानी मिले कि उसे जकड़ ले। मगर कुछ भी हाथ न आया।

रात के नौ बजे दरवाजे पर दस्तक पड़ी। बाहर से विनोदिनी ने कहा-“भाई साहब, आपका भोजन। दरवाजा खोलिए!”

महेन्द्र जल्दी से उठा और दरवाजा खोलने के लिए कुंडी पर हाथ लगाया। लेकिन दरवाजे को खोला नहीं, फर्श पर पट पड़ गया। बोला-“नहीं, मुझे भूख नहीं है।”

बाहर से घबराहट भरी आवाज-“तबियत तो खराब नहीं है? पानी ला दूं? और कुछ चाहिए?”

महेन्द्र ने कहा-“नहीं, मुझे नहीं चाहिए।”

विनोदिनी बोली-“आपको हमारी कसम क्या हुआ बताओ! अच्छा चलो तबियत खराब है तो कुंडी तो खोलो।”

महेन्द्र ने जोर से कहा-“उंहूं। नहीं खोलूंगा। तुम जाओ!”

महेन्द्र फिर जाकर अपने बिस्तर पर लेट गया और आशा की स्मृति को सूनी सेज पर टटोलने लगा।

लाख कोशिश करने पर भी जब नींद न आई, तो दवात-कलम लेकर आशा को खत लिखने बैठा। लिखा, “आशा, अब और ज्यादा दिन मुझे अकेला मत छोड़ो-तुम्हारे न रहने से ही मेरी सारी प्रवृत्तियां जंजीर तोड़कर मुझे न जाने कहां खींच ले जाना चाहती हैं! जिससे राह देख-देखकर चलूं वह रोशनी कहां? वह रोशनी तो तुम्हारी विश्वास-भरी आंखों की प्रेमपूर्ण दृष्टि है। मेरी मंगल, ध्रुव,- तुम जल्दी चली आओ! मुझे अविचल बनाओ, मुझे बचाओ, मेरे हृदय को भर दो।”

महेन्द्र न जाने कब तक लिखता रहा। दूर और दूर के कई गिरजों की घड़ियों में तीन बजे। कलकत्ता की सड़कों पर गाड़ियों की घड़घड़ाहट थम चुकी थी, मुहल्ले के उस छोर पर किसी नटी के कंठ से विहाग की जो तान उठ रही थी, वह भी सारी दुनिया पर फैली हुई शांति और नींद में बिलकुल डूब गई। आशा को हृदय से याद करके और मन के आवेग को लंबे पत्र में जाहिर करके महेन्द्र को काफी राहत मिली और लेटते ही उसे नींद आने में देर न लगी।

सुबह उसकी नींद खुली तो बेला हो आई थी। कमरे में धूप आ रही थी।

महेन्द्र जल्दी से उठ बैठा; रात की बातें मन में हल्की हो गई थीं। देखा, रात की लिखी चिट्ठी दवात से दबी तिपाई पर पड़ी है। उसे फिर से पढ़ गया। उसे लगा-‘अरे, यह किया क्या मैंने! यह तो मानो उपन्यास का वृतांत हो गया। गनीमत कहो कि भेजी नहीं। क्या सोचती आशा मन में! आधी तो वह समझती ही नहीं।’

रात को जो आवेग बे-हिसाब बढ़ गया था, उसकी याद आते ही महेन्द्र शर्मसार हो गया। चिट्ठी के टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिए। सरल भाषा में आशा को एक छोटा-सा पत्र लिखा-

“और कितनी देर करोगी तुम? तुम्हारे बड़े चाचा के आने में अगर विलंब हो तो मुझे वैसा लिखो। मैं खुद आकर तुम्हें ले जाऊंगा। अकेले मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।”

महेन्द्र वापस गया और कुछ ही दिनों के बाद आशा काशी पहुंच गई, इससे अन्नपूर्णा को बड़ी आशंका हुई। आशा से वह तरह-तरह के सवाल पूछने लगी-

“क्यों री चुन्नी, और तेरी वह आंख की किरकिरी! तेरी राय में जिसके मुकाबले दूसरी गुणवंती नहीं?”

“सच मौसी, मैंने बढ़ाकर बिलकुल नहीं कहा है। जैसी बुद्धि, वैसा ही रूप। काम-काज में उतनी ही कुशल।”

“तेरी तो सखी ठहरी। तू तो गुणवंती बताएगी ही। घर के और दूसरे लोग क्या कहते हैं?”

“मां तो उसकी तारीफ करते नहीं थकतीं कभी। जब भी वह अपने घर जाने को कहती है, मां परेशान हो उठती हैं। उसके जैसी सेवा कोई नहीं कर सकता। घर की नौकर-नौकरानी भी बीमार पड़ जाएं, तो मां-सी, बहन-सी उसकी सेवा करती है।”

“और महेन्द्र की क्या राय है?”

“उन्हें तो तुम जानती ही हो, निहायत अपना कोई न हो तो उन्हें नहीं जंचता। हर कोई उसे चाहता है, लेकिन उनसे अब तक ठीक पटरी नहीं बैठी।”

“सो क्यों?”

“जोर-जबरदस्ती मैं कभी मिला भी देती हूं, पर बोल-चाल लगभग बन्द ही समझो! कितने कम बोलने वाले हैं, मालूम ही है तुम्हें। लोग समझते हैं, दंभी हैं। मगर बात वैसी नहीं, दो-एक खास-खास आदमियों के सिवा औरों को वे बर्दाश्त नहीं कर पाते।”

अंतिम बात कहकर आशा को अचानक लाज लगी-दोनों गाल तमतमा उठे। अन्नपूर्णा खुश होकर मन ही मन हंसी। बोली-“ठीक कहती हो, महेन्द्र जब आया था यहां, उसका नाम कभी उसकी जबान पर भी न आया।”

आशा ने दुःखी होकर कहा-“यही उनमें खामी है। जिसे नहीं चाहते वह मानो है ही नहीं। उसे मानो न कभी देखा, न जाना।” शांत स्निग्ध मुस्कान से अन्नपूर्णा ने कहा-“और जिसे चाहता है, मानो जन्म-जमान्तर उसी को देखता-जानता रहा है, यह भाव भी उसमें है, है न चुन्नी?”

आशा ने उत्तर न देकर नजर झुका ली।

अन्नपूर्णा ने पूछा-“और बिहारी का क्या हाल है, चुन्नी? वह शादी करेगा ही नहीं?”

सुनते ही आशा का चेहरा गम्भीर हो गया। वह सोच ही न पाई कि क्या जवाब दे।

आशा को निरुत्तर देखकर अन्नपूर्णा घबरा गई। पूछा। “सच-सच बता चुन्नी, बिहारी बीमार-वीमार तो नहीं हैं।”

आशा ने कहा-‘देख मौसी उनकी बात उन्हीं से पूछ।’

अचरज से अन्नपूर्णा ने कहा-“क्यों?”

आशा बोली-“यह मैं नहीं बता सकती।” कहकर वह कमरे से बाहर चली गई।

अन्नपूर्णा चुपचाप बैठी सोचने लगीं-हीरे जैसा लड़का बिहारी, कैसा हो गया है कि उसका नाम सुनते ही चुन्नी उठकर बाहर चली गई! किस्मत का फेर!

सांझ को अन्नपूर्णा पूजा पर बैठी थीं कि कोई गाड़ी बाहर आकर रुकी। गाड़ीवान घर वाले को पुकारता हुआ दरवाजे पर थपकी देने लगा। पूजा करती हुई अन्नपूर्णा बोल उठी-“अरे लो! मैं तो भूल ही गई थी एकबारगी। आज कुंज की सास और उसकी बहन की दो लड़कियों के आने की बात थी इलाहाबाद से। शायद आ गई सब। चुन्नी बत्ती लेकर दरवाजा खोल जरा!”

लालटेन लिये आशा ने दरवाजा खोल दिया। बाहर बिहारी खड़ा है। वह बोल उठा-“अरे, यह क्या भाभी, मैंने तो सुना था, तुम काशी नहीं आओगी?”

आशा के हाथ से लालटेन छूट गई। उसे मानो भूत दिख गया। एक सांस में वह दुतल्ले पर भागी और घबराकर चीख पड़ी-“मौसी! तुम्हारे पैर पड़ती हूं मैं, इनसे कह दो, आज ही चले जाएं।”

पूजा के आसन पर अन्नपूर्णा चौंक उठीं। कहा-“अरे, किनसे कह दूं चुन्नी, किनसे?”

आशा ने कहा-“बिहारी बाबू यहां भी आ गए!”

और बगल के कमरे में जाकर उसने दरवाजा बंद कर लिया।

नीचे खड़े बिहारी ने सब सुन लिया। वह उल्टे पांवों भाग जाने को तैयार हो गया लेकिन पूजा छोड़कर अन्नपूर्णा जब नीचे उतर आई तो देखा, बिहारी दरवाजे के पास जमीन पर बैठा है-उसके शरीर की सारी शक्ति चली गई है।

वह रोशनी नहीं ले आई थीं। अंधेरे में बिहारी के चेहरे का भाव न देख सकी, बिहारी भी उन्हें न देख सका।

अन्नपूर्णा ने आवाज दी-“बिहारी!”

बिहारी का बेबस शरीर एड़ी से चोटी तक बिजली की चोट से चौंक पड़ा। बोला-“चाची, बस, और एक शब्द भी न कहो, मैं चला।”

बिहारी ने जमीन पर ही माथा टेका, अन्नपूर्णा के पांव भी न छुए। मां जिस तरह गंगासागर में बच्चे को डाल आती है, अन्नपूर्णा ने उसी तरह रात के उस अंधेरे में चुपचाप बिहारी का विसर्जन किया-पलटकर उसे पुकारा नहीं। देखते ही देखते गाड़ी बिहारी को लेकर ओझल हो गई।

आशा ने उसी रात महेन्द्र को पत्र लिखा-

“आज शाम को एकाएक बिहारी यहां आए थे। बड़े चाचा कब तक कलकत्ता लौटेंगे, ठिकाना नहीं। तुम जल्दी आकर मुझे यहां से ले जाओ?”

उस दिन रात तक जागते रहने और भारी आवेग के कारण सुबह महेन्द्र में एक अवसाद तारी था। फागुन के अधबीच-गर्मी पड़नी शुरू हो गई थी। और सवेरे महेन्द्र अपने सोने के कमरे के एक ओर बैठ कर पढ़ता था। आज वह तकिए के सहारे फर्श पर पड़ा रहा। बेला हो आई, नहाने नहीं गया। रास्ते में फेरी वाले आवाज लगाते हुए गुजरने लगे। दफ्तर जाने वाली गाड़ियों की अविराम गड़गड़ाहट। पड़ोसी का नया मकान खड़ा हो रहा था। मजदूरिनें छत की कुटाई की ताल पर एक स्वर से गाने लगीं। हल्की गर्म दक्खिनी बयार से महेन्द्र की दुखती नसें शिथिल हो आई थीं। कोई कठिन निश्चय, कोई दुरूह चेष्टा, मन से जूझना आज के इस अलसाए, गिरे-गिरे से वसंत के दिन के लायक न था।

“भाई साहब, आज हो क्या गया तुम्हें? नहाओगे नहीं, खाना तैयार है। अरे, सो रहे हो! तबियत खराब है? सिर दु:ख रहा है?”-और, पास आकर विनोदिनी ने उसके माथे पर हाथ रखा।

अधमुंदी आंखों और लड़खड़ाई आवाज में महेन्द्र ने कहा-“आज तबियत कुछ अच्छी नहीं- नहाऊंगा नहीं आज।”

विनोदिनी बोली-“न नहाओगे, तो थोड़ा-सा खा लो!”

ज़िद करके विनोदिनी उसे रसोई में ले गई और बड़े जतन और आग्रह से खिलाया।

खा-पीकर महेन्द्र फिर आकर लेट गया। विनोदिनी उसके सिरहाने बैठकर धीरे-धीरे सिर दबाने लगी! आंखें बन्द किये महेन्द्र ने कहा-“तुमने अभी खाया नहीं है, भई किरकिरी! जाओ, खा लो!”

मगर विनोदिनी न गई। अलसाई दोपहरी के गर्म झोंकों से घर के परदे उड़ने लगे, दीवार के पास वाले नारियल के पेड़ की बेमानी मरमराहट कमरे में आने लगी। महेन्द्र का कलेजा जोर-जोर से थिरकने लगा और विनोदिनी का घना निश्वास उसी ताल पर महेन्द्र के कपाल पर पड़े बालों को नचाता रहा। किसी के भी गले से एक शब्द न निकला। महेन्द्र सोचने लगा-“ओर छोर-हीन इस संसार के अनंत स्त्रोत में बहा जा रहा हूं, जरा देर के लिए कभी कहीं नाव अगर किनारे पर लगे तो उससे किसी का क्या आता-जाता है, और कितने दिनों के लिए!”

सिरहाने बैठी महेन्द्र का सिर सहलाती विनोदिनी का सिर विह्वल यौवन के भार से धीरे-धीरे झुका जा रहा था और अन्त तक उसकी लटों की नोक महेन्द्र के कपोल को छूने लगीं। हवा से हिलती हुई लटों के कोमल स्पर्श से उसका सारा शरीर रह-रहकर कांप उठने लगा, सांस मानो कलेजे के पास रुक गई, बाहर निकलने की राह न मिली। महेन्द्र झटपट उठ बैठा। बोला-“न, मेरी क्लास है। कालेज चलूं!”

कहकर वह विनोदिनी की तरफ ताके बिना खड़ा हो गया।

विनोदिनी बोली-“परेशान न हो, कपड़े मैं ला देती हूं।”

जाकर वह महेन्द्र के कालेज जाने के कपड़े ले आई।

महेन्द्र जल्दी-जल्दी चला गया, लेकिन कालेज में मन न लगा। देर तक पढ़ने में जी लगाने की कोशिश की मगर बेकार। आखिर जल्दी ही घर लौट आया।

कमरे में दाखिल हुआ तो देखा, पेट के नीचे तकिया रखे जमीन पर बैठी विनोदिनी कोई किताब पढ़ रहीं है-घने काले बालों का ढेर उसकी पीठ पर बिखरा पड़ा है। महेन्द्र के जूतों की आवाज शायद उसे सुनाई नहीं दी। पैर दबाकर महेन्द्र उसके करीब जा खड़ा हुआ। पढ़ते-पढ़ते उसने विनोदिनी को एक दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए देखा।

महेन्द्र ने कहा-“अरी ओ करुणामयी, कल्पना की दुनिया के लिए हृदय की फिजूलखर्ची मत करो! पढ़ क्या रही हो?”

घबराकर विनोदिनी उठ बैठी। किताब अपने आंचल में छिपा ली। महेन्द्र ने झपटकर छीनने की कोशिश की। देर तक हाथापाई, छीना-झपटी के बाद महेन्द्र ने विनोदिनी से किताब छीन ली। देखा बंकिम बाबू की लिखी ‘विषवृक्ष’ थी। जल्दी-जल्दी सांस लेती हुई गुस्से में मुंह फेरकर विनोदिनी चुप हो रही।

महेन्द्र के कलेजे में बेहद उथल-पुथल मची थी। बड़ी कोशिश के बाद वह हंसकर बोला-“जा, बेहद छका दिया। मैंने सोचा था, कुछ बड़ी ही गोपनीय चीज होगी और पहाड़ खोदने के बाद निकली क्या, चुहिया ही न! बंकिम बाबू का ‘विषवृक्ष’?”

विनोदिनी बोली-“मेरे पास भला क्या गोपनीय हो सकता है, सुनूं तो जरा।”

महेन्द्र फट से कह उठा-“कहीं बिहारी की चिट्ठी आई होती!”

पल में विनोदिनी की निगाह से बिजली छिटक पड़ी। अब तक मानो कामदेव कमरे के कोने में खिलवाड़ कर रहा था-वह मानो दूसरी बार जलकर राख हो गया। जलती हुई एक चपट की तरह विनोदिनी लम्हे-भर में उठ खड़ी हुई। उसकी कलाई पकड़कर महेन्द्र ने जहां-“माफ करो, मैंने मजाक किया था।”

विनोदिनी ने तेजी से अपनी कलाई छुड़ा ली और कहा-“मजाक आखिर किसका! उनसे मैत्री के योग्य होते, तो मैं मजाक सह लेती। तुम्हारा दिल बड़ा छोटा है-मैत्री करने की जुर्रत नहीं, फिर मजाक!”

विनोदिनी चलने लगी। महेन्द्र ने दोनों हाथों से उसके पैर थाम लिए।

ठीक इसी समय सामने एक छाया दिखी। महेन्द्र ने चौंककर उसके पैर छोड़ दिए। देखा, बिहारी खड़ा था।

बिहारी ने अपनी स्थिर दृष्टि से दोनों को जलाते हुए शांत और धीर स्वर से कहा-“बड़े बेमौके आ पहुंचा मैं। खैर। ज्यादा देर ठहरना नहीं हैं। एक बात कहनी थी। मैं काशी गया था। पता नहीं था कि भाभी वहां हैं। अनजाने उनके प्रति यह कसूर हो गया। उनसे माफी मांगने का अवसर नहीं है, सो तुमसे मांगने आया हूं। जाने-अंजाने अगर कभी मेरे मन को कोई पाप छू गया हो, तो उसके लिए उन्हें भी कोई दु:ख न सहना पड़े, तुमसे यही मेरी विनती है।”

अचानक बिहारी के सामने उसकी कमजोरी जाहिर हो गई, इससे महेन्द्र का मन दहक उठा। अभी उदार बनने का मौका न था। वह जरा हंसकर बोला, “एक कहावत है-ठाकुर घर में कौन? मैंने तो केला नहीं खाया। तुम्हारा ठीक वही हाल है। मैंने न तो तुम्हें दोष मानने को कहा, न इन्कार करने को ही। फिर माफी मांगकर साधु बनने क्यों आए?”

बिहारी कुछ देर खड़ा रहा। फिर जवाब देने की जोरदार कोशिश से उसके होंठ कांप उठे, तो विनोदिनी बोल पड़ी-“बिहारी बाबू, तुम कोई जवाब मत दो-कुछ मत कहो! यह आदमी जो कुछ भी जबान पर लाया, वह उसी के मुंह का कलंक हो रहा है- वह कलंक तुम्हें नहीं छू पाया है।”

जाने विनोदिनी का कहा बिहारी के कानों तक पहुंचा या नहीं-जैसे, स्वप्न में चलता हो, वह वहां से सीढ़ियों पर होकर नीचे उतरने लगा।

विनोदिनी पीछे लगी हुई गई। कहा-“भाई साहब, मुझसे तुम्हें कुछ भी नहीं कहना है? झिड़कना हो तो झिड़को!”

बिहारी फिर भी जब कुछ न बोला और आगे ही बढ़ने लगा तो विनोदिनी ने आगे आकर दोनों हाथों से उसके दाएं हाथ को कसकर पकड़ लिया। बेहद नफरत से उसे झटककर बिहारी चला गया। उसे यह भी न मालूम हुआ कि उस झटके से विनोदिनी गिर पड़ी। गिरने की आवाज सुनकर महेन्द्र दौड़ा आया। विनोदिनी के बाएं हाथ की कोहनी फूट गई थी। लहू बह रहा था।

महेन्द्र बोला-“उफ, काफी कट गया है!” और अपने महीन कुरते से थोड़ा-सा कपड़ा फाड़कर महेन्द्र ने वहां पट्टी बांध देनी चाही।