aankh ki kirkiri by ravindranath tagore
aankh ki kirkiri by ravindranath tagore

विनोदिनी सम्हलकर बैठी। पूछा-“जी! महेन्द्र बाबू!”

महेन्द्र बाबू ने कहा-“अजीब मुसीबत है! ये हजरत महेन्द्र बाबू कब से हो गए!”

अपनी सिलाई में आंखें गड़ाए हुए ही विनोदिनी बोली-“फिर क्या कहकर पुकारूं आपको?”

महेन्द्र ने कहा-“जिस नाम से अपनी सखी को पुकारती हो-“आंख की किरकिरी!”

और दिन की तरह विनोदिनी ने मजाक करके कोई जवाब न दिया। वह अपनी सिलाई में लगी रही।

महेन्द्र ने कहा-“लगता है, वही सच्चा रिश्ता है, तभी तो दुबारा जुड़ पा रहा है।”

विनोदिनी जरा रुकी। सिलाई के किनारे से बढ़ रहे धागे के छोर को दांतों से काटती हुई बोली-“मुझे क्या पता, आप जानें!”

और दूसरे जवाबों को टालकर गम्भीरता से पूछ बैठी-“कालेज से एकाएक कैसे लौट आए।”

महेन्द्र बोला-“केवल लाश की चीर-फाड़ से कब तक चलेगा?”

विनोदिनी ने फिर दांत से सूत काटा और उसी तरह सिर झुकाए हुए बोली-“तो अब जीवन की जरूरत है?”

महेन्द्र ने सोचा था, “आज विनोदिनी से बड़े सहज ढंग से हंसी-मज़ाक करूंगा-लेकिन बोझ इतना हो गया कि लाख कोशिश करके भी हल्का जवाब जुबान पर न आ सका। विनोदिनी आज कैसी दूरी रख कर चल रही है, यह देखकर महेन्द्र उद्वेलित हो गया। इच्छा होने लगी, एक झटके से इस रुकावट को मटियामेट कर दे। उसने विनोदिनी की कटी हुई वाक्य-चिकोटी का कोई जवाब न दिया- अचानक उसके पास जा बैठा। बोला-“तुम हम लोगों को छोड़कर जा क्यों रही हो? कोई अपराध हो गया है मुझसे!”

विनोदिनी इस पर जरा झिझक गई। सिलाई से सिर उठाकर उसने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें महेन्द्र की ओर लगाकर कहा-“काम-धंधा तो हर किसी को है। आप सब छोड़कर कहीं और रहने चले गए। वह क्या किसी अपराध से कम है।”

महेन्द्र को कोई अच्छा जवाब ढूंढ़ें न मिला। जरा देर चुप रहकर पूछा-“ऐसा क्या काम पड़ा है कि गए बिना होगा ही नहीं?”

बड़ी सावधानी से सुई में धागा डालती हुई वह बोली-“काम है या नहीं, यह मैं ही जानती हूं। आपको उसकी फेहरिस्त क्या दूं!”

महेन्द्र खिड़की से बाहर चिन्तित-सा बड़ी देर तक एक नारियल की फुनगी पर नजर टिकाए चुप बैठा रहा। विनोदिनी चुपचाप सिलाई करती रही। यह हाल कि फर्श पर सुई गिरे, तो आवाज सुनाई दे! बड़ी देर बाद महेन्द्र अचानक बोल उठा। हठात् जो निस्तब्धता भंग हुई, विनोदिनी चौंक पड़ी, उसकी उंगली में सुई चुभ गई।

महेन्द्र ने पूछा-“किसी भी तरह से न रुक सकोगी?”

सुई चुभी अंगुली का खून चूसती हुई विनोदिनी ने कहा-“विनती किस बात की? मैं रही न रही, आपको क्या फर्क पड़ता है।”

कहते-कहते उसका गला भर आया। सिर झुकाकर वह सिलाई में लग गई। लगा, उसकी पलकों की कोर में आंखों की हल्की-सी रेखा झलक पड़ी है। माघ का अपराह्न उधर शाम के अंधेरे में खोने लगा था।

लमहे भर में महेन्द्र ने विनोदिनी का हाथ दबाकर रुंधे और सजल स्वर में कहा, “अगर इससे मेरा कुछ बिगड़ता हो तो रुकोगी।”

विनोदिनी ने झट से हाथ छुड़ा लिया। थोडा सरककर बैठ गई। महेन्द्र चौंका। अपनी अन्तिम बात अपने ही कानों में व्यंग जैसी गूंजती रही। दोषी जीभ को उसने दांत से काटा। फिर कुछ कहते न बना।

घर में सन्नाटा छाया था, तभी आशा आ गई। विनोदिनी झट कह उठी, “खैर, तुम लोगों ने जब मेरी अकड़ इतनी बढ़ा रखी है, तो मेरा भी फर्ज है कि तुम लोगों की एक बात मान लूं। जब तक विदा नहीं करोगे, मैं यहीं रहूंगी।”

पति की कामयाबी से फूली न समाती हुई आशा सखी से लिपट गई। बोली-“तो फिर यही पक्का रहा! तीन बार कबूल करो कि जब तक हम विदा नहीं करते, तब तक रहोगी, रहोगी, रहोगी।”

विनोदिनी ने तीन बार कबूल किया। आशा ने कहा-“भई किरकिरी, रहना तो पड़ा, फिर नाकों चने क्यों चबवाये? अन्त में मेरे पति से हार माननी ही पड़ी?”

विनोदिनी हंसकर बोली-“भाई साहब, हार मैंने मानी कि तुमने मानी?”

महेन्द्र को जैसे काठ मार गया हो। लग रहा था, जैसे उनका अपराध तमाम कमरों में बिखरा पड़ा है। उसने गम्भीर होकर कहा-“हार तो मेरी ही हुई है।”

और वह कमरे से बाहर चला गया।

और दूसरे ही क्षण फिर अन्दर आया। आकर विनोदिनी से कहा-“मुझे माफ कर दो!”

विनोदिनी बोली-“क्या कसूर किया है तुमने, लालाजी?”

महेन्द्र बोला-“तुम्हें यों जबरदस्ती यहां रोक रखने का हमें कोई अधिकार नहीं।”

विनोदिनी हंसकर बोली-“जबरदस्ती कहां की है? प्यार से सीधी तरह ही तो रहने को कहा-“यह जबरदस्ती थोड़े है।”

आशा सोलहों आने सहमत होकर बोली-“हर्गिज नहीं।”

विनोदिनी ने कहा-“भाई साहब, तुम्हारी इच्छा है, मैं रहूं। मेरे जाने से तुम्हें तकलीफ होगी-यह तो मेरी खुशकिस्मती है। क्यों भई किरकिरी, ऐसे सहृदय दुनिया में मिलते कितने हैं? और दुःख में दु:खी, सुख में सुखी भाग्य से कोई मिला, तो मैं ही उसे छोड़कर जाने को क्यों उतावली होऊं?”

पति को चुप रहते देख आशा ज़रा खिन्न मन से बोली- “बातों में तुमसे कौन जीते? मेरे स्वामी तो हार मान गए, अब जरा रुक भी जाओ।”

महेन्द्र फिर तेजी से बाहर हो गया। उधर बिहारी कुछ देर राजलक्ष्मी से बातचीत करके महेन्द्र की ओर आ रहा था। दरवाजे पर ज्योंही बिहारी पर नजर पड़ी, महेन्द्र बोल उठा-“भाई बिहारी, मुझ-सा नालायक दुनिया में दूसरा नहीं।”

उसने कुछ ऐसे कहा कि वह बात कमरे में पहुंच गई।

अन्दर से उसी दम पुकार हुई-“बिहारी बाबू?”

बिहारी ने कहा-“अभी आया, विनोद-भाभी!”

कमरे में जाते ही बिहारी ने तुरंत आशा की तरफ देखा- घूंघट में से जितना-भर दिखाई पड़ा, उसमें विषाद या वेदना की कोई निशानी ही न थी। आशा उठकर जाने लगी। विनोदिनी उसे पकड़े रही। कहा-“यह तो बताएं भाई साहब, मेरी आंखों की किरकिरी से आपका सौत का नाता है क्या? आपको देखते ही वह भाग क्यों जाना चाहती है?”

आशा ने शर्माकर विनोदिनी को झिड़का।

बिहारी ने हंसकर कहा-“इसलिए कि विधाता ने मुझे वैसा खूबसूरत नहीं बनाया है।”

विनोदिनी-“देख लिया भई किरकिरी, बिहारी बाबू किस कदर बचाकर बात करना जानते हैं! इन्होंने तुम्हारी पसन्द को दोष नहीं दिया, दिया विधाता को। लक्ष्मण जैसे सुलक्षण देवर को पाकर तुझे आदर करना न आया, तेरी ही तकदीर खोटी है।”

बिहारी-“इस पर तुम्हें अगर तरस आये विनोद भाभी, तो फिर मुझे शिकवा ही क्या रहे!”

विनोदिनी-“समुद्र तो है ही, फिर भी बादलों के बरसे बिना चातक की प्यास क्यों नहीं मिटती?”

आशा को आखिर रोककर न रखा जा सका। वह जबरदस्ती हाथ छुड़ाकर चली गई। बिहारी भी जाना चाह रहा था। विनोदिनी ने कहा-“महेन्द्र बाबू को क्या हुआ है, कह सकते हैं आप?”

बिहारी ठिठक पड़ा। बोला-“मुझे तो कुछ पता नहीं, कुछ हुआ है क्या?”

विनोदिनीं-“पता नहीं, मुझे तो ठीक नहीं दीखता।”

उत्सुक होकर बिहारी कुर्सी पर बैठ गया। पूरी तरह सुन लेने के ख्याल से वह उन्मुख होकर विनोदिनी की ओर ताकता रहा। विनोदिनी कुछ न बोली। मन लगाकर चादर सीने लगी।

कुछ देर रुककर वह बोला, “तुमने महेन्द्र में खास कुछ गौर किया क्या?”

विनोदिनी बड़े सहज भाव से बोली-“क्या जानें, मुझे तो ठीक नहीं दीखता। मुझे तो अपनी किरकिरी के लिए फिक्र होती है।” -और एक लम्बी उसांस लेकर वह सिलाई छोड़कर जाने लगी।

बिहारी ने व्यस्त होकर कहा-“जरा बैठो, भाभी!”

विनोदिनी ने कमरे के सारे खिड़की-किवाड़ खोल दिए। लालटेन की बत्ती बढ़ा दी और सिलाई का सामान लिये बिस्तर के उस छोर पर जा बैठी। बोली-“मैं तो यहां सदा रहूंगी नहीं-मेरे चले जाने पर मेरी किरकिरी का खयाल रखना-वह बेचारी दुःखी न हो।”

कहकर मन के उद्वेग को जब्त करने के लिए उसने मुंह फेर लिया।

बिहारी बोल पड़ा-“भाभी, तुम्हें रहना ही पड़ेगा। तुम्हारा अपना कहने को कोई नहीं-इस भोली लड़की को सुख-दुःख में बचाने का भार तुम लो-कहीं तुम छोड़ गई, तो फिर कोई चारा नहीं।”

विनोदिनी-“भाई साहब, दुनिया का हाल तुमसे छिपा नहीं। मैं यहां सदा कैसे रह सकती हूं? लोग क्या कहेंगे?”