aankh ki kirkiri by ravindranath tagore
aankh ki kirkiri by ravindranath tagore

बड़ी देर तक सोचता रहा। खत को उसने कई बार पढ़ा। कुछ दिनों तक जो दूर के आभास की तरह रहा, आज वह साफ प्रकट होने लगा। उसकी जिंदगी के आसमान के एक कोने में जो धूमकेतु छाया था, आज उसकी उठी हुई पूंछ आग की रेखाओं में जलती हुई दिखाई पड़ी।

चिट्ठी यह असल में विनोदिनी की है। भोली आशा ने इसे अपनी बात समझकर लिखा है। पहले जिन बातों को उसने कभी सोचा नहीं, विनोदिनी के लिखाने से वे ही बातें उसके मन में जाग उठीं। जो नई वेदना पैदा हुई, उसे इस खूबी के साथ आशा तो हर्गिज जाहिर नहीं कर सकती थी। वह सोचने लगी, ‘सखी ने मेरे मन की बात को ऐसा ठीक-ठीक कैसे समझ लिया! और, इतना ठीक से जाहिर कैसे किया!’ वह अपनी अंतरंग सखी को और भी मजबूत सहारे की तरह पकड़ बैठी। क्योंकि जो बात उसके मन में है, उसकी भाषा उसकी सखी के पास है इतनी बेबस थी वह!

महेन्द्र कुर्सी से उठा। भवों पर बल डाला। विनोदिनी पर क्रोध करने की कोशिश की। मगर बीच में आशा पर गुस्सा आ गया। आशा की मूर्खता तो देखो, पति पर यह कैसा जुल्म! वह फिर बैठ गया और इस बात के सबूत में उस खत को फिर से पढ़ गया। अन्दर-ही-अन्दर खुशी होने लगी। यह समझकर उसने चिट्ठी को पढ़ने की बहुत चेष्टा की, मानो वह आशा की ही लिखी हो। लेकिन इसकी भाषा किसी भी तरह से भोली आशा की याद नहीं दिलाती। दो ही चार पंक्तियां पढ़ते ही सुख से पागल कर देने वाला एक झागभरी शराब जैसा सन्देह मन को ढाप लेता। प्रेम की इस प्रतीती ने महेन्द्र को मतवाला बना दिया। उसे लगने लगा चाहे खुद के प्रति हिंसा करके ही मन को किसी और तरफ लगा दे। उसने मेज पर जोरों का मुक्का मारा और उछल कर खड़ा हो गया। बोला-“हटाओ, चिट्ठी को जला डालें।” चिट्ठी को वह लैंप के करीब ले गया। जलाया नहीं, फिर एक बार पढ़ गया। अगले दिन नौकर कागज की बहुत-सी राख उठा ले गया था, लेकिन यह राख आशा की चिट्ठियों की न थी, उसके उत्तर की कई अधूरी कोशिशों की राख थी, जिन्हें अंत में महेन्द्र ने जला दिया था।

इस बीच और एक चिट्ठी आ पहुंची-

“तुमने मेरे पत्र का जवाब नहीं दिया? अच्छा ही किया सही बात लिखी तो नहीं जाती; तुम्हारा जो जवाब है, उसे मैंने मन में समझ लिया। भक्त जब अपने देवता को पुकारता है तो देवता क्या जबान से कुछ कहते हैं? लगता है, दुखिया की तुलसी को चरणों में जगह मिल गई।

“लेकिन भक्त की पूजा से कहीं शिव की तपस्या टूटती हो तो मेरे हृदय के देवता, नाराज न होना! वरदान दो या न दो, आंखें उठाकर निहारो या न निहारो, जान सको या न जान सको-पूजा किये बिना भक्त की दूसरी गति नहीं। इसलिए आज भी दो पंक्तियां लिख भेजती हूं–हे! मेरे पत्थर के देवता तुम अडिग ही रहो!”

महेन्द्र फिर जवाब लिखने बैठा लेकिन पत्र आशा को लिखते हुए कलम की नोंक पर जवाब विनोदिनी का आ जाता। चालाकी से इधर-उधर की हांकते हुए उससे लिखते नहीं बनता। लिख-लिखकर बहुत-से पन्ने फाड़ डाले। एक लिखा भी गया तो उसे लिफाफे में भरकर आशा का नाम लिखते हुए अचानक किसी ने उसकी पीठ पर चाबुक जमाया-“बेईमान! विश्वस्त बालिका से इस तरह दगा!” महेन्द्र ने पत्र को सैकड़ों टुकड़े करके फेंक दिया और बाकी रात मेज पर दोनों हथेलियों में मुंह छिपाए अपने को मानो अपनी ही नजर से छिपाने की कोशिश करता रहा।

तीसरा पत्र? “रूठना जो कतई नहीं जानता, वह भी क्या प्यार करता है? अपने प्यार को अनादर और अपमान से बचाए न रख सकूं तो वह तुम्हें दूंगी कैसे?”

“शायद तुम्हारे मन को ठीक-ठीक समझ नहीं पाई हूं, तभी इतनी हिम्मत कर सकी हूं। तुम छोड़ गए तो भी मैंने ही बढ़कर चिट्ठी लिखी; जब तुम चुप हो गए थे, तब भी मैं मन की कह गई हूं। मगर तुम्हारे साथ अगर गलती की है, तो वह भी क्या मेरा ही कसूर है? शुरू से आखिर तक सारी बातें एक बार दुहराकर देखो तो सही कि मैंने जो कुछ समझा था, वह तुम्हीं ने नहीं समझाया क्या?”

“चाहे जो हो, गलत हो या सही, जो लिखा है, वह मिटने का नहीं, जो दिया है, वह वापिस नहीं ले सकूंगी, यही शिकायत है। छि:छिः ऐसी शर्म भी नारी के नसीब में आती है। लेकिन इससे यह हर्गिज न समझना कि जो प्यार करती है, वह अपने प्यार को बार-बार अपमानित कर सकती है। साफ बताओ कि मेरी चिट्ठी की चाहत नहीं हो तो बताओ और इसका जवाब न मिला तो यहीं तक बस।”

महेन्द्र से और न रहा गया। मन में बोला-“खूब नाराज होकर ही घर लौट रहा हूं। विनोदिनी का खयाल है, मैं उसे भूलने के लिए घर से भाग खड़ा हुआ हूं।” उसकी इस हेकड़ी को भुलाने के लिए ही महेन्द्र ने उसी दम घर लौट जाने का संकल्प किया।

इतने में बिहारी आ गया। उसे देखते ही महेन्द्र के मन की उमंग दुगनी हो गई। अब तक संदेहों के चलते बिहारी से उसे ईर्ष्या होती रही थी और दोनों में गांठ पड़ती जा रही थी। चिट्ठी पढ़ने के बाद और ज्यादा आवेग में उसने उसकी अगवानी की।

लेकिन बिहारी का चेहरा आज उतरा हुआ था। महेन्द्र ने सोचा, “बेचारे ने इस बीच विनोदिनी से जरूर मुलाकात की होगी और वहां से ठोकर खाकर आया है!” उसने पूछा-“क्यों भाई, इस बीच मेरे घर गए थे कभी?”

बिहारी ने कहा-“वहीं से होकर आ रहा हूं अभी।”

मन-ही-मन बिहारी की पीड़ा का अनुमान करके महेन्द्र को अच्छा न लगा। उसने मन में कहा-‘अभागा! किसी महिला ने कभी उसे नहीं चाहा। फिर भी उसने बातचीत शुरू करते हुए पूछा-“कैसे हैं सब?”

इस बात का जवाब देने के बजाय वह बोला-“घर छोड़कर अचानक यहां।”

महेन्द्र ने कहा-“इधर लगातार नाइट ड्यूटी पड़ रही है-वहां दिक्कत हो रही थी।”

बिहारी बोला-“नाइट ड्यूटी तो इसके पहले भी पड़ी है, मगर घर छोड़ते तो नहीं देखा कभी?”

महेन्द्र ने हंसकर कहा-“क्यों कोई शक हो रहा है।”

बिहारी बोला-“मजाक न करो तुम्हें कहीं नहीं रहना है। चलो इसी वक्त घर चलो।”

घर जाने को तो वह तैयार ही बैठा था; मगर बिहारी ने आग्रह किया तो वह मना कर गया, गोया घर जाने की उसे जरा भी इच्छा नहीं। बोला-“पागल हुए हो, मेरे एक साल पर पानी फिर जाएगा।”

बिहारी ने कहा-“देखो महेन्द्र भैया, मैं तुम्हें तब से देखता आया हूं, जब तुम छोटे-से थे। मुझे फुसलाने की कोशिश न करो! तुम जुल्म कर रहे हो।”

महेन्द्र–“जुल्म कर रहा हूं, किस पर, जज साहब!”

बिहारी नाराज़ होकर बोला-“तुम सदा दिल की तारीफ करते आए हो, अब तुम्हारा दिल कहां गया?”

महेन्द्र–“फिलहाल तो अस्पताल में है।”

बिहारी-“चुप रहो! तुम यहां हंस-हंसकर मुझसे मजाक कर रहे हो और वहां तुम्हारी आशा तुम्हारे कमरों में रोती फिर रही है।”

आशा के रोने की बात सुनकर अचानक महेन्द्र को धक्का लगा। अपने नये नशे में उसे इसकी सुध न थी कि दुनिया में और भी किसी का सुख-दु:ख है। वह चौंका! पूछा-“आशा क्यों रो रही है?”

बिहारी खीझकर बोला-“यह तुम्हें नहीं मालूम!”

महेन्द्र-“तुम किस बात पर नाराज हो। इस बात पर कि मैं सर्वज्ञ क्यों नहीं हूं तो तुम्हें ईश्वर पर नाराज होना पड़ेगा।”

बिहारी ने अपनी आंखों जो कुछ देखा, आदि से अंत तक कह सुनाया। उसे याद आ गया कैसे विनोदिनी से लिपटकर आशा की आंखें बह रही थीं। उसका गला रुंध गया। महेन्द्र को खूब पता था कि आशा का मन वास्तव में किधर है!

महेन्द्र बोला-“खैर चलो। गाड़ी बुला लो!”

महेन्द्र घर पहुंचा। उसका चेहरा देखते ही आशा के मन का सारा संदेह कुहरे के समान एक ही क्षण में फट गया। अपनी चिट्ठियों की बात सोचकर महेन्द्र के सामने मारे शर्म के वह सिर न उठा सकी। इस पर महेन्द्र ने शिकवा किया- “ऐसे आरोप लगाकर तुमने चिट्टियां लिखीं कैसे!”

और उसने जाने कितनी बार पढ़ी हुई वे तीनों चिठियां अपनी जेब से निकालीं। आशा ने गिड़गिड़ाकर कहा-“तुम्हारे पैर पड़ती हूं, इन चिट्ठियों को फाड़ फेंको!”

महेन्द्र से उन चिट्ठियों को ले लेने के लिए वह उतावली हो गई। महेन्द्र ने उसे रोककर चिट्ठियों को जेब के हवाले किया। कहा-“मैं काम से गया और तुमने मेरा मतलब ही नहीं समझा? मुझ पर संदेह किया?”

छलछलाती आंखों से आशा बोली-“अबकी बार मुझे माफ कर दो! आइन्दा ऐसा न होगा।”

महेन्द्र ने कहा-“कभी नहीं?”

आशा बोली “कभी नहीं।”

महेन्द्र ने उसे अपने पास खींचकर चूम लिया। आशा बोली-“लाओ, चिट्ठियां दे दो, फाड़ डालूं!”

महेन्द्र बोला-“रहने दो उन्हें।”

आशा ने विनय से यह समझा-“मेरी सजा के रूप में इन्होंने चिट्ठियां रख ली हैं।”

चिट्ठियों के चलते आशा का मन विनोदिनी की तरफ से जरा ऐंठ गया। पति लौट आए, यह खबर वह विनोदिनी से कहने न गई, बल्कि उससे कतराती रही। विनोदिनी इसे ताड़ गई और काम के बहाने बिल्कुल दूर ही रही।

महेन्द्र ने सोचा-“अजीब है! सोचा था, अब की बार विनोदिनी को मजे से देख पाऊंगा-उलटा ही हुआ। फिर उन चिट्ठियों का मतलब?”

महेन्द्र ने अपने मन को इसके लिए सख्त बनाया कि नारी के दिल को अब कभी समझने की कोशिश नहीं करेगा। सोच रखा था, “विनोदिनी पास आना भी चाहेगी तो मैं दूर-दूर रहूंगा।” अभी उसके जी में आया, ‘न, यह तो ठीक नहीं हो रहा है-सचमुच ही हम लोगों में कोई विकार आ गया है। खुले दिल की विनोदिनी से बातचीत, हंस-दिल्लगी करके संदेह की इस घुटन को मिटा डालना ही ठीक है।”

उसने आशा से कहा-“लगता है, मैं ही तुम्हारी सखी की आंख की किरकिरी हो गया। उनकी तो अब झांकी भी नहीं दिखाई पड़ती।”

उदास होकर आशा बोली “जाने उसे क्या हो गया है!”

इधर राजलक्ष्मी आकर रोनी-सी होकर बोलीं- “बेटी, अब तो विपिन की बहू को रोकना मुश्किल हो रहा है।”

आशा बोली-“मुझे क्या पता। महेन्द्र चौंकते मगर अपने पर नियंत्रण करते हुए उसने पूछा, “क्यों मां?” बेटा, वह तो अबकी बार अपने घर जाने के लिए अड़ गई है। तुझे तो किसी की खातिरदारी आती नहीं। एक पराई लड़की अपने घर आई है, उसका अगर घर के लोगों जैसा आदर-मान न हो तो रहे कैसे?”

विनोदिनी सोने के कमरे में चादर जैसी रही थी। महेन्द्र गया। आवाज दी-“किरकिरी!”