Short Story in Hindi: बात उन दिनों की है जब मैं कोई सात–आठ साल की रही होऊँगी। माँ को पीलिया हो गया था। घर में जैसे इलाज नहीं, पूरा पपीता अभियान चल रहा था। आँगन में, खाली कोनों में, जहाँ ज़रा-सी भी मिट्टी मिली—वहाँ पपीते के पौधे रोप दिए गए थे। किसी ने बताया था कि पपीता जौंडिस में बहुत फायदेमंद होता है, तो माँ उसे बड़े चाव से खाया करती थीं।
एक दोपहर का दृश्य आज भी आँखों के सामने ताजा है। धूप नरम थी। माँ और पड़ोस की आंटियाँ आँगन में बैठकर मटर छील रही थीं। हँसी, बातचीत और मटर की छन-छन… उसी बीच एक पका हुआ पपीता काटा गया। खाने की तैयारी होने लगी।
किसी ने कहा—
“ऊपर से थोड़ा नमक और काली मिर्च डाल दो, स्वाद बढ़ जाएगा।”
माँ बोलीं—
“काली मिर्च पीसकर डालनी होगी।”
लेकिन काली मिर्च पिसी हुई नहीं थी।
तभी मैंने उत्साह से कहा—
“कोई बात नहीं मम्मी, मैं सिलबट्टे पर पीसकर ले आती हूँ।”
माँ मुस्कुराईं। शायद उन्हें भी अच्छा लगा कि उनकी नन्ही-सी बेटी उनके काम आ रही है। उन्होंने समझाया—
“किचन की अलमारी में देखना, काले रंग के गोल-गोल दाने होते हैं। जैसे पपीते का बीज है न, वैसे ही।”
मैं किचन में गई। अलमारी खोली। मसालों के कई डिब्बे थे। एक डिब्बे में सचमुच कुछ काले दाने दिखे। मैंने बड़े ध्यान से सारे मसाले एक तरफ किए और उन काले दानों को चुनकर अलग निकाला।
ध्यान से देखा तो उनमें डंडी लगी थी।
मैंने सोचा—
हरी मिर्च में भी तो डंडी होती है, तो इसमें क्यों नहीं होगी?
पूरी जिम्मेदारी से मैंने एक-एक दाने की डंडी तोड़ी। फिर उन्हें सिलबट्टे पर पीसा—बिल्कुल पूरे मन से। पिसी हुई “काली मिर्च” लेकर मैं विजयी भाव से बाहर आई।
सबने पपीते के टुकड़ों पर वह मसाला डाला और जैसे ही पहला कौर मुँह में गया—
अचानक आँगन में अफरा-तफरी मच गई।
“अरे बाप रे!”
“ये क्या डाल दिया?”
“मुँह तो जल रहा है!”
सबके चेहरे लाल, आँखें फैल गईं।
माँ ने चौंककर पूछा—
“ममता , तुमने क्या पीसा था?”
मैंने मासूमियत से कहा—
“मम्मी, अजीब-सी काली मिर्च थी। काली-काली, उसमें डंडी लगी थी। मैंने सबकी डंडी तोड़कर पीस दी।”
इतना सुनते ही माँ ने सिर पर हाथ रखा, माथा पीटा—और फिर जो हँसी फूटी, वो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। आंटियाँ ठहाके मार-मारकर हँसने लगीं।
तभी पता चला—
वो कबाब चीनी थी।
उस समय तो मुझे समझ ही नहीं आया कि गलती कहाँ हो गई। मैं बस सबको हँसते देख रही थी। लेकिन सालों बाद, जब मसालों की पहचान हुई, तब समझ आया कि बचपन की उस मासूम कोशिश में मैंने कैसी तीखी शरारत कर दी थी।
आज भी जब कबाब चीनी देखती हूँ, तो माँ की हँसी, आँगन की धूप और पपीते की वह प्लेट—सब एक साथ आँखों के सामने आ जाते हैं।
कुछ गलतियाँ जलन नहीं देतीं,
बस जीवन भर मुस्कान दे जाती हैं।
