summary: बल्लू का सपना: छोटे से घर में बसी बड़ी खुशियां
बंजारों की बस्ती में रहने वाला बल्लू अपने परिवार के लिए पक्का घर बनाने का सपना देखता है। लेकिन एक घर के बंटवारे की लड़ाई देखकर उसे एहसास होता है कि असली खुशी घर की दीवारों में नहीं, बल्कि परिवार के प्यार और साथ में होती है।
Short Motivational Story: रज्जो चूल्हे पर रोटियां सेंकते हुए अपनी कांच की चूड़ियों को फूंक मार रही थी। तभी चुपके से बल्लू ने उसके गालों को प्यार से खींचा । अरे रे क्या कर रहे हो बाहर माँ-बापू बैठे हैं , बच्चे भी खेलते-खेलते अंदर आते ही होंगे । तो क्या हुआ मेरी पत्नी है तू प्यार से गाल तो खींच ही सकता हूँ । दोनों हसने लगे , माँ ने आवाज दी रज्जो तेरी कांच की चूड़ियां जल रहीं होंगी तू इधर आजा , मैं सकती हूँ रोटियां। ना माँ , बस हो गया तुम बैठो हम मिल कर खाना लगाते हैं । माँ मुस्कुरा कर सोचने लगीं कितना प्यार है मेरे बच्चों में भगवान ये प्यार हमेशा ऐसे ही बनाये रखे ।बंजारों की बस्ती में रहने वाला ये परिवार छोटा लेकिन बहुत खुशहाल माहौल अपने आप में समेटे हुए था । बापू बर्तनों को गला कर नए बर्तन बनाते और बल्लू उन्हें घर-घर बेचने जाता था ।

माँ चाक़ू और औजारों में धार लगाने के काम के साथ अपनी प्यारी पोतियों का भी ख्याल रखती थी। रज्जों पुराने कपड़ों और टेंट से बने अपने छोटे से आशियानें का पूरी तरह ख्याल रखती थी ।
रज्जो आजकल थोड़ा बीमार रहने लगी थी , अगले महीने वो माँ बनने वाली थी । बल्लू का प्यार उसके लिए और बढ़ गया था । ऐसे कठिन समय में भी वो उसके माँ -बापू का पूरी तरह ख्याल रखती थी , तो वहीं उसकी माँ बल्लू से ज्यादा रज्जो पर प्यार लुटाती थी ।
आजकल उसने एक नया व्यापार शुरू किया था । इस भरी गर्मी में उसने मिटटी के बर्तनों से बोतल ,घड़ा ,सुराही और सजावट का सामना बनाना शुरू कर दिया था। आमदनी अच्छी होगी तो आने वाले बच्चे के लिए सब कुछ अच्छा करेंगे और रज्जों की दवा , अस्पताल का खर्चा भी आराम से निकल जाएगा । बल्लू बचपन से बंजारों की बस्ती में ही रहता आया था ।
वो जब भी गली-मोहल्लों में सामान बेचने जाता तो लोगों के बड़े-बड़े घर देख कर बस यही सोचता काश एक कमरे का पक्का मकान मैं भी बना पाता तो बंजारा ना कहलाता । कई सालों से उसके मन में यही सपना पल रहा था कुछ पैसे इकट्ठे हो तो एक कमरा पक्का बनवा लिया जाए ।

बल्लू अपने दोस्त वीरू के साथ सामान बेचने निकला तो एक घर के आगे जमा हुई भीड़ से निकलते हुए उन्होंने घर के लोगों को झगड़ा करते हुए सुना । बल्लू समझ गया कुछ बड़ी बात है तभी आसपास पुलिस भी जमा हो गयी है। वीरू ने उसे बताया इस घर में रहने वाले दो भाइयों के बीच घर के बटवारें को लेकर लड़ाई हो रही है ।
वो सोच में पड़ गया इतने खूबसूरत और सब सुख-सुविधाओं वाले घर के होते हुए लोग साथ में रहना नहीं चाहते हैं । अलग रहने में क्या सुख, मज़ा तो तब है जब माँ-बापू प्यार से घर के आँगन में बैठे हो ,बच्चे आसपास खेल रहे हों और बल्लू-रज्जो जैसे पति-पत्नी अपने परिवार को देख कर खुश हो रहें हों।

आज घर पहुंचते-पहुंचते उसने अपने बचपन के सपने को अलविदा कह दिया, उसे एक पक्का बना हुआ कमरा नहीं चाहिए जिसके लिए कभी आगे जा कर उसके परिवार में लड़ाई हो । बल्कि उनका तो ये टूटा फूटा और इधर से उधर उठा कर ले जाने वाला घर ही बढ़िया था , जब मन चाहा एक जगह से दूसरी जगह चले गए । बल्लू ने घर पहुंच कर बापू से कहा कल काम पर नहीं जाएंगे बापू आने वाले बच्चे के लिए घर को थोड़ा और बड़ा करना होगा तभी तो अच्छे से रह पाएंगे । माँ और रज्जो के साथ मिलकर बापू और बल्लू ने बक्से से पुराने कपडे निकाले और अगली सुबह घर बड़ा करने की तैयारी रात में ही कर ली। आज उसे अपने बंजारा होने पर गर्व महसूस हो रहा था।

