महेन्द्र-“मगर नतीजा क्या होता है उसका?”
बिहारी-“नतीजा तुम्हारे लिए कुछ खास नहीं होता, मेरे लिए थोड़ा-बहुत होता है।”
बिहारी ने खुद बैठकर महेन्द्र से चिट्ठी लिखवाई और उस पत्र के साथ दूसरे ही दिन राजलक्ष्मी को लेने गया। राजलक्ष्मी समझ गई, चिट्ठी बिहारी ने लिखवाई है-मगर फिर भी उससे रहा न गया। साथ-साथ विनोदिनी आई।
लौटकर उन्होंने घर की जो बदतर हालत देखी-तमाम यों ही गन्दा पड़ा, तितर-बितर-इसलिए बहू के प्रति उनका मन और भी खराब हो गया।
लेकिन बहू में यह कैसा परिवर्तन! वह छाया-सी उनके पीछे डोलती फिरती। कहें, न कहें, हरदम हर काम में हाथ बंटाने को मुस्तैद। आजिज आकर वह कह उठतीं-“छोड़ो-छोड़ो, मिट्टी पलीद करके रख दोगी तुम! जो काम आता नहीं, उसमें हाथ क्या डालना?”
राजलक्ष्मी के जी में आया, “हो न हो, अन्नपूर्णा के चले जाने से ही बहू की यह तरक्की हुई है।” लेकिन फिर मन में आया, “महेन्द्र सोचेगा, चाची थीं तो मैं बीवी के साथ निष्कंटक मौज करता था और मां का पहुंचना था कि विरह का दुःख शुरू हो गया। इससे यही साबित होगा कि चाची उसकी शुभैषी रहीं, मां सुख का कांटा है। रहने दो, अपने को क्या पड़ी?”
इधर कहीं महेन्द्र दिन को बुला भेजता तो बहू जाने में अनाकानी करती। राजलक्ष्मी ही झिड़का करतीं-“महेन्द्र बुला रहा है, तुम टाल जाती हो! ज्यादा दुलार पाने का यही नतीजा होता है। जाओ, सब्जियां मैं देख लूंगी।”
फिर शुरू होता वही स्लेट-पेंसिल और ‘चारुपाठ’ का झूठ नाटक। प्रेम के अकारण अभियोग से एक-दूसरे को दोषी ठहराना-किसका प्रेम ज्यादा वजनी है, इस पर निरर्थक वाद-विवाद। वर्षा के दिन को रात और चांदनी रात को दिन बनाना।
ऐसे में एक दिन विनोदिनी आशा के गले से लिपटकर बोली-“बहन, तुम्हारा सौभाग्य अक्षय हो…जुग-जुग जियो! लेकिन चूंकि मैं दुखिया हूं, इसलिए क्या मेरी तरफ एक नजर ताकना भी गुनाह है?”
छुटपन से ही अपने आत्मीय के यहां पराई-सी पली थी, इसलिए लोगों के सामने आशा सदा संकुचित रहा करती। जुड़ी भौंहे और तीखी निगाह, अनिंद्य मुखड़ा और भरी हुई जवानी लिए जब विनोदिनी आई, तो खुद बढ़कर उससे परिचय करने की हिम्मत आशा की न हुई।
आशा ने गौर किया, राजलक्ष्मी से विनोदिनी को किसी भी तरह का संकोच नहीं। और मानो आशा को दिखा-दिखाकर राजलक्ष्मी भी उसका काफी आदर करतीं। यह भी देखा, घर के कामकाज में विनोदिनी पटु है, प्रभुत्व मानो उसके लिए बहुत ही सहज है, स्वभाव सिद्ध-नौकर-नौकरानियों से काम लेने, झिड़कने-फटकारने और हुक्म देने में उसे जरा भी हिचक नहीं होती। यह सब देख-भालकर विनोदिनी के आगे आशा अपने को बहुत छोटा समझने लगी।
वही सर्वगुण संपन्न विनोदिनी जब खुद उससे नेह की भीख मांगने आई, तो उसका आनन्द चौगुना हो उमड़ पड़ा। जादूगर के माया-तरु की तरह उसके प्रेम का बीज एक ही दिन में अंकुराया, पत्तों से लद गया और फल-फूल उठा।
आशा ने कहा-“हम-तुम सखियां हुईं, एक कोई नाम रख छोड़ें हम अपना।”
विनोदिनी ने हंसकर पूछा-“क्या आखिर?”
आशा ने बहुत-से अच्छे-अच्छे नाम गिनाए-“हरसिंगार, कदंब, मौलसिरी…”
विनोदिनी बोली-“ये सारे-के-सारे बड़े पुराने पड़ गए। इन दुलार के नामों की कोई कद्र नहीं।”
आशा ने पूछा-“फिर तुम्हें कौन-सा पसन्द है?”
हंसकर विनोदिनी ने कहा-“आंख की किरकिरी।”
आशा कोई मीठा-सा नाम ही चाहती थी, लेकिन विनोदिनी की पसन्द से उसने दुलार की इस गाली को ही कबूल कर लिया। बांहों से उसकी गरदन लपेटकर बोली-“मेरी आंख की किरकिरी!”
और हंसते-हंसते लोट-पोट हो गई।
आशा को एक साथी की बड़ी जरूरत भी थी। प्यार का त्योहार भी महज दो आदमियों से नहीं मनता–मीठी बातों की मिठाई बांटने के लिए गैरों की भी जरूरत पड़ती है।
भूखी-प्यासी विनोदिनी भी नई बहू से प्रेम के इतिहास को शराबी की दहकती हुई सुरा के समान कान फैलाकर पीने लगी। सूनी दोपहरी में मां जब सोती होती, घर के नौकर-चाकर निचले तल्ले के आरामगाह में छिप जाते, बिहारी की ताकीद से महेन्द्र कुछ देर के लिए कालेज गया होता और धूप से तपी नीलिमा के एक छोर से चील की तीखी आवाज बहुत धीमी सुनाई देती, तो कमरे के फर्श पर अपने बालों को तकिए पर बिखेरे आशा लेट जाती और पेट के नीचे तकिया रखकर पट पड़ी विनोदिनी उसकी गुन-गुन स्वर से कही जाने वाली कहानी में तन्मय हो जाती-उसकी कनपटी लाल हो उठती, सांस जोर-जोर से चलने लगती।
विनोदिनी खोद-खोदकर पूछती और छोटी-से-छोटी बात भी निकाल लेती, एक ही बात कई बार सुनती-घटना खत्म हो जाती तो कल्पना करती; कहती-“अच्छा बहन, कहीं ऐसा होता तो क्या होता और यह होता तो क्या करती?” इन अनहोनी कल्पनाओं की राह में सुख की बातों को खींचकर दूर तक ले जाना आशा को भी अच्छा लगता।
विनोदिनी कहती-“अच्छा भई आंख की किरकिरी, तुझसे कहीं बिहारी बाबू का ब्याह हुआ होता तो?”
आशा-“राम-राम, ऐसा न कहो! बड़ी शर्म आती है मुझे। हां, तुम्हारे साथ होता तो क्या कहने! चर्चा तो तुमसे होने की भी चली थी।”
विनोदिनी-“मुझसे तो जाने कितनों की, कितनी ही बातें चलीं। न हुआ, ठीक ही हुआ। मैं जैसी हूं, ठीक हूं।”
आशा प्रतिवाद करती। वह भला यह कैसे कबूल कर ले कि विनोदिनी की अवस्था उससे अच्छी है। उसने कहा-“जरा यह तो सोच देखो, अगर मेरे पति से तुम्हारा ब्याह हो जाता! होते-होते ही तो रह गया।”
होते-होते ही रह गया। क्यों नहीं हुआ? आशा का यह बिस्तर, यह पलंग सभी तो उसी का इन्तजार कर रहे थे। उस सजे-सजाये शयनकक्ष को विनोदिनी देखती और इस बात को किसी भी तरह न भुला पाती। इस घर की वह महज एक मेहमान है-आज उसे जगह मिली है, कल छोड़ जाना होगा।
तीसरे पहर विनोदिनी खुद अपनी अनूठी कुशलता से आशा का जूड़ा बांध देती और जतन से श्रृंगार करके उसके पति के पास भेजा करती।
इस तरह खामखाह देर कर देना चाहती।
नाराज होकर महेन्द्र कहता, “तुम्हारी यह सहेली तो टस से मस नहीं होना चाहती-घर कब जाएंगी?”
उतावली हो आशा कहती, “न-न, मेरी आंख की किरकिरी पर तुम नाराज क्यों हो। तुम्हें पता नहीं, तुम्हारी चर्चा उसे कितनी अच्छी लगती है-किस जतन से वह सजा-संवार कर मुझे तुम्हारे पास भेजा करती है।”
राजलक्ष्मी आशा को कुछ करने-धरने न देतीं। विनोदिनी ने उसकी तरफदारी की, और उसे काम में जुटाया। विनोदिनी को आलस जरा भी नहीं था। दिन-भर एक-सी काम में लगी आशा को वह छुट्टी नहीं देना चाहती। एक के बाद दूसरा, वह कामों का कुछ ऐसा क्रम बनाती कि आशा के लिए जरा भी चैन पाना गैरमुमकिन था। आशा का पति छत वाले सूने कमरे में बैठा चिढ़ के मारे छटपटा रहा है-यह सोचकर विनोदिनी मन-ही-मन हंसती रहती। आशा अकुलाकर कहती, “भई आंख की किरकिरी, अब इजाजत दो, वह नाराज हो जाएंगे।”
झट विनोदिनी कहती, “बस, जरा-सा। इसे खत्म करके चली जाओ! ज्यादा देर न होगी।”
जरा देर में आशा फिर उद्विग्न होकर कहती “न बहन, अब वह सचमुच ही नाराज होंगे। मुझे छोड़ दो, चलूं मैं।”
विनोदिनी कहती, “जरा नाराज ही हुए तो क्या। सुहाग में गुस्सा न मिले तो मुहब्बत में स्वाद नहीं मिलता-जैसे सब्जी में नमक-मिर्च के बिना।”
लेकिन नमक-मिर्च का मजा क्या होता है, यह विनोदिनी ही समझ रही थी-न थी सिर्फ उसके पास सब्जी। उसकी नस-नस में मानो आग लग गई। जिधर भी नजर करती, चिनगारियां उगलती उसकी आंखें। ऐसी आराम की गिरस्ती! ऐसे सुहाग के स्वामी! इस घर को तो मैं राजा की रियासत, इस स्वामी को अपने चरणों का दास बनाकर रखती। (आशा को गले लगाकर) “भई आंख की किरकिरी, मुझे बताओ न, कल तुम लोगों में क्या बातें हुईं। तुमने वह कहा था, जो मैंने करने को कहा था? तुम लोगों के प्यार की बातें सुनकर मेरी भूख-प्यास जाती रहती है।”
एक दिन आखिर आजिज आकर महेन्द्र ने मां से कहा-“यह अच्छी बात है, मां? दूसरे के घर की एक जवान विधवा को घर रखकर एक भारी जिम्मेदारी कंधे पर लाद लेने की क्या पड़ी है? जाने कब क्या मुसीबत हो?”
राजलक्ष्मी ने कहा-“अरे, यह तो अपने विपिन की बहू है, इसे मैं बिरानी थोड़े ही समझती हूं।”
