Hindi Story:”क्या हुआ था ,हमारे श्याम को भाभी” दूर की ननद मुन्नी देवी ने गायत्री जी से प्रश्न किया…
“क्या बताएँ जिज्जी खागई यह डायन हमारे श्याम को कहकर” आँखों से बहू और उसके बच्चियों की तरफ़ इशारा करते हुए गायत्री देवी ने गला फाड़कर रोने की कोशिश की…
दुःख कितना भी बड़ा हो लगातार रोते हुए तो आत्मा तक थक जाती है ,हाँ उस घटना के जख्म पर जब पपड़ी पड़ती है।
तो थमे हुए आँसू किसी आत्मीय के समक्ष ही निकलते हैं। आख़िर कोई कितना रोयेगा?
चुपचाप सूने जीवन का दुःख भरे पूनम को कमरे के कोने में उसकी बेटियाँ घेरे बैठी थीं
जब रो-रोकर तब सूखी आँखों से भी ख़ालीपन
प्रकट होता है,वह भी रुदन का ही पर्याय होता है,तब तक रोमी ने भावहीन चेहरे के साथ ट्रे में चाय लाकर सामने रख दी और बोली….
,”दादी पापा का हार्टफेल हुआ था ,उन्हें किसी ने खाया नहीं है
भई बड़ी वाचाल है ये लड़की रोमी , है बित्ते भर की पर अभी से ज़बान इतनी चलती है ,कि पूछो मत…राम जाने क्या होगा इसका ?
कहते हुए गायत्री जी ने आग्नेय दृष्टि से अपनी बहू की ओर घूरकर देखा,
सास गायत्री जी के बिगड़े तेवर देख जान हलक में आ गयी पूनम की,यूँ भी जब से उसके पति श्याम की असमय मृत्यु हुई थी।
अभी तीन महीने भी न हुए तो श्याम को गुज़रे ,वह घर के काम करने के बाद अलग थलग पड़ी रहती कोने में
उसकी दुश्वारियों ने प्रचण्डता पकड़ ली थी,उसपर उसकी सबसे समझदार बेटी के बागी तेवर…
उसने क्रोध से अपनी बेटी से कहा,”रोमी!क्या तुमने फिर आज दादी को पलट कर जबाब दिया है?
उत्तर में उसने भरी आँखों के साथ अपना मुख नीचे की ओर झुका लिया।
उसके हावभाव से पूनम की समझ में आ गया कि अवश्य गलती उसकी नहीँ होगी।
फिर भी उसने अपनी आवाज़ में वजन लाते हुए कहा ,”माफ़ी माँगों उनसे,वो तुमसे बड़ी हैं’।
“क्योँ मम्मी?बिना गलती…”उसने सवाल किया।
हाँ..
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उसने उत्तर दिया, हाँ अब गलती हो या न हो , तो भी इसकी आदत डालनी पड़ेगी क्योंकि , माफ़ी माँगने से हम छोटे नहीं हो जाते
हमेशा आगे बढ़ के अपनी गलतियों की माफ़ी माँग लेने वाला बड़ा होता है, उससे भगवानजी भी ख़ुश होतते हैं,पूनम ने समझाते हुए कहा..
“और ख़ुद गलती करकर दूसरे से माफ़ी मंगवाने वाले को क्या कहते हैं, क्या उन्हें भगवान जी कुछ नहीं कहते मम्मी”?रोमी ने आक्रोशित स्वर में प्रश्न किया।
“कहते हैं न बेटा और दण्ड भी देते हैं पर अभी ये तुम्हारी मजबूरी भी है,वादा करो अपनी माँ से अब किसी को पलटकर जवाब नहीँ दोगी।
क्योँ? उसने क्रोध में पूछा
पूनम ने दुःखभरे लहज़े में कहा,”अब तुम्हें ही नहीं हमसबको इसकी आदत डालनी ही पड़ेगी मेरी बच्ची ….
क्योंकि अब तुम्हारे पापा नहीँ हैं,हमें परिवार के वो सभी रिश्ते ही बाहर की समस्याओं में सहायता करेंगे ,जो माँ-पिता समान हैं।
‘ठीक है” कहकर उसने आधे-मन से ही दादी से माफ़ी माँग ली।
पिता की हाल ही में हुई मृत्यु ने उस कन्या के दस वर्ष के बाल मन पर यूँ ही सबसे कटु निशान छोड़ दिये थे।
इतने रिश्तेदार उसने अपने पैतृक घर में कभी नहीं देखे थे।सब रिश्तों के वास्तविक और सामाजिक परिचय उससे उनकी पहचान सबकुछ उसके मष्तिष्क में छप गए थे।
उसका उससे नया परिचय उसकी दादी रोज करवातीं के,कभी वो उसे साँपिन कहती तो कभी नागिन क्योंकि उस पर आरोप था कि उसने अपने पिता को ही खा लिया है।
जबकि वो इन सम्बोधनों को सुनकर अपनी तर्कशक्ति का प्रयोग करती कि लगती तो मैं इन्सान ही हूँ ,दादी क्यूँ ऐसा कहती है।
उस कन्या ने स्वयं को शीशे में देखने के बाद ख़ुद को ये तसल्ली दी कि वो मनुष्य ही है उसकी बनावट सर्प जैसी है ही नहीं।
कुछ दिनों बाद पुत्र की असमय मृत्यु से क्रोधित दादी ने फिर क्रोध में बच्ची को नया नाम दिया कि ,”तुम कम्बख़्त हो “।
इसबार उस बच्ची ने उसका अर्थ पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि ,”जिनके पिताजी मर जाते हैं वो कम्बख़्त होते हैं।”
बालिका ने उँगलियों पर कुछ गिनते हुए प्रश्न किया ,”माताजी आप की अपने पिता जी से लड़ाई हुई है क्या ,मेरे पापा के मरने पर वो तो आये ही नहीं उन्हें भी तो यहाँ होना चाहिए था।”
दादी ने अपने पिता की याद में अत्यंत भावुक होकर कहा,”उनका स्वर्गवास हुए तो करीब बीस वर्ष हो गए।”
बच्ची ने इस बार अपने दोनोँ हाथों से खुश होकर ताली बजाते हुए कहा,”वाह सेम टू सेम मेरे भी पापा मर गए और आप के भी, हम दोंनो ही कम्बख़्त है।
और निरुत्तर दादी का चेहरा लज्जा से झुक गया।
उधर मन ही मन में लज्जित दादी अपनी ही रची हुई उपमाओं के जाल में मछली के समान छटपटा रही थी।
क्योंकि इसबार उनका तीर पलटकर उन्ही पर जो आ गया था।
कुछ देर तक तो वो उसके जवाब से हतप्रभ रहीं फिर थोड़ी देर में पुनः अपने स्वभाव में वापस आ गयी।
और रोमी की उसकी माँ से एक बार उसकी शिकायत की नौबत आ गयी थी,गायत्रीदेवी तैश में आकर बोलीं।
क्यों री श्याम की बहू ,यही सँस्कार दिये हैं छोरियों को तूने कि बड़ों का अपमान करो,उनसे जबान लड़ाओ।
अरे भाई तो है ही नहीं,एक बाप ही था उसे भी खा गई नागिन..
रोमी इस बार बिलखकर रो पड़ी ,और बोली ,”मम्मी प्लीज़ आप इस बार माफी माँगने को मत कहना
रोमी का बालमन उस दुर्घटना से हिला हुआ पहले ही था ,अब आये दिन के उन कटु वचनों से आहत भी रहने लगा।
गायत्रीदेवी के मिलने जुलने वालों की सोच भी उनसे विलग न थी,उसपर वो जो कुछ भी बोलतीं,उसे सुनना पूनम की तो विवशता बहू होने के कारण थी।
पर रोमी और उसकी बहनें वह तो उन्ही के बेटे की सन्तान थी,जिन्हें कोसे जाना उसकी समझ से बाहर था।
रोमी के पिता की मृत्यु ह्रदयाघात से हुई थी ,पढ़ने में कुशाग्र बालिका हर बात को अपनी तर्क की कसौटी पर तौलती।
जो समझ न पाती उस बात को वो अपने किसी बड़े से पूछा करती,फलस्वरूप उसे बातूनी का भी ख़िताब दे दिया गया।
उसका बालमन अभी भी नैतिक शिक्षा के पाठ में अटका रहता,कि सच बोलो,बड़ों का आदर करो और यदि गलती हो तो उनसे तुरन्त माफ़ी भी माँगनी चाहिये।
तुम अपनी पढ़ाई अच्छे से करो और अगर कुछ सवालों के जबाव न मिलें तो उन्हें इन दादाजी की किताबों में खोजा करो।
कहकर पूनम ने रोमी का परिचय दादाजी की अलमारी में रखी रामायण ,गीता और महाभारत की किताबों से करवाया।
धीरे धीरे रोमी उन किताबों में डूबने लगी,और अपनी बहनों को भी समय काटने को उनमें से कहानी सुनाती।
कुछ समय बीत गया और पूनम का भाई उसे मायके ले जाने के लिये आया,बच्चों ने भी एक चैन की साँस ली कि कुछ समय कड़वी बातों से दूर तो रहेंगे।
मगर उधर भी नतीज़ा ढाक के तीन पात ही रहा,सम्पन्न मायके में जहाँ पूनम को उसपर पड़े दुःख से घरवाले दीन समझते।
उसके पिता ने उन सबपर एक नज़र डाली और सामान्य सी बातचीत कर कर्तव्यों की इतिश्री करली।
भाई भाभी के साथ उनके बच्चे भी वहीँ उन बच्चियों से अजीब सी दूरी बनाकर रखते।
इतना एहसास तो उनको भी हो ही चुका था अपने साथ हुए बर्ताव से..कि एक सप्ताह भी बोझ की तरह कटेगा।
कि अब हमें प्रेम और अपनेपन की आशा किसी से नहीँ।
व्यापारी नाना जहाँ अपने बेटों के बच्चों पर ममता लुटाते ,वहीँ चन्द दिनों के लिये आये बच्चों से सयंत बातचीत करते।
पितृछाया से अतृप्त वंचित बच्चे उनमें भी पिता समान होने का अँश खोजते ।
पूनम ने बच्चियों को सिखाया था कि तुम्हें घरेलू कार्यों में भी कुशलता सीखनी चाहिये,बड़े ख़ुश होते हैं।
शाम को नाना दुर्गादयालजी के आने पर रोमी ने अपने पिता की तरह ज्यों ही उन्हें चाय और नाश्ता रखा।
उन्होंने अपने पास बैठने को कहा,स्नेह की प्यासी रोमी ज्योँ ही बैठी पढ़ाई की बातों से शुरु हुई सुई उसके दादीबाबा के आर्थिक स्तर पर सवाल और उनके अपमान पर रुकी।
वह भी उन बातों पर जिनमें उस का कोई दोष ही न था।
उसने सवाल कर दिया नानाजी से,” इसमें मेरी मम्मी की क्या गलती पहले आपने ही उनकी शादी वहाँ की और अब आप ही ,बुराई कर रहे हैं।”
पूनम ! वो क्रोध में बौखलाकर बोले ले जाओ इसे भई बहुत वाचाल है ये लड़की।
“एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा “बाप भाई हैं नहीं क्या होगा इस लड़की का?
पूनम अन्दर ने आई और तड़ाक से एक झापड़ रसीद कर दिया बेटी के गाल पर…
“माफ़ी माँगों इसी वक्त”माँ को क्रोध से काँपते देख रोमी ने फिर आधे मन से माफ़ी माँग ली।
पर रोमी ने घर वापस लौटने के बाद उनलोगों से बात न करने की प्रतिज्ञा सी कर ली।
उसे अपने दादाजी का साथ अधिक भाता,थोड़े दिन बाद पूनम की नौकरी लग गई।
रोमी और उसकी बहनें भी पढ़ाई में व्यस्त हो गईं ,अब वह ननिहाल जाती भी तो नकारात्मक मामाओं और नाना की बातों से भरसक बचने का प्रयास करती।
शायद पिता के अभाव में आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा भावना भी जल्दी जन्म ले लेती
है बच्चों में।
एक हफ्ते के वहाँ प्रवास का समय और उस घर के पाँच दिन पूनम और उसकी बेटियों को भी काँटो की सेज की अनुभूति देते।
ग्रेजुएशन करती रोमी अब मन की बात कम करती और जो भी बोलती वह भी बड़ा मर्मभेदी ।जो कड़वा बोलने पर सुनने वालों को चुभ जाता।
अब बच्चे दो टूक वहाँ जाने से मना कर देते,और पूनम भी नौकरी का हवाला दे बचने का प्रयास करती
एक दिन उसके दुर्गादयाल जी ही पूनम की ससुराल मिलने आये।
रोमी और उसकी बहनों ने उनका खूब सत्कार किया।
उन्होंने पूनम से कहा कि यह तुम्हारी बेटी अगर बात कम करे तो हीरा है हीरा बस नीम की तरह कड़वाहट न हो तो सर्वगुण सम्पन्न है।
बड़ो को सम्मान देने की सीख पर अमल करने का आदतानुसार लंबा-चौड़ा भाषण देने के साथ साथ उसके कम सम्पन्न ददिहाल कोसते हुए बोले…
“पर उपदेस कुसल बहुतेरे”
रोमी ने तुरन्त कहा,”जे आचरहिं ते नर न घनेरे”
उसके उत्तर से ,इस बार मानों उनके चेहरे पर घड़ों पानी पड़ गया।
पूनम भी माफ़ी का नाम इसबार होठों पर न ला सकी,कमरे में सन्नाटा छा गया।
इसबार ख़ामोशी रोमी ने ही तोड़ी,”नानाजी मैँ आदर करती हूँ पर अब अकारण माफ़ी नहीँ माँगना चाहती मैँ,
पूनम ने चुप रहने का इशारा भी किया,और कहा “बहुत बागी हो रही है”
“बोलने दे इसे पूनम, तभी शायद ये सिलसिला खत्म हो निकल जाने दे मन की बात”दुर्गादयालजी ने कहा।
रोमी रोते हुए कहने लगी,”ये सिलसिला मैँ भी रोकना चाहती हूँ।ये कड़वाहट एकदिन में तो नहीँ जन्मी मेरे भीतर।
अगर मेरे पापा नहीं हैं ,तो उनके कमउम्र होने के लिये हमारे साथ-साथ उनसे जुड़ा हर रिश्ता भी उतना ही दोषी है।
हमें बिना अपराध अपनोँ से बड़ों की अकारण ही कड़वी बातें क्यों सुननी पड़ती है?
और सहन न होने पर कुछ कहो तो माफ़ी भी माँगनी पड़ती है?
क्या आयु में बड़े होने से किसी छोटे के साथ किये गये दुर्व्यवहार ,दुर्व्यवहार नहीं होता?
बड़प्पन का माफ़ी से कोई लेना देना नहीं होता उसके इन मासूम सवालों का उत्तर देने की शायद किसी मे हिम्मत न थी।
रोमी के प्रश्नों और पूनम की भरी और भेदती आँखों को अपनी तरफ़ देखते हुए सन्न से रह गये दुर्गादयालजी और गायत्रीदेवी।
उनके बचपन में बोये गये कटु वचनों की फ़सल इस तरह लहलहायेगी उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
स्तब्धता भरे माहौल में जहाँ वो अपनी बातों पर विचार करने में डूबे थे।
थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद बोले ,”बच्चों शायद हम बड़े भी जाने अनजाने में ,चाहे अनचाहे अपने मन की कड़वाहट उड़ेल जाते हैं।
बिना ये सोचे कि ये कड़वाहट आख़िर किसे झुलसा रही है हमारी ही अगली पीढ़ी को,तुम्हारी बात भी वाज़िब है।
सिर झुकाये गायत्रीजी भी बोलीं,”गलती तो हुई है हमसे, तुम बच्चों के साथ,प्यार के बदले कड़वे बोल?
तुम्हारे सवाल भी ग़लत नहीँ आख़िर इस तरह कोई बच्चा इतने कड़वे बड़े को कैसे सम्मान दे सकता है?
सही बात है समधिन जी हम बड़ों को भी अपने सम्मान का लिहाज़ रखकर बच्चों के कोमल मन का ध्यान रखना चाहिये।
रोमी-इसबार दिल से माफ़ी माँग रही हूँ,
दादी – मेरी मीठी निंबौली और सब हँस पड़े।
