किताबें खरीदना और पढऩा तो जैसे धर्मबीर सिंह का जुनून था, जहां भी जाते वहां से किताबें जरूर लाते। कभी-कभी तो पत्नी ललिता बुरा भी मान जाती, क्योंकि जाते वक्त धर्मबीर जी मनुहार से पूछते… तुम्हारे लिए क्या लाऊ? ललिता उत्साहित हो सूची पकड़ा देती, पर वापसी में किताबों के सिवा कुछ न होता। जब वे किताबें खरीदने लगते तो भूल जाते कि किताबों के लिए पर्याप्त पैसा है या नहीं। उनका मानना था कि किताबें वह शौक है जिसमें डूबकर इंसान अपने भीतर के कौतूहल को शांत करता है। ललिता किताबों को अपना सौतन बताती तब धर्मबीर जी समझाते, एक तुम्ही तो हो जो मेरे मन की हर बात समझती हो, उन्हें पता था कि ललिता चाहे किताबों को कितना भी भला-बुरा कह ले, पर वह भी किताबों से उतना ही प्यार करती है। जब धर्मबीर जी किताबों की झाड़-पोंछ करते तो ललिता साथ बैठकर किताबों को करीने से रखती, मानो किताबें धर्मबीर जी के शरीर का ही हिस्सा हो।
इधर कुछ दिनों से ललिता बुझी-बुझी दिखती, कई बार उन्होंने पूछा भी, पर वह बोलती ऐसा कुछ नहीं है, तुम्हारे मन का वहम है, यह सुनकर धर्मबीर जी को इत्मीनान हो जाता। एक शाम ललिता खाना बना रही थी और धर्मबीर जी कुछ पढ़ रहे थे, अचानक रसोई से ललिता के खांसने की आवाज आने लगी और धीरे-धीरे बढ़ती गई। धर्मबीर जी रसोई तक पहुंचे, ललिता अपने साड़ी के पल्ले से मुंह ढके अनवरत खांसे जा रही थी, उसके मुंह से खून निकल रहा था। अचानक यह देखकर धर्मबीर जी घबरा गये और जैसे ही आगे बढ़कर ललिता को सहारा दिया, वह लुढ़क गई। धर्मबीर जी यह देखकर अवाक रह गए, उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि अब करना क्या है, ललिता को अपने गोद में लिटाकर फूट-फूट कर रो पड़े।
घर में अकेले विचलित से घर के हर कोने में ललिता की मौजूदगी को टटोल रहे थे, उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि ललिता उन्हें छोड़कर जा चुकी है। विपिन उनका एकलौता बेटा विदेश में नौकरी करता था और वहीं किसी विदेशी बाला से शादी कर मां-बाप को भूल ही गया था, फिर भी धर्मबीर जी ने उसे संदेशा दे दिया कि उसकी मां अब हमेशा के लिए चली गई है। संदेशा पाकर बेटा आया भी मगर अपनी व्यस्तता का राग अलापते हुए सब कुछ तीन दिन में समाप्त कर दिया। धर्मबीर जी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन ऐसा भी आयेगा कि जीवन के इस मोड़ पर वह बिलकुल अकेले रह जायेंगे। बेटा चला गया, झूठी दिलासा दे गया कि जल्द ही उन्हें अपने पास बुला लेगा। पर धर्मबीर जी इस घर को छोड़कर कहीं जाना भी नहीं चाहते थे, इस घर में ललिता की यादें थी, उनका सुख-दु:ख था और सबसे बेशकीमती थी उनकी किताबें। उनका मानना था कि किताबें एक अमूल्य धरोहर हैं और इन्हीं किताबों के संसार में मनुष्य के अनमोल विचार सुरक्षित हैं।
धर्मबीर जी का अब सारा समय किताबों के इर्द-गिर्द ही बीतता, कभी-कभी तो वो घंटों किताबों को अपलक निहारा करते, इन किताबों में ललिता के स्पर्श की छुवन महसूस करते। पहले तो पति-पत्नी मिलकर किताबों की देखभाल करते थे पर अब बढ़ती आयु के कारण शरीर से अशक्त हो चुके थे। फिर भी हमेशा कुछ न कुछ झाड़-पोंछ करते रहते। ललिता के जाने के बाद से इन किताबों को ही सहारा बना लिया था। पहले तो वह ललिता के साथ सोने के पहले बड़े ही इत्मीनान से किताबों का निरीक्षण करते और जब उन्हें ये विश्वास हो जाता कि किताबें पूर्णतया सुरक्षित हैं, तभी चैन की नींद सोते। अब जब ललिता नहीं रही तो खुद को उन्होंने उसी कमरे में फिक्स कर लिया, किताबों के बीच में उनकी पतली चौकी थी और उस पर विराजमान वो खुद को उन अनबोलती किताबों का प्रहरी मानते थे।
गर्मी की एक शाम, उमस कुछ ज्यादा थी, धर्मबीर जी ने सोचा क्यूं न थोड़ी देर के लिए बाहर चारपाई डालकर लेट लूं जिससे कुछ राहत मिल जाए, जब वो आंगन में लेटे तो नीले आसमान में असंख्य तारों के बीच ललिता को तलाशते दूर विचरने लगे, और न जाने कब आंख लग गई। अचानक मिली तपिश से जब उनकी आंख खुली तो सामने का मंजर देखकर उनकी रूह कांप गई। किताबों के कमरे से लपटें उठ रही थी, धर्मबीर जी का तो पागलों सा हाल हो गया, वो दौड़कर कमरे के दरवाजे तक जाते और अगले ही पल ठिठक जाते। अचानक वो बिजली की फूर्ती से कमरे में प्रवेश कर गए और पागलों की तरह इधर-उधर दौडऩे लगे। किताबों के साथ-साथ आग ने धर्मबीर जी को भी लपेट में ले लिया पर इसका तनिक एहसास भी उन्हें नहीं हुआ, उन्हें तो जैसे किसी भी तरह से अपनी धरोहर को बचाने कीचिंता थी। धीरे-धीरे एक जीता जागता इंसान किताबों के साथ स्वयं भी अग्नि में समा गया।
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