Hindi Poem: वो फटी सी शर्ट में बच्चा,
शोरूम के बाहर खड़ा था।
और अपनी सूनी आंखों से
पुतले को नहीं शर्ट में निहार रहा था।
किसी को नहीं तन ढकने को कपड़े जहां
वहां पुतले नए कपड़ों में सज रहे।
कोई खाता झूठन से बीन कर सड़कों पर,
कहीं दावतो मैं यहां छप्पन भोग फिंक रहे।
पर यहां भी देखो कुदरत ने कुछ अजब सा सवांरा है
धनी हो या निर्धन अपना आशीष सब पर एक सा वारा है।
एक मेहनतकश निर्धन को नींद आ जाती है फुटपाथों पर भी,
वही धनी कोई फाइव स्टार में भी सो कर रात भर जागा है।
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