राजर्षि उपन्यास : एक परिचय
“राजर्षि” एक उपन्यास है जो रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन और उनके साहित्यिक योगदान पर आधारित है। यह उपन्यास उनके सोच, उनके लेखन, और उनके विचारों को विस्तार से वर्णित करता है।
“राजर्षि” कहानी उनके जीवन की ऊँचाइयों और गहराईयों को दर्शाती है, जैसे कि उनके साहित्यिक सफलताओं के पीछे की कठिनाइयाँ, उनकी विचारशीलता, और समाज में उनके दृष्टिकोण की महत्वपूर्ण प्रतिष्ठा।
इस उपन्यास में, टैगोर के विचार, उनकी कल्पना, और उनके साहित्य के महत्वपूर्ण कार्यों की गहराई को अद्वितीय रूप से प्रकट किया गया है। उपन्यास में उनके संघर्ष, संघर्षों को पार करने के उनके साहसिकता और उनके विचारों के प्रभाव को संजीव किया गया है।
“राजर्षि” एक उपन्यास है जो रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन, कार्य, और विचारों को एक महत्वपूर्ण और समर्पित धारावाहिक रूप में प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास उनके साहित्य के प्रेमी और उनके शिष्यों के लिए एक अद्वितीय संदर्भ है।
राजर्षि के लेखक : रवीन्द्रनाथ टैगोर
रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के एक अग्रणी कवि, लेखक, और दार्शनिक थे। उनका जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ था। टैगोर को ‘गुरुदेव’ के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें, कविताएं, नाटक, और गीत लिखे।
रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं में गांधीवाद, भारतीय संस्कृति, प्रकृति, और मानवता के प्रति प्रेम का विविध रूप से व्यक्तित्व किया गया है। उन्होंने विभिन्न विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए, जैसे कि स्त्री शिक्षा, धर्म, स्वतंत्रता, और समाजिक बदलाव।
उन्होंने भारतीय साहित्य को नई दिशा दी और उनके काव्य में सरलता, गंभीरता, और विचारों की गहराई थी। उनका काव्य आधुनिक भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है और उनके योगदान को सम्मान और स्मृति मिलती रहेगी।
रवींद्रनाथ टैगोर ने 13 अगस्त 1941 को अपने विचारों और साहित्य के प्रेमियों के बीच अपने अंतिम समय बिताया। उनका योगदान भारतीय समाज और साहित्य में अमर रहेगा।
राजर्षि उपन्यास-रवीन्द्रनाथ टैगोर
भुवनेश्वरी मंदिर का पत्थर से बना घाट गोमती नदी से मिला हुआ है। त्रिपुरा के महाराजा गोविन्दमाणिक्य ग्रीष्मऋतु की एक सुबह स्नान करने आये हैं, उनके साथ उनके छोटे भाई नक्षत्रराय भी आये हैं। उसी समय एक छोटी सी लड़की अपने छोटे भाई के साथ घाट पर आयी। राजा की धोती पकड़ कर पूछने लगी, “कौन हो तुम?”
राजा मुस्कुराकर बोले, “मां, मैं तुम्हारी संतान हूं।”
वह लड़की बोली, “मुझे पूजा के लिये फूल तोड़कर दे दो।”
राजा ने कहा, “ठीक है, चलो।”
राजा के सिपाही बेचैन हो उठे। उन्होंने कहा “महाराज, आप क्यों जाते हैं, हम तोड़ लाते हैं।”
राजा ने कहा, “नहीं जब इसने मुझसे कहा है, तो मैं ही तोड़ कर दूंगा।”
राजा ने उस बालिका की ओर देखा। सुबह की विमल उषा जैसा बालिका का चेहरा था। जब वह राजा का हाथ पकड़ कर मंदिर के पास वाले फूलों के बगीचे में घूम रही थी। तब चारों ओर के सफेद बेल फूलों जैसे उसके चेहरे से एक विमल सौरभ का भाव सुबह इस बगीचे में व्याप्त हो रहा था। छोटा भाई अपनी बहन का पल्लू पकड़े साथ-साथ घूम रहा था। वह सिर्फ अपनी दीदी को पहचानता था। राजा से उसकी ज्यादा बातचीत नहीं हुई। राजा ने बालिका से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है बेटा?”
बालिका ने उत्तर दिया, “हंसी।”
राजा ने उसके भाई से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
वह बड़ी-बड़ी आंखों से अपनी बहन को देखने लगा, कोई उत्तर नहीं दिया।
हंसी ने उसे सहलाकर कहा, “बोल ना भाई, मेरा नाम ताता है।”
उस बच्चे ने बड़े ही गंभीर भाव से अपने छोटे-छोटे होंठ खोले और अपनी दीदी की प्रतिध्वनि की तरह कहा, “मेरा नाम ताता है।” कहकर दीदी का आंचल और जोर से पकड़ लिया।
हंसी ने राजा को समझाते हुए कहा, “यह अभी छोटा है न, इसलिये सब इसे ताता कहते हैं।” छोटे से भाई की ओर देखकर बोली, “अच्छा, बोल तो, मंदिर।”
वह बच्चा दीदी की ओर देखकर बोला, “लदद।
हंसी हंसती हुई बोली, ‘ताता मंदिर नहीं बोल पाता। कहता है लदद’
‒अच्छा बोल तो ”कड़ाही।“
वह बच्चा गंभीर भाव से बोला ”बड़ाही।“
हंसी फिर से हंसकर बोली, ”हमारा ताता कड़ाही भी नहीं बोल पाता, कहता है बड़ाही। कहकर उसे बार चूमने लगी।
अचानक दीदी की इतनी हंसी और प्यार करने का कोई कारण ताता को समझ नहीं आया। वह तो सिर्फ टुकुर-टुकुर देखता रहा। यह सच है कि मंदिर और कड़ाही ताता ठीक से बोल नहीं पाता था। ताता जितनी उम्र में हंसी मंदिर को कभी भी लदद नहीं कहती थी, वह मंदिर को पालु कहती थी, और वह कड़ाही को बड़ाही कहती थी या नहीं यह तो नहीं पता मगर कड़ी को थई कहती थी, इसलिए ताता के विचित्र उच्चारण सुनकर उसे अगर हंसी आती है तो इसमें आश्चर्य क्या है? ताता के विषय में बहुत सी घटनाएं वह राजा को सुनाने लगी। एक बार एक बुड्ढा कंबल ओढ़कर आया था। ताता ने उसे भालू कहा था, ताता में अक्ल ही इतनी कम है। और एकबार पेड़ पर पपीते लगे देख उन्हें पक्षी समझ कर अपने मोटे-मोटे छोटे हाथों से ताली बजाकर उन्हें उड़ाने की कोशिश कर रहा था। ताता हंसी से बहुत छोटा और भोला है, यह बात ताता की दीदी ने बहुत से उदाहरण देकर प्रमाणित कर दी। ताता अपनी बुद्धि के विषय में यह सारी बातें अविचलित चित्त से सुन रहा था, जितनी उसे समझ आया उसमें उसे नाराज होने का कोई कारण नजर नहीं आया। इस तरह उस दिन सुबह फूल तोड़ना समाप्त हुआ। राजा ने जब छोटी लड़की के आंचल में फूल भर दिये तब राजा को लगा जैसे उनकी पूजा समाप्त हुई। इन दोनों में सरल स्नेह का दृश्य देखकर, इस पवित्र हृदय की आस मिटाकर फूल तोड़कर जैसे उन्होंने देवपूजा कर ली हो।
अगले दिन से सुबह उठने के पश्चात सूर्य के उदय होने पर भी राजा की प्रभात नहीं होती थी, छोटे-छोटे दोनों भाई-बहन की सूरत देखकर ही उनकी सुबह होती, रोज उनको फूल तोड़कर देने के पश्चात ही वे स्नान करते; दोनों भाई-बहन घाट पर बैठकर उनको स्नान करते हुए देखते। जिस दिन यह भाई-बहन नहीं आते उस दिन राजा की पूजा जैसे अधूरी रह जाती।
हंसी और ताता के माता-पिता नहीं थे। सिर्फ एक चाचा है। चाचा का नाम केदारेश्वर था। यह दो बच्चे ही उनके जीवन का समस्त सहारा और सुख थे।
एक साल बीत गया। ताता अब मंदिर ठीक से कह पाता है, मगर अभी भी कड़ाही को बड़ाही कहता है। वह ज्यादा बातें नहीं करता। गोमती नदी के तट पर उस बड़े से पेड़ के नीचे पैर फैलाकर बैठकर उसकी दीदी उसे जो भी कहानी सुनाती, वह डबडबायी आँखों से अवाक् रहकर सुनता। उस कहानी का कोई सिर-पैर नहीं होता, मगर उसे क्या समझ आता यह तो वही जाने। कहानी सुन-कर उस पेड़ के नीचे, उस सूर्य के प्रकाश में, उस खुली हवा में, इस छोटे से बच्चे के छोटे से हृदय में कितनी बातें, कितनी तस्वीर उभरती, यह हम क्या जाने। ताता किसी और बच्चे के साथ नहीं खेलता था, अपनी बहन के साथ छाया की तरह रहता।
आषाढ़ का महीना था। सुबह से ही घने बादल छाये हुए थे। अभी भी बारिश शुरू नहीं हुई थी, मगर लग रहा था कि बस अभी बरसात होने ही वाली है। बारिश की हल्की बूंदें लिए ठंडी हवा बह रही थी। गोमती नदी के पानी पर और उसके दोनों तटों के पार के जंगल में अंधेरे आसमान की छाया पड़ रही थी। कल रात अमावस थी, कल भुवनेश्वरी की पूजा भी हो चुकी थी।
रोज की तरह हंसी और ताता का हाथ पकड़कर राजा नहाने आये हैं। सफेद पत्थर पर से कुछ खून बहकर पानी की ओर गया हुआ है। कल रात जो एक सौ एक भैरों की बलि हुई थी यह उन्हीं का खून था।
हंसी वह खून देखकर अचानक संकोच से दूर हट कर बोली, “यह कैसा निशान है पिताजी?”
राजा ने कहा, “खून का निशान है बेटी।”
वह बोली, “इतना खून क्यों?”
बालिका के इस प्रश्न में इतना दर्द था कि राजा के हृदय में बार-बार यह सवाल उठने लगा “इतना खून क्यों?” उनका शरीर बार-बार सिहर उठता।
काफी सालों से प्रत्येक वर्ष इसी तरह खून देखते आये थे। मगर इस छोटी-सी बालिका के प्रश्न को सुनकर उनके मन में भी बार-बार यही उदय होने लगा ‘इतना खून क्यों।’ वे उत्तर देना भूल गए। अनमने से नहाते नहाते इसी प्रश्न के विषय में सोचने लगे।
हंसी अपना आंचल पानी में भिगोकर सीढ़ियों में बैठकर धीरे-धीरे उस खून के निशान को धोने लगी, उसको ऐसा करते देख छोटा भाई भी अपने छोटे-छोटे हाथों से वही करने लगा, हंसी का आंचल खून से लाल हो गया। राजा जब नहाकर आये तो देखा कि दोनों भाई-बहन ने मिलकर खून साफ कर दिया था।
उस दिन घर लौटकर हंसी को बुखार हो गया। ताता अपनी दीदी के पास बैठकर अपनी अंगुलियों से उसकी बंद आंखों को खोलने की कोशिश करते हुए पुकार रहा था “दीदी।” दीदी रह-रहकर चौंक उठती।
“क्या है ताता” कहकर उसे अपने पास खींच लेती और फिर उसकी आंखें बंद हो जाती। ताता चुपचाप बैठकर दीदी के चेहरे को देखता रहता, कुछ नहीं कहता। अन्ततः काफी देर बाद धीरे-धीरे अपनी दीदी से लिपटकर धीरे से बोला, ‘दीदी, तुम उठोगी नहीं?’ हंसी चौंककर जागकर उसे छाती से लगाकर बोली ‘क्यों नहीं उठूंगी भाई।’ मगर हंसी उठ नहीं पा रही थी। उसके क्षुद्र हृदय में जैसे अंधेरा और घर की छत पर लगातार बरसात की आवाज आ रही थी आंगन में इमली का पेड़ भी रहा था, रास्ते पर कोई पथिक नहीं था। केदारेश्वर एक वैद्य को साथ लेकर आये। वैद्य ने नाड़ी देखी, हालात अच्छे नहीं थे।
अगले सुबह राजा जब स्नान करने आये तो उन्होंने देखा कि भाई-बहन उनके इंतजार में नहीं बैठे थे। उन्होंने सोचा शायद बरसात के कारण वह नहीं आये होंगे। स्नान और पूजा के बाद राजा जब पालकी में बैठे तो उन्होंने वाहकों को पालकी केदारेश्वर की कुटिया की ओर ले जाने को कहा। सिपाही चकित रह गये। मगर राजा की आज्ञा के आगे कुछ नहीं कह पाये।
राजा की पालकी जब कुटिया पर पहुंची तो वहां भगदड़ मच गई। उस भगदड़ में हंसी की बीमारी के विषय में सभी भूल गए। सिर्फ ताता अपनी जगह से नहीं हिला। वह अपनी बेहोश दीदी के पास बैठकर उसके आंचल को अपने मुंह में दबाकर चुप बैठा उसे देखता रहा।
राजा को कमरे में आता देखकर ताता ने पूछा, “क्या हुआ है?” परेशान राजा ने कोई उत्तर नहीं दिया। ताता गरदन हिला-हिलाकर फिर से पूछने लगा, “दीदी को चोट लगी है क्या?”
चाचा केदारेश्वर ने परेशान होकर जवाब दिया, “हां चोट लगी है।” ताता उसी पल दीदी के पास जाकर उसका चेहरा उधर करने की कोशिश करने लगा, और उससे लिपटकर पूछने लगा, “दीदी, तुम्हें कहां चोट लगी है?” उसका अभिप्राय यह था कि वह उस जगह फूंक मारकर वहां सहलाकर उसकी सारी पीड़ा दूर करेगा। मगर जब दीदी ने कोई उत्तर नहीं दिया तो उसे सहन नहीं हुआ, छोटे-छोटे होंठ फूलने लगे, अभिमान से रोने लगा। कल से बैठा है, दीदी बोल क्यों नहीं रही? ताता ने किया क्या है जो दीदी उससे बात नहीं कर रही? राजा के सामने ताता का यह व्यवहार देखकर केदारेश्वर परेशान हो उठे। वह परेशान होकर ताता का हाथ पकड़कर उसे दूसरे कमरे में ले गए। फिर भी दीदी कुछ नहीं बोली।
राजवैद ने भी चिंता जताई। शाम के समय राजा दो बार हंसी को देखने आये। उस समय बालिका बड़बड़ा रही थी। कह रही थी, “ओ माँ, इतना खून क्यों?”
राजा बोले, “बेटी, यह खून-खराबा मैं रुकवा दूंगा।”
बालिका बोली, “आ भाई, हम दोनों खून धो देते हैं।”
राजा बोला, “आ बेटी, मैं भी धोता हूं।”
शाम के बाद हंसी ने थोड़ी देर के लिए आंखें खोली थी। एक बार चारों ओर देखकर न जाने किसे ढूंढा। तब तक ताता दूसरे कमरे में रोते-रोते सो चुका था। उसे न देखकर हंसी ने फिर से आंखें मूंद ली। फिर नहीं खोली। रात के दूसरे प्रहर में राजा की गोद में हंसी की मौत हो गई।
हंसी को जब हमेशा के लिए कुटिया से ले जाया जा रहा था तब ताता दूसरे कमरे में सोया पड़ा था। उसे अगर पता चलता तो वह भी शायद दीदी के साथ-साथ छोटी छाया की तरह चला जाता।
राजसभा सजी हुई है। भुवनेश्वरी देवी के मंदिर के पुरोहित किसी काम से राजा से मिलने आये हैं।
पुरोहित का नाम रघुपति था। हमारे देश में पुरोहित को “चोन्ताई” भी कहा जाता है। भुवनेश्वरी देवी की पूजा के चौदह दिन पश्चात आधी रात को चतुर्दश देवता की पूजा होती है। इस पूजा के समय एक दिन दो रातों तक कोई अपने घर से बाहर नहीं जा सकता, राजा भी नहीं। अगर राजा को बाहर आना हो तो “चोन्ताई” को दण्ड स्वरूप अर्थ देना पड़ता है। कहा तो यही जाता है कि इस पूजा को रात को मंदिर में नरबलि दी जाती है। इस पूजा में प्रथम जो पशुओं की बलि दी जाती है उसे राजमहल का दान कहा जाता है। इस बलि के लिये पशु लेने आज पुरोहित राजा के पास आये हैं। पूजा में अभी बारह दिन और रहते हैं।
राजा ने कहा, “इस साल से मंदिर में जीव-बलि नहीं होगी।” पूरी सभा यह सुनकर अवाक् रह गई। राजा के छोटे भाई नक्षत्रराय के तो सिर के बाल खड़े हो गए।
पुरोहित रघुपति ने कहा “मैं यह कैसा स्वप्न देख रहा हूं।”
राजा बोले, “नहीं पुरोहित जी, स्वप्न तो अबतक हम देख रहे थे, आज मुझे होश आया है। मां ने एक बालिका का रूप धरकर मुझे दर्शन दिये थे। वे कहकर गई हैं, करुणामयी जननी होकर वे अपने ही जीवों का रक्त नहीं देख सकती।”
रघुपति बोले, “तो अबतक मां जीवों का रक्त कैसे पान करती रही?”
राजा बोले, “नहीं, उन्होंने खून नहीं चाहा, तुम लोग जब रक्तपात करते थे तो वे मुंह फेर लेती थी।”
रघुपति बोले, “महाराज, आप राजकार्य बहुत अच्छा जानते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। मगर पूजा के विषय में आप कुछ नहीं जानते। देवी को अगर जरा सी भी नाराजगी होती इस बात पर तो मुझे पहले ही पता चल जाता।”
नक्षत्रराय बुद्धिमानों की तरह सिर हिलाकर बोला, “हां, यह बात ठीक है, देवी को अगर थोड़ी भी नाराजगी होती तो पुरोहित जी को पहले पता चल जाता।”
राजा बोले, “जिसका हृदय कठोर हो गया हो उसे देवी की बातें नहीं सुनाई देती।”
नक्षत्रराय ने पुरोहित की ओर देखा‒भाव कुछ ऐसा था कि इस बात का उत्तर देना जरूरी है।
रघुपति गुस्से में लाल होकर बोले, “महाराज, आप नास्तिकों की तरह बोल रहे हैं।”
गोविन्दमाणिक्य ने गुस्से से लाल, पुरोहित की ओर देखकर कहा “पुरोहित जी, राजसभा में बैठकर आप बेकार समय नष्ट कर रहे हैं। मंदिर के काम का समय हो गया है। आप मंदिर चले जाइये। जाते समय पथ पर जो भी मिले उसे बता दीजिए कि मेरे राज्य में जो भी देवी के लिए जीव-बलि देगा उसे देश निकाला दिया जाएगा।”
तब रघुपति कांपते हुए उठे और अपना जनेऊ छूकर बोले, “तो तुम भाड़ में जाओ। चारों ओर बैठे समान पद पुरोहित की ओर बढ़ने लगे। राजा ने इशारे से उन्हें रोक दिया। रघुपति कहने लगे, ”तुम राजा हो, तुम चाहो तो प्रजा का सबकुछ ले सकते हो। इसलिये क्या तुम मां की बलि हरण करोगे? ठीक है! तुम्हारी हिम्मत देखता हूं। मैं रघुपति-मां के सेवक के रहते तुम कैसा पूजा में विघ्न डालते तो, मैं देखता हूं।“
मंत्री राजा के स्वभाव को अच्छी तरह जानते थे। वे जानते से राजा को अपने संकल्प से हिलाना इतना सहज नहीं है। वे डरते हुए धीरे से बोले, ”महाराज, आपने स्वर्गीय पिता-दादा-पर हमेशा नियमित रूप से देवी को बलि देते आये हैं। कभी एक दिन के लिए भी यह काम नहीं रुका।“
मंत्री चुप हो गए। राजा भी चुप रहे। मंत्री बोले, ”आज इतने दिनों बाद अपने पूर्वजों द्वारा प्रतिष्ठित पूजा में विघ्न डालने पर स्वर्ग में वे असंतुष्ट हो जाएंगे। राजा सोच में पड़ गए। नक्षत्रराय बुद्धिमानी दिखाते हुए बोले, “हां, वे स्वर्ग में असंतुष्ट होंगे। मंत्री ने फिर कहा, ”महाराज, एक काम करें, जहां हजारों बलि होती हैं वहां सिर्फ एक सौ बलि का आदेश दे दें।“ सभा अवाक् बैठी रही, राजा भी सोच में डूब गए। क्रुद्ध पुरोहित अधीर होकर सभा से जाने लगे।
उसी समय न जाने कैसे पहरेदारों से नजर बचाकर नंगे शरीर और नंगे पैर एक बच्चे ने सभा में प्रवेश किया। राजसभा के बीचों-बीच खड़े होकर राजा की ओर अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से देखते हुए उसने पूछा, ”दीदी कहां है?“
विशाल राजसभा अचानक शांत हो गई। सभा गृह में सिर्फ उस बच्चे के शब्द प्रतिध्वनित होने लगे, ”दीदी कहां है?“
उसी पल राजा सिंहासन से उठे और उस बच्चे को गोद में उठाकर बोले, ”आज से मेरे राज्य में बलि नहीं होगी और मैं कुछ नहीं सुनना चाहता।“
मंत्री ने कहा, ”जी अच्छा।“
ताता ने राजा से पूछा, ”मेरी दीदी कहां है?“
राजा ने कहा, ”मां के पास।“
ताता काफी देर तक मुंह पर अंगुल रखें चुप रहा, जैसे उसे दीदी का पता मिल गया हो। आज से ताता को राजा ने अपने पास रख लिया। उसका चाचा केदारेश्वर को भी महल में स्थान मिल गया।
सभासद आपस में बातचीत करने लगे, ”यह तो भिक्षुकों का देश हो गया। हम जानते हैं बौद्ध भिक्षुक रक्तपात नहीं करते। अन्ततः हमारे हिन्दू देश में भी यह नियम चलेगा।“
नक्षत्रराय उनसे सहमत होकर बोले, ”हां, हिन्दू देश में भी वही नियम चलेगा क्या?“
सबने सोचा, सर्वनाश के और क्या लक्षण हो सकते हैं? भिक्षुक और हिन्दुओं में क्या भेद रहा?
भूवनेश्वरी देवी मंदिर का नौकर जयसिंह राजपूत, क्षत्रिय था। उनके पिता सुचेतसिंह त्रिपुरा के राजमहल के पुराने नौकर थे। सुचेतसिंह की मृत्यु जब हुई थी तो जयसिंह छोटा सा बच्चा था। इस अनाथ बालक को राजा ने मंदिर के काम में नियुक्त किया था। पुरोहित रघुपति ने ही जयसिंह को पाला और पढ़ाया। बचपन से ही मंदिर में पल-बढ़कर जयसिंह मंदिर को घर की तरह प्यार करते थे। मंदिर के कोने-कोने से उसका परिचय था। उनकी मां भी नहीं थी। भूवनेश्वरी की मूरत को ही वे मां की तरह देखते थे। मूर्ति के सम्मुख बैठकर वे बातें करते, उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होता। उनके कुछ और साथी भी थे। मंदिर के बगीचे के बहुत से पेड़-पौधों को उन्होंने अपने हाथों से पाला था। उनके चारों ओर उनके लगाये हुए पेड़ बढ़ रहे थे, बेलें बढ़ रही हैं, शाखाओं पर फूल खिल रहे हैं, छाया बढ़ रही है, हरे-भरे पेड़ों के पत्ते यौवन से भर गए हैं। मगर जयसिंह की प्यार की यह बातें कोई नहीं जानता था। अपने बल और साहस के लिए ही वे जाने जाते थे।
मंदिर का काम निपटा कर जयसिंह अपनी कुटिया के द्वार पर बैठे थे। सामने ही मंदिर का बगीचा है। शाम हो गई है, चारों ओर बादल गरज रहे हैं, बरसात हो रही है। बरसात के पड़ने से पेड़-पौधे नहा रहे हैं। बरसात की बूंदों से वहां पत्ता-पत्ता उत्सव में डूबा है। बरसात का पानी छोटे-छोटे जल प्रवाह से गोमती नदी में जाकर मिल रहा है। जयसिंह बड़े भाव से अपने बगीचे को देख रहे हैं। चारों ओर बादलों का स्निग्ध अंधेरा, वन की छाया, घने पत्तों वाले पेड़, मेढ़कों की टर्र-टर्र, बरसात की बूंदों की ध्वनि‒बगीचे में बरसात का रूप देख कर उसके प्राण नाच रहे थे।
इसी बीच भीगते हुए रघुपति आ पहुंचे। जयसिंह जल्दी से उठे और पैर धोने के लिए पानी और सूखे कपड़े ले आये।
रघुपति परेशान होकर बोले, ”तुमसे कपड़े लाने को किसने कहा?“ कहकर कपड़े गिरा दिये।
जयसिंह पैर धोने का पानी लेकर आगे बढ़े। रघुपति और ज्यादा परेशान होकर बोले, ”रहने दो, अपना वह पानी रख दो।“ कहकर लात मारकर पानी का लोटा गिरा दिया।
अचानक ऐसा व्यवहार का कारण न समझने के कारण जयसिंह अवाक् रह गये। जमीन से कपड़े उठाकर यथास्थान रखने लगे तो रघुपति ने फिर कठोरता पूर्वक कहा, ”मैंने कहा न रहने दो, उन कपड़ों को हाथ मत लगाओ।“ कहकर खुद उठे पानी लेकर पैर धोए और कपड़े बदल कर आये। जयसिंह ने धीरे से कहा, ”मुझसे कोई गलती हो गई प्रभु?“
रघुपति थोड़ा तेज स्वर में बोले, ”कौन कह रहा है कि तुमने गलती की है?“
