Hindi Poem: क्यूं ना हो जाओ तुम ‘निशब्द ‘
जब भावनाओं का ज्वार फटने लगे,
और मन पर ना रहे काबू ,
तब ओढ़ लेना तुम मौन की चादर को ,
और हो जाना ‘ निशब्द’ ।
जब खुशियां दे दरवाजे पर दस्तक,
तो उनका भी करना तुम स्वागत ,मुस्कुराकर
और समेट लेना उन्हें भी ‘निशब्द ‘होकर।
जब दिल टूटे ,
और मन कहना चाहे, कुछ चीख-चीखकर कर ,
तब भी ना देना,
तुम उन्हें शब्द,
और हो जाना’ निशब्द ‘
और हां यदि मिल जाए तुम्हें सच्चा प्रेम,
तो बसा लेना उसे भी अपनी आंखों में,
और हो जाना ‘निशब्द ‘ ।
जब जब निकले एक शब्द के कई अर्थ ,
तो कर दो उनको भी निरर्थक ,
होकर तुम ‘निशब्द ‘।
और जब-जब कोशिश की जाए तुम्हें घेरने की ,
किसी मकड़जाल में ,
तब भी , तुम बाहर आने की कोशिश करना ,
‘निशब्द ‘होकर ।
जब जब कोई छोड़ने लगे सभ्यता का दामन ,
और ना रहे उसकी भाषा पर संयम ,
तब भी मुस्कुराकर हो जाना ,
तुम ‘निशब्द’ ।
और जो रहना चाहो तुम , निर्विवाद
तब भी होना होगा तुम्हें ‘निशब्द ‘
‘ निशब्दता ‘कर जाती है वो काम ,
जिसको ‘शब्द ‘कहां दे पाते हैं आयाम
इसीलिए हो जाओ तुम ,
निशब्द , निशब्द , निशब्द ।
निशब्द-गृहलक्ष्मी की कविता
