Funny Stories for Kids: निक्का के पास थी लाल रंग की एक पेंसिल । पर उसमें सिक्का था काला-काला । निक्का उससे लि खता—क, ख, ग…! ए-बी-सी-डी भी लिखता, गिनती भी । चित्र भी बनाता संदुर-संदुर । और दखे -दखे कर खदु ही खुश होता । उसे लगता, पूरी दुनिया उसकी लाल रंग की पेंसिल में समा गई है ।
जि से भी चाहे, वह पल भर में कागज पर उतार दे ।
क्या ही मजे की बात थी ! पेंसिल न हुई, किसी परी की जादू वाली छड़ी हो गई ।
एक बार की बात । निक्का हाथ में पेंसिल लिए सोच रहा था, क्या बनाऊँ… क्या बनाऊँ ! इतने में उसकी पेंसिल चली तो बस चलती ही गई, और उसने झटपट अपने घर के लॉन का चित्र बना दिया । सच्ची -मुच्ची , खूब बढ़िया चित्र । उसमें क्या ही बढ़िया फूल थे । फूलों पर उड़ती तितली भी । और हाँ, झब्बेदार मूँछों वाले माली काका भी, जो निक्का को दखे कर बड़े प्यार से हँसकर कहते थे, “ओहो, ओहो, आ गए बचुआ ! देखो तो जरा अपनी छोटी सी बगीची की बहार !”
निक्का ने माली काका की शक्ल बनाई तो उनके होंठों पर बड़ी -बड़ी झब्बेदार मूँछे भी फैला दीं । वाह, क्या शानदार मूँछे थीं ! निक्का ने देखा, तो खुद ही खुदर-खुदर करके हँस पड़ा । निक्का ने सोचा, पेंसि ल है तो अच्छी , चलती भी खूब फर्र-फर्र है । पर क्या ही अच्छा होता, अगर यह रंगों वाली पेंसि ल होती । मैं गुलाब का फूल बनाता तो लाल फूल बनता । गेंदे का फूल बनाता तो पीला-पीला बन जाता । मम्मी की साड़ी बनाऊँ तो नीली-नीली और गुलाबी बन जाए और दीदी की फ्रॉक बनाऊँ
तो खि ल-खि ल हँसता हुआ हरा रंग आ जाए । सोचते-सोचते वह पता नहीं, कि स दुनिया में पहुँच गया । ऐसी दुनिया, जिसमें सब कुछ मन से होता था । मन की तरंग से नदियाँ बहती थीं, पहाड़ उड़ने लगते थे । और भी न जाने क्या -क्या अजब-गजब होता । यहाँ तक कि अगर सोचा कि आज लाल चाँद निकलना चाहिए, तो चाँद सचमुच लाल हो जाता । वह दुनिया ऐसी मजेदार थी कि निक्का तो बि ल्कुल खो ही गया । वहाँ से वापस लौटने का उसका मन ही नहीं हो रहा था ।
कुछ देर बाद निक्का को याद आया, अरे, मैं तो चित्र बनाने के लिए बैठा था । पता नहीं, बैठे-बैठे कहाँ से कहाँ चला गया । उसने फिर से हाथ में पेंसिल सँभाली और सोचने लगा, अब क्या बनाऊँ ?
इतने में उसकी बगि या का बड़ा सा गुलाब उसकी आँखों के आगे आकर हँसने लगा । बोला, “निक्का , मुझे बनाओ…मुझे बनाओ !”
‘हाँ-हाँ, यह ठीक है । तमु इतने संदुर हो कि तुम्हें तो मेरे चित्र में आना ही चाहिए ।’ निक्का ने सिर हि लाया ।
फिर उसने झट पेंसिल से गुलाब का फू ल बना दिया । बड़ा ही संदुर गुलाब का फूल । खिल-खिल हँसता हुआ । पर यह क्या ?…निक्का की तो आँखें फैल गईं । उसकी ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की नीचे ।
अरे वाह, यह तो जादू हो गया । सच्ची -मुच्ची का जादू…! उसकी ड्राइंग वाली काॅपी पर गुलाब का वह फूल काला नहीं, एकदम गुलाबी-गुलाबी बना था । जैसा सचमुच उसकी बगि या का गुलाब है ।
निक्का को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था । तो क्या सचमुच वह सच्ची -मुच्ची में हो गया, जो उसके मन में था ।
फि र तो उसने और भी चित्र बनाए । ढेर सारे चित्र । पापा की कार बनाई, तो वह लाल रंग की बन गई । जैसी असल में पापा की कार है । मम्मी की साड़ी बनाई, तो हलकी नीली बन गई । जैसी मम्मी ने आज सुबह ही नहाकर पहनी थी ।
यह क्या हो रहा है ? निक्का ने धीरे से अपने सि र पर हाथ फेरते हुए सोचा । तभी उसके मन में आया कि अरे भई, मम्मी की साड़ी पर तो सफेद-सफेद सितारे भी टँके हैं । तो क्या वैसे सफेद सितारे भी टाँक सकती है मेरी पेंसिल ? ‘चलो, मैं कोशि श तो करता हूँ ।’ उसने अपनी पेंसिल को बड़े प्यार से
देखते हुए कहा, “चल, चल री पेंसि ल, ताकि मैं अपनी ड्राइंग में भी मम्मी की साड़ी में ऐसे ही संदुर सितारे टाँक दूँ ।”
उसने साड़ी पर सितारें टाँकने शुरू कि ए, तो एकदम असली वाले सफेद-सफेद सलमे-सि तारे बनते चले गए । बिल्कुल दूधिया झाग की तरह, झक्क सफेद । निक्का खुश होकर बोला, “वाह, अरे वाह, अब तो मजा आ गया !” फिर उसने काली रात में दमकते सितारों का चित्र बनाया । आसमान में
कि सी जादूगर की तरह झाँकते प्यारे चंदा मामा का भी । चाँदनी मामी के प्यार और सूरज दादा के गुस्से का भी चित्र बनाया । परियों जैसे लहराकर उड़ती रंग-रंग की तितलियों का भी उसने बड़ा प्यारा चित्र बनाया । खूब रंग-बिरंगा ।
सारे चित्र ऐसे कमाल के बने कि वह खूब तालियाँ बजाकर नाचने लगा । अगले दिन मम्मी ने निक्का के संदुर-संदुर रंग-बिरंगे चित्र देखे तो बड़ी खशु हुईं । उन्होंने प्यार से निक्का की पीठ थपथपाई । फिर अचानक उन्हें कुछ याद आया । बोलीं, “निक्का बेटे, अभी मैंने तो तुझे रंग लाकर दिए नहीं । तो ये इतने संदुर रंग कहाँ से आए ?”
“रंग…!” निक्का हँसने लगा । फिर हँसते-हँसते बोला, “मम्मी , इसका एक सीक्रेट है !”
“कैसा सीक्रेट ? मैं भी तो जानूँ !…तू मुझे नहीं बताएगा रे ?”
निक्का बोला, “अच्छा मम्मी , बताता हूँ । पर मेरा सीक्रेट आप किसी और को मत बताना ।”
मम्मी ने गोल-गोल आँखें घुमाते हुए कहा, “ठीक, बिल्कुल ठीक…!” इस पर निक्का ने धीरे से मम्मी के कान में फुसफुसाते हुए कहा, “मम्मी -मम्मी , मैंने तो इसी पेंसिल से बनाए हैं सारे चित्र । मैंने पेंसिल से कहा कि गुलाब का फूल बना दे, एकदम गुलाब जैसा, तो वह अपने आप झट गुलाबी बन गया । पेंसिल चलती चली जा रही थी और अपने आप रंग-बिरंगे चित्र बन रहे थे । देख लो मम्मी , तुम !”
मम्मी अचरज में थीं । उन्होंने एक बार फिर निक्का के चि त्रों पर नजर डाली, तो जैसे सब समझ गईं । बोलीं, “ओहो, समझ गई निक्का ! तूने जरूर इन चित्रों में मन के रंग भर दिए होंगे । जब मन के रंग भरो, तो पेंसिल भी वही बनाती है, जो हमारे मन में चित्र बना होता है ।” कहकर मम्मी ने प्यार से निक्का को चूम लिया और बोलीं, “देखना निक्का , तू एक दिन सच्ची -मुच्ची कलाकार बनेगा । जो मन के चित्र बनाए और मन के रंग भरे, उसी को तो कहते हैं सच्चा कलाकार !” सुनकर निक्का शरमा गया । उसके चेहरे पर बड़ी भोली मुसकान थिरक रही थी ।
ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ
