पुरुष कौन है?-गृहलक्ष्मी की कविता
Purush Kaun Hai?

Hindi Poem: पुरुष कौन है?
जो निशब्द है, वह पुरुष है।
जो कर्तव्य पथ पर खड़ा है।
वह पुरुष है।

जो ओढ़ता है आवरण, कठोरता का।
जिम्मेदारियां का चोला पहनता है।
वह पुरुष है।
जिसका काम दो जोड़ी साधारण कपड़ों में भी चल जाता है।
वह पुरुष है।

जो बंधा रहता है स्त्री(माता, बहन, पत्नी, बेटी) के सानिध्य में।
कभी माँ की ममता की छांव तले, तृप्त  हो जाती है उसकी आत्मा प्रेम के दो निवाले खाकर।
बहनें होती है उसकी बालपन की साथी।
बहनों की चोंटी खींचने से लेकर,
कलाइयों पर राखी बंधवाने तक,
निभाता है सब बंधन नेह के धागों का।

जीवन सफर पर आगे बढ़ता हुआ,
थामता है दामन संगिनी का।
जीवन भर साथ निभाना का वादा करता हुआ चलता है,
जिम्मेदारियां के बोझ से दबकर।

खुद से भी ज्यादा जीवनसाथी का ध्यान रखना है।
उसकी जरूरतों के आगे, अपनी ज़रूरतें भूल जाता है।
जीवन भर साथ निभाता है।

संतानों की जिम्मेदारी आते-आते,
बोझ तले और घिर जाता हैं।
जो चलता था कभी तनकर, कभी अकड़ कर।
कंधे झुकाना भी सीख जाता है।

आंखें कमजोर होने लगती हैं।
बालों में सफेदी झांकने लगती है।
फिर भी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ता।

सदैव तत्पर रहता है अपने कर्तव्य पथ पर।
वह पुरुष है जनाब, हार कहां मानता है?
वह झुक जाता है, अपनी संतानों के लिए।
उनके सुखमय भविष्य के लिए।

कभी बेटी का बाप बनाकर झुकना सीख जाता है।
बेटियों को तकलीफ होने पर, हौंसला उसका टूट जाता है।
जो आंखें कभी ना रोई, किसी के सामने
क्योंकि उसे तो पुरुष होने का आवरण ओढ़ना था।
बेटी की विदाई करते समय उसकी आंखें भी छल-छला  जाती है।
कोई ना देख ले उसे इसलिए विदाई के वक्त कोना टटोलता रहता है।
वह पुरुष है।

बच्चों से भी एक दूरी बनाकर रखता है।
एक आवरण ओढ़ कर रखता है।
वह पुरुष है।
जो जिम्मेदारियों का नकाब पहनता है, वह पुरुष है।
जो निशब्द है, वह पुरुष है…….

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