Summary: चुप्पी तोड़ें, आत्मविश्वास जोड़ें
पीरियड्स पर चुप्पी एक किशोरी के मन में डर और भ्रम पैदा कर देती है, जबकि सही समय पर दी गई जानकारी उसे आत्मविश्वास देती है। यह कहानी बताती है कि खुली बातचीत कैसे बेटियों ही नहीं, बेटों को भी संवेदनशील और समझदार बनाती है।
Hindi Short Story: पंद्रह साल की अनुष्का स्कूल से लौटकर जैसे ही अपने कमरे में कपड़े बदलने गई, अचानक उसकी नज़र अपने कपड़ों पर पड़े लाल दाग़ पर गयी । एक पल को वह सन्न रह गई। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। हाथ काँपने लगे और आँखों में डर साफ़ झलक रहा था। वो सोचने लगी कहीं मुझे कोई गंभीर बीमारी तो नहीं? उसका दिमाग़ कई सवालों से भर गया। वह घबरा कर रोने लगी और डर के मारे वहीं ज़मीन पर बैठ गई। कुछ देर बाद माँ, सुनीता, कमरे में आईं तो अनुष्का की हालत देखकर चौंक गईं। रोती हुई बेटी का सफ़ेद चेहरा और डर से भरी आँखें देखकर उसने घबराकर पूछा, क्या हुआ बेटा? अनुष्का ने काँपती आवाज़ में बस इतना कहा, माँ खून आ रहा है। मुझे बहुत डर लग रहा है। सुनीता एक पल में समझ गईं उसने अनुष्का को गले से लगा लिया और समझाया डरने की
कोई बात नहीं है, बेटा। ये तुम्हारे बड़े होने की निशानी है। इसे पीरियड्स कहते हैं।
अनुष्का ने हैरानी और डर के मिले-जुले भाव से माँ की तरफ देखा और कहा ,लेकिन माँ, मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया इसलिए मुझे लगा मैं बीमार हूँ। सुनीता ने अनुष्का को बिस्तर पर बैठाया, उसे पानी पिलाया और बड़े प्यार से समझाने लगीं, कैसे हर लड़की के शरीर में बदलाव आते हैं, पीरियड्स क्यों होते हैं, यह कोई बीमारी नहीं बल्कि एक प्राकृतिक क्रिया है। उन्होंने उसे सैनिटरी पैड इस्तेमाल करना सिखाया, साफ़-सफाई के बारे में बताया और यह भी समझाया कि इन दिनों में आराम और देखभाल कितनी ज़रूरी होती है।

धीरे-धीरे अनुष्का का डर कम होने लगा। उसकी आँखों में अब सुकून था, लेकिन मन में एक सवाल भी, उसने सुनीता से पुछा माँ, अगर ये सब नॉर्मल है, तो आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया ? यह सवाल सुनीता के दिल में चुभ गया। उस रात जब अनुष्का सो गई, सुनीता देर तक जागती रहीं। उन्हें अपना बचपन याद आ गया, कैसे उन्होंने भी डर और शर्म के साथ यह अनुभव झेला था। समाज की चुप्पी, झिझक और ‘बाद में बताएँगे’ वाला रवैया।
उन्होंने सोचा काश मैंने अपनी बेटी को पहले ही इसके बारे में समझा दिया होता,तो आज उसे इतना डर नहीं लगता।
अगले दिन सुनीता ने एक अहम फैसला लिया। उन्होंने अपनी सहेलियों, रिश्तेदारों और मोहल्ले के सारे माता-पिता से बात की। इस बार उन्होंने बिना झिझके साफ़-साफ़ कहा, हमें अपनी बेटियों को पीरियड्स के बारे में पहले से बताना चाहिए। यह कोई शर्म की बात नहीं है। जितनी जल्दी वे जानेंगी, उतना ही आत्मविश्वास उनके अंदर आएगा।
सुनीता ने एक और ज़रूरी बात उठाई, उन्होंने कहा सिर्फ़ लड़कियों को नहीं, बल्कि लड़कों को भी समझाना ज़रूरी है। जब लड़कों को पता होगा कि पीरियड्स क्या होते हैं, तो वे मज़ाक नहीं बनाएँगे, घूरेंगे नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर मदद करेंगे। उन्होंने कहा,अगर कोई लड़की स्कूल में परेशान हो, तो लड़का उसे अजीब न समझे, बल्कि पानी लाकर दे, टीचर को बताए या बस सम्मान से पेश आए। यही असली समझदारी है।
धीरे-धीरे यह समझ बनने लगी कि माँ-पिता दोनों को मिलकर ही बेटों और बेटियों से खुलकर बात करनी चाहिए। घर में ऐसा माहौल बनाया गया जहाँ बेटियाँ केवल माँ से ही नहीं, बल्कि पिता से भी बिना झिझक अपनी हर परेशानी, सवाल और अनुभव साझा कर सकें। ताकि पीरियड्स या किसी भी शारीरिक बदलाव को लेकर उन्हें कुछ भी छुपाने की ज़रूरत न पड़े और वे खुद को हर रिश्ते में सुरक्षित महसूस करें।
अपनी माँ की मोहल्ले में आये बड़े बदलाव को लेकर अनुष्का के मन में माँ के लिए प्यार और सम्मान दोनों ही बढ़ गए थे। एक दिन उसने माँ से कहा, अच्छा हुआ आपने मुझे समझाया। सुनीता मुस्कुरा दीं। उनके मन में अब कोई पछतावा नहीं, बल्कि एक सीख बैठ गयी थी, चुप्पी डर पैदा करती है, और जानकारी आत्मविश्वास।
