Ghar Jamai
Ghar Jamai

Hindi Kahani: आज लगभग शादी के 25 वर्ष बाद अचानक मनी के हृदयाघात से मृत्यु की खबर सुनकर कनिका हतप्रथ रह गई ,उसका मन हुआ कि उसके गले लग जाए और उसे कहे कि मनी तुम कहीं नहीं जा सकते या कम से कम एक बार अपने पहले अधूरे प्रेम के अंतिम दर्शन तो कर लें, पर सोच कर ठहर गई कि लोग क्या सोचेंगे, लोग क्या कहेंगे। 

इस खबर की बात सोचते सोचते कनिका कब पुरानी यादों में चली गई उसे पता ही ना लगा… जैसे कल परसों की ही तो बात है जब वे दोनों कॉलेज में पढ़ते थे। मनी बिल्कुल सीधा सरल होनहार विद्यार्थी था। कॉलेज की अक्सर सभी हम उम्र लड़कियां उसे पसंद करती थी। उनमें से एक कनिका भी थी जो मन ही मन उसे चाहने लगी थी पर दिल था इस इंतजार में कि कब मनी खुद से आकर अपने प्रेम का इजहार करेंगे। 

कनिका ने कई बार हिम्मत की कि मनी से कह दे अपने मन की बात ,पर वह कह नहीं पाई क्योंकि दोनों बिरादरी में बहुत अलग थे। मनी उच्च ब्राह्मण थे और वह एक नीची जाति से थी। पर एक दिन मनी ने उसे एक पत्र दिया जिसमें लिखा था, कनिका मै मन ही मन तुम्हें पसंद करने लगा हूं ,तुम्हारी सादगी ने मेरे मन के कोरे कागज को जैसे प्रेम के रंगों से रंग दिया है पर पता नहीं तुम क्या समझोगी इसके लिए कभी तुमसे कह नहीं सका। यदि तुम भी मुझे पसंद करती हो तो इस पत्र को अपनी किताब में रख लेना नहीं तो इसे फाड़ कर वहीं फेंक देना। 

कनिका तो कब से इसी इंतजार में थी, उसके अधूरे प्रेम को जैसे पूरा आसमां मिल गया वह इस पल को जीना चाहती थी, इस पल को संवारना चाहती थी उसके सपनों को जैसे कुछ पंख से लगे, उसने उस पत्र को मोड़कर अपनी किताब में रख लिया। 

उस जमाने में मोबाइल फोन नहीं होते थे, इसलिए पत्रों के माध्यम से दोनों की बातें होने लगी। कभी-कभी वे दोनों कहीं कहीं मिलने लगे। पर दोनों के ही मन में एक डर समाया था कि शायद जात बिरादरी की वजह से उनके परिवार वाले उनके इस प्रेम को स्वीकार न करें क्योंकि मनी तो उच्च ब्राह्मण थे और कनिका जो हैं नीची जाति के परिवार से थी ,और मनी के पिताजी का समाज में एक रुतबा था। मनी और उसके बड़े भाई ने भी शायद कभी अपने पिताजी से ऊंची आवाज में बात नहीं की ,कभी कोई बहस नहीं की क्यूंकि वह समय था ही ऐसा कि सारे निर्णय घर के बड़े लोग ही लिया करते थे। एक दिन उनके प्रेम के बारे में जब कनिका के परिवार में पता चला तो उसके मां और पिताजी बोले बेटी तूने लड़का भी देखा तो उच्च ब्राह्मण! उसके परिवार वाले हरगिज तुम्हें अपने परिवार की बहू नहीं बनाएंगे। कनिका के पिताजी सही थे, जब मनी के पिताजी को उनके प्रेम के बारे में पता चला तो वे आग बबूला हो गए उन्होंने कहा क्या अब एक छोटी जाति की लड़की उनके परिवार की बहू बनेगी… उनके जीते जी ऐसा हरगिज नहीं होगा। 

मनी ने अपनी कुछ दलीलें रखनी भी चाहीं उसने कहा कि पिताजी अब समय बदल गया है कनिका एक अच्छी लड़की है उसमें अच्छे संस्कार हैं वह हमारे परिवार की कभी छोटी बात नहीं होने देगी।

लेकिन उसके पिताजी कहां मानने वाले थे उसके बड़े भाई और उसके पिताजी ने कहा की शादी तो अपनी ही जात की उच्च ब्राह्मण समाज की लड़की से ही तुम्हारी होगी। 

उधर कनिका के मां और पिताजी ने भी अपनी ही बिरादरी के एक एक क्लर्क लड़के से उसकी शादी पक्की कर दी और वो कुछ ना कर पाई। धीरे-धीरे बस अपने अधूरे प्रेम को अंदर ही अंदर बुनती हुई वो अपनी नई गृहस्थी में रमने लगी।

उधर मनी के भी ऊंचे ऊंचे परिवारों से रिश्ते आ रहे थे उन्ही में से एक रिश्ता उनके ही साथ पढ़ने वाली टीना नाम की लड़की के घर से आया। टीना बहुत ही रईस परिवार से थी और अपने मां-बाप की इकलौती संतान थी। 

उन्होंने मनी के लिए टीना का रिश्ता मनी के पिताजी तक भिजवाया, पर टीना के पिताजी चाहते थे कि उनका दामाद उनका घर जमाई बने ,क्योंकि उनकी टीना उनकी इकलौती संतान थी और जमीनों ज्यादाद इतनी थी कि उनके बाद कोई आकर उसे संभाल ले वे बस यही चाहते थे। 

पहले तो मनी के पिताजी ने इस रिश्ते को मना करना चाहा पर जब देखा कि एक ही शहर है अच्छा परिवार है लड़की भी सुंदर है तो उन्होंने मनी को इस रिश्ते के लिए समझाया, मनी ने मना कर दिया लेकिन तब उसके बड़े भाई और पिताजी ने समझाया कि एक ही शहर में अपने लोगों के बीच रहोगे। अच्छा खासा घर परिवार है, उनका सामाजिक रुतबा है। मनी ज्यादा कुछ कह ना सका और अपने अधूरे प्रेम को मन में ही समाये उनका घर जमाई बन गया।

घर जमाई बनना यानि अपना आत्मसम्मान खोकर किसी के घर में रहना। जो मनी स्वच्छंद था, आजाद था ,अब धीरे-धीरे उसे घुटन महसूस होने लगी। एक तो वह अपनी अधूरे प्रेम की कशिश को भी दिल से भुला नही पाया था और उस पर टीना का कर्कश व्यवहार । वह घोर तनाव में रहने लगा धीरे-धीरे तनाव से अपने आपको बचाने के लिए उसने सिगरेट को अपना साथी बना लिया। 

दो-चार सिगरेट से होते-होते अब वो दिन में कई कई बार सिगरेट पीने लगा । हर एक सिगरेट का एक-एक कश उसकी जिंदगी को लील रहा था।

कभी जितना तेज मनी के चेहरे पर था वह आज निस्तेज होने लगा, वह अपने में ही खोया खोया रहने लगा , धीरे-धीरे बीमारियों ने उसे घेर लिया। एक बार ऐसे ही बाजार चलते मनी से कनिका की मुलाकात हुई तो एक बार तो वो उसको पहचान ही नहीं पाई। मनी कनिका से इतना ही बोला कि कनिका तुम तो खुश हो ना …मैं तो बस इतना ही चाहता हूं कि तुम जहां रहो खुश रहो मैं तो अपनी जिंदगी बस ढो रहा हूं , भगवान कभी भी किसी का प्रेम ना छीने और घर जमाई तो कभी किसी दुश्मन को भी ना बनाएं ।

काश कि मै समय पर बोल पाता, डिसीजन ले पाता, आज पछता रहा हूं,पर अब क्या कर सकता हूं?,

 तब कनिका ने मनी से कहा मैं भी तुम्हें अक्सर बहुत याद करती हूं पर मैं आज अपने पति के साथ बहुत खुश हूं। वो भी तुम्हारे जैसे बहुत समझदार और अच्छे इंसान हैं और मनी अब तुम्हें भी अपना ध्यान रखना होगा ,अब हमारे घर परिवार और सपने अलग है यही हकीकत है और तुम्हें इस हकीकत को स्वीकारना होगा। ये जीवन एक परीक्षा है मनी जिसमें हम सभी के इम्तिहान पहले से ही तय होते हैं । कहने को तो कनिका मनी से इतनी बड़ी बात कह आई पर आज तक मनी का उतरा चेहरा, उसका गिरता स्वास्थ्य, उसके दिल की तड़प को याद करके कहीं ना कहीं वो भी तड़प उठती ।

और आज जब उसके हृदयाघात की खबर सुनी तो उसे लगा कि जैसे जिंदगी की रेत जो उसकी मुट्ठी से आजतक धीरे-धीरे फिसल रही थी आज वो मुट्ठी से पूरी तरह से निकल चुकी थी और आज उसकी मुट्ठी बिल्कुल खाली हो चुकी थी।