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मौका परस्त लोग-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: अब दोस्ती होती नहीं जनाब,गांठी जाती है।प्रोफेशनल होकर रिश्ते बनाए जाते हैं।प्रैक्टिकल होकर रिश्ते निभाए जाते हैं।जितनी जिसकी औकात, उतनी तवज्जो दी जाती है।गर्दिश में हो अगर हालात, सगे रिश्तेदार भूल जाते हैं।पारिवारिक कार्यक्रम में पद और प्रतिष्ठा के आधार परमेहमान अधिक नजर आते हैं।अब रिश्ते नाते मतलब देखकर बनाए जाते हैं।दिखाते हैं […]

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फटी शर्ट—गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: वो फटी सी शर्ट में बच्चा,शोरूम के बाहर खड़ा था।और अपनी सूनी आंखों सेपुतले को नहीं शर्ट में निहार रहा था। किसी को नहीं तन ढकने को कपड़े जहांवहां पुतले नए कपड़ों में सज रहे।कोई खाता झूठन से बीन कर सड़कों पर,कहीं दावतो मैं यहां छप्पन भोग फिंक रहे। पर यहां भी देखो […]

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माँ की संदूक-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Short Poem: न जाने उस बक्से में क्या,  रख देती  थी मेरी मां।जब भी उसको खोले तब तब, मुस्का देती मेरी मां।।मैं भी सिरहाने बैठ गई, जब वो बक्सा खोली थी।देखा उसमें अपना बचपन, यादों की एक झोली थी।।एक में थी दीदी की गुड़िया, और भाई की बंदूक।उन सारे बीते लम्हों से, भर चुकी […]

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90 की शादी-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: 90s की शादी की बात जब कभी भी आती हैहोठों  पर एक सुंदर सी मुस्कान खुद ही खुद आ जाती है। शादी में दोस्तों का बिना प्लानिंग का डांस,वो आंखों ही आंखों में दोनों तरफ से रोमांस।हर क्लिक पर खुशी चेहरे पर फैल जाती है,90s की शादी की बात.. वो दूल्हे के गले […]

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अक्सर में चुप हो जाती हूँ-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: रोज सब्जी मैं अपनी पसंद की ही बनाती हूँ,खाने में मेरी पसंद चलती ही कब है ऐसा कहकर अक्सर मैं चुप हो  जाती हूँ।कपड़े में खूब बारीकी से छाँटकर लाती हूँ,मेरे पास पहनने के लिए कपड़े ही कहा है ऐसा कहकर अक्सर में चुप हो जाती हूं।ज्वेलरी भी मैं तुमको मनाकर खरीद ही […]

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एक स्त्री की वसीयत-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: एक स्त्री की वसीयतहाँ  मर रही थीवो अंदर ही खाट परदुनिया बाहरउसकी वसीयत पूछ रही थीवसीयत तो लिखी हुई थीआकाश परदर्द की स्याही सेबचपन उसकानीम के पेड़ पर बना झूला हीदेख पायाजवानी कमरेंकी दहलीज़  ही देख पाईउसके खुबानी गालो कीरंगत बढ़ने से पहले ही वो ब्याह दी गईप्रेम का व्याकरण अधूरा ही रह […]

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दहेज—गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: अब यह दहेज फिर क्यों साथ मेंकलेजे का टुकड़ा, तुम्हें दे दिया है।अब यह दहेज फिर, किस बात में।।कतरा लहू का, तुम्हें दे दिया है।अब यह दहेज फिर, क्यों साथ में।।कलेजे का टुकड़ाअपने लहू से ,यह सींचा है फूल।संजोकर अरमान, दिल में बहुत।।किसी की नजर, नहीं लग जाये ।पाला है संभालकर, इसको बहुत।।फूल […]

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मैं और तुम पति-पत्नी थे—गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: तुम और मैं पति पत्नी थे, तुम माँ बन गईं मैं पिता रह गया। तुमने घर सम्भाला, मैंने कमाई, लेकिन तुम “माँ के हाथ का खाना” बन गई, मैं कमाने वाला पिता रह गया। बच्चों को चोट लगी और तुमने गले लगाया, मैंने समझाया, तुम ममतामयी बन गई मैं पिता रह गया। बच्चों […]

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हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: मैं हिन्दुस्तान की बेटी,मेरी पहचान है हिन्दी।मुझे प्यारी है हर भाषा,मगर अभिमान है हिन्दी। निहित करुणा है माँ जैसी,पिता सा प्यार है जिसमें।प्रकट भावों को जो करती है,वो आधार है हिन्दी। ये संस्कृत की दुलारी है,जुबाँ सबसे ये न्यारी है।सहज, मीठी,मनोरम सी,मगर फिर भी बेचारी है। कहीं गुम सी हुई है आजकल,जाने क्यों […]

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स्त्री पुरुष से सीखती है-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: स्त्री जो भी सीखती हैवह काम आती है किसी पुरुष के!स्त्री सीखती हैआटा गूंथनापुरुष का पेट भरता हैस्त्री सीखती हैघर बुहारनापुरुष घर में रहता हैस्त्री सीखती हैबिंदी लगानापुरुष प्रेम करता हैस्त्री सीखती हैबच्चे पालनापुरुष पिता बनता हैबस किसी दिन स्त्री ने सीखना चाहाघर से बाहर निकलनापुरुष ने देहरी बनाईऔर कहाबाहर रावण रहता हैऔर […]

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