vinod kumar shukla
vinod kumar shukla

Summary: विनोद कुमार शुक्ल और हिंदी साहित्य की धीमी, गहरी आवाज़

साधारण जीवन, छोटे कमरे और चुप रिश्तों की गहराइयों को बेहद सादगी और संवेदनशीलता के साथ शब्दों में उतारने वाले विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएँ आज भी पाठकों के दिलों में गूंजती हैं। ‘नौकर की कमीज़’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ जैसी किताबों में यही उनकी खास पहचान देखने को मिलती है।

‘नौकर की कमीज़’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘एक चुप्पी जगह’ जैसी कृतियों से हिंदी साहित्य को एक अनोखी, भीतर तक उतरने वाली भाषा देने वाले विनोद कुमार शुक्ल भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी उसी सादगी और संवेदनशीलता के साथ हमारे जीवन से संवाद करती हैं। वे उन लेखकों में थे जिनके शब्द ऊँची आवाज़ में नहीं बोले, पर साधारण जीवन, मध्यवर्गीय दुनिया और चुप रिश्तों की गहराइयों को बेहद जादुई ढंग से उजागर कर गए।

1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में थे, जिनकी पहचान किसी बड़े आंदोलन या घोषणापत्र से नहीं, बल्कि साधारण जीवन की असाधारण अभिव्यक्ति से बनी। वे धीमे बोलते थे, कम बोलते थे, लेकिन जो कहते थे वह देर तक ठहरता था। मध्यवर्गीय जीवन, छोटे घर, सीमित इच्छाएँ, चुप्पी में पलते रिश्ते यही उनका संसार था और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत भी।

1971 में प्रकाशित उनका पहला कविता संग्रह ‘लगभग जय हिन्द’ हिंदी कविता में एक नई तरह की चुप्पी और कोमलता लेकर आया। इसके बाद ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह’ जैसी कृतियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि शुक्ल की भाषा किसी स्थापित ढांचे में बंधने वाली नहीं है। उनकी कविताएँ शब्दों से ज़्यादा खाली जगहों में बोलती हैं जहाँ पाठक खुद को पहचान लेता है।

1979 में प्रकाशित उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ ने हिंदी कथा-साहित्य को एक नया मोड़ दिया। यह उपन्यास नायकत्व, संघर्ष या क्रांति की कहानी नहीं कहता, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में छिपी असहजता, थकान और आत्मसम्मान को बेहद सहज ढंग से सामने रखता है। मणि कौल द्वारा इस उपन्यास पर बनाई गई फिल्म ने इसकी संवेदनात्मक गहराई को और व्यापक पहचान दी।

Deewar Mein Ek Khirkee Rahati Thi
Deewar Mein Ek Khirkee Rahati Thi

‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ विनोद कुमार शुक्ल का वह उपन्यास है, जिसने साबित कर दिया कि बिना किसी बड़े घटनाक्रम के भी गहरी कथा कही जा सकती है। रघुवीर प्रसाद और उनकी पत्नी सोंसी एक छोटे से कमरे में रहने वाला दंपती जिसके पास बस एक बिस्तर, पानी का घड़ा, कुछ बर्तन और एक टीन का डिब्बा है। लेकिन इसी सीमित दुनिया में एक खिड़की है जो दीवार में रहते हुए भी खुले आकाश तक जाती है। यह खिड़की प्रेम, धैर्य और मनुष्य की आंतरिक आज़ादी का प्रतीक बन जाती है। यही वजह है कि यह उपन्यास पाठक के भीतर बहुत देर तक खुला रहता है।

विनोद कुमार शुक्ल के लेखन को अक्सर जादुई यथार्थवाद के करीब माना गया, लेकिन उनका जादू किसी चमत्कार में नहीं बल्कि साधारणपन में था। वे जीवन को सजाकर नहीं, उसी रूप में रखते थे जैसा वह है थोड़ा अधूरा, थोड़ा थका हुआ, लेकिन पूरी तरह मानवीय। उनकी कहानियाँ और उपन्यास पाठक से कुछ साबित करने की कोशिश नहीं करते, बस साथ बैठ जाते हैं।

विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ से आने वाले पहले लेखक बने जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मार्च 2025 में उन्हें 59वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार घोषित किया गया और 21 नवंबर 2025 को रायपुर स्थित उनके निवास पर आयोजित एक विशेष समारोह में यह सम्मान उन्हें प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पेन-नाबोकोव अवॉर्ड, शिखर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया।

23 दिसंबर 2025 को उनका जाना हिंदी साहित्य के लिए एक गहरी खामोशी छोड़ गया लेकिन विनोद कुमार शुक्ल उन लेखकों में हैं, जिनकी उपस्थिति उनकी पुस्तकों में बनी रहती है। जब भी कोई पाठक साधारण जीवन में कुछ ज़्यादा महसूस करेगा, जब भी किसी कमरे की दीवार में एक खिड़की खुलती नज़र आएगी..वहाँ विनोद कुमार शुक्ल होंगे।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...