Social Story in Hindi: रोज की तरह ऋचा ने घर के काम निपटाए और घड़ी की तरफ नजर डाली।ग्यारह बजने में पंद्रह मिनट बाकी थे। उसने मन ही मन बुदबुदाया।
“जल्दी से नाश्ता कर लेती हूँ, फिर पापा-मम्मी से बात करूँगी।”
ऋचा का यह रोज का नियम था। ऋचा बिना नागा रोज़ ठीक ग्यारह बजे पापा-मम्मी से बात करती थी,उसका यह क्रम शादी के बाद से जारी था। एक दिन भी ऐसा नहीं हुआ जब उसने मम्मी-पापा से बात नहीं की हो। पापा-मम्मी भी उसके फोन का इंतजार करते रहते थे।
“रोज-रोज क्या बात करती हो?”
एक दिन नकुल ने ऋचा से पूछ ही लिया था। ऋचा मुस्कुरा दी थी।
“कुछ नहीं वह मेरी आवाज सुन लेते हैं और मैं उनकी… हमारे लिए इतना ही काफी है।”
नकुल उसे देखते ही रह गए थे।
“नकुल आप नहीं समझ पाएंगे आप तो अपने घर में हैं। लड़कियाँ अपने पीछे न जाने कितना कुछ छोड़ कर आती हैं।”
नकुल उसकी इस गोल-गोल बातों का मतलब नहीं समझ पाता।ऋचा शायद उसे समझा भी नहीं पाती। शायद कोई भी लड़का लड़कियों के इस दर्द को समझ नहीं पाएगा।
“हेलो!कैसी हो माँ?”
“ठीक हूँ, तू बता…!”
“मैं भी ठीक हूँ।”
माँ की आवाज़ में कुछ था जो ऋचा के कानों के साथ मन को भी खटक गया था।ऋचा कभी-कभी सोचती बेटियाँ भी एक वक़्त के बाद माँ जैसे व्यवहार करने लगती हैं।सच कहूँ तो बेटियाँ वक़्त के साथ अपने जन्मदाता अपने पालनहार के लिए माँ बन जाती हैं।बचपन में बिना कुछ कहे ही माँ जब उसके चेहरे को पढ़ लेती थी तब उसे बड़ा आश्चर्य होता था।एक दिन उसने माॅं से पूछा भी था
“माॅं!आपको कैसे पता चल जाता है?”
माँ ने उसके गुलगुले गालों को थपथपाते हुए कहा था
“जब तू माॅं बनेगी ना तब तुझे भी पता चल जाएगा।”
माँ सही ही कहती थी।कहते हैं बच्चे और बूढ़े एक समान होते हैं, ऋचा के लिए माँ-पापा बच्चों की तरह ही हो गए थे।
“कुछ हुआ है?”
उसने माँ के मन को टटोलने का प्रयास किया।
“होना क्या है, कुछ भी तो नहीं…”
माँ ने खीझते हुए कहा था,ऋचा मुस्करा पड़ी थी।पक्का,पापा के साथ कुछ तो हुआ है।माँ का गुस्सा चूल्हे में बुझती उस आग की तरह था जो जरा सा छेड़ते ही दहक उठा था।ऋचा जानती थी कि माँ अभी खुद ही अब उगल देंगी।
“राजीव के बेटे की शादी है, तेरे पापा से कह रही हूॅं चले चले पर वह तो अपने जगह से खिसकना ही नहीं चाहते। बस उन्हें टीवी और अखबार मिल जाए तो उन्हें दुनिया की कोई चिंता नहीं… अरे हम किसी के घर नहीं जाएंगे तो कोई भला हमारे घर कैसे आएगा।”
माॅं कहते-कहते रुक गई थी उनका यह डायलॉग कितने सालों से सुनते आ रहे थे।ऋचा तीन भाइयों में सबसे छोटी थी।सबसे पहले उसकी शादी हुई और फिर एक-एक करके उसके भाइयों की भी शादी हो गई थी।जिन्हें आना था वह इन सब के शादी-ब्याह के कार्यक्रमों में आ चुके थे।न जाने अब माँ को किसके आने की उम्मीद थी।
राजीव भैया मामा जी के लड़के थे। मामा जी के इस दुनिया से जाने के बाद माँ का मायका जाना बिल्कुल छूट गया था।वैसे भी बुजुर्गों ने कहा है,माँ से मायका नानी से ननिहाल… नानी-नाना तो कब के इस दुनिया से जा चुके थे,मामा के नाम पर माँ के चार भाई थे पर उनमें से सिर्फ एक भाई ही उन्हें पूछता था।
माँ बड़े अधिकार के साथ मायके चली जाती थी पर एक शादी में मामा जी से किसी बात पर कहा-सुनी हो गई थी। वह बात क्या थी आज तक पता ना चल पाई थी।ऋचा ने माँ से कितनी बार जानने की कोशिश भी की थी।
“माँ,मामा जी के जाना क्यों छोड़ दिया! जब तक हाथ-पांव चल रहे हैं हो आया करो।थोड़ा मन बहल जाता है।एक जगह पड़ी रहती हो।”
माँ ऋचा की बात सुन थोड़ा दुखी हो गई थी।मन में उधर-पुथल मची पड़ी थी।चेहरे पर बहुत सारे भाव आ और जा रहे थे पर मुँह से एक शब्द ना निकला। कुछ था जो उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।ऋचा ने माँ के मन में झांकने का प्रयास किया पर माँ ने मन के दरवाजे कसकर बंद कर दिए और उसे झिड़क दिया था।
“तुझे क्या मतलब यह मेरे और मेरे भाई के बीच का मामला है।”
ऋचा को माँ अचानक से अजनबी लगने लगी थी।माँ का ऐसा रूप उसने इससे पहले कभी नहीं देखा था।बेटियों का जीवन सिर्फ़ इज़्ज़त बचाने में ही बीत जाता है।कभी मायके की ससुराल में तो कभी ससुराल की मायके में…माँ भी इस वक्त यही कर रही थीं।
कहने को तो माँ ने कह दिया था पर उन्हें न जाने कितनी ही अंधेरी रातों में मुँह दबाए अपने तकिए को आँसुओं से भिगोते देखा था।इस बात को पाँच साल गुजर गए थे।
वह सुबह उसे आज भी याद है।माँ का फोन घनघनाया,स्क्रीन पर भैया शब्द देख माँ की आँखें भर आईं थी पर दूसरे ही पल विगत में हुई उस घटना को याद कर माँ का चेहरा सख्त हो गया था।फोन वैसे ही घनघनाता रहा और चुप हो गया।माँ बहुत देर तक फोन को घूरती रही उनके मन में बहुत कुछ चल रहा था पर क्या… यह सिर्फ़ वह ही जानती थीं।
दस मिनट बाद फोन दोबारा बजा।माँ अपने आप को रोक नहीं पाईं।रिश्तो के तार कुछ ऐसे ही होते हैं वह अपनी ओर इंसान को खींच ही लेतें हैं।
“हेलो गुड्डी…”
“भैया sss…”
भाई की आवाज़ सुन माँ के सब्र का बांध टूट गया।माँ फफक कर रो पड़ीं।माँ को रोता हुआ सुन मामा जी भी रोने लगे। तभी फोन कट गया,माँ बेचैन हो उठी पर दूसरे ही क्षण फोन फिर घनघना गया।इस बार ऑडियो कॉल नहीं वीडियो कॉल था।फोन पर मामा जी के बड़े बेटे राजीव भैया थे।
“बुआ जी प्रणाम कैसी हैं आप?”
माँ तब तक संभल चुकी थी।उन्होंने अपने आँसुओं को आंचल में समेट लिया।
“ठीक हूँ बेटा तुम कैसे हो?”
माँ की आवाज़ अभी भी कांप रही थी।
“पापा की तबीयत बहुत खराब है उन्होंने खाना-पीना भी छोड़ दिया है।आपसे बात करने के लिए दिन-रात जिद्द लगा रखी थी,लीजिए बात करिए।”
“कैसी है गुड्डी?”
मामा जी पहचान में नहीं आ रहे थे।बीमारी ने उन्हें कमजोर कर दिया था।ऋचा सोच रही थी जिन कंधों पर चढ़कर वह पूरा शहर घूम आती थी वह कंधे झुक गए थे वक्त ने उन्हें भी नहीं छोड़ा था। मामा जी ने अपनी लड़खड़ाती आवाज में कहा
“ तेरा भाई बीमार है,अपने भाई को देखने नहीं आएगी?”
माँ शायद इसी वाक्य का वर्षों से इंतजार कर रही थी। इन विगत पाँच वर्षों के गिले-शिकवे आँसुओं में बह चुके थे।दूसरे ही दिन माँ ने टिकट कराया और अपने भाई को देखने चल दी।वर्षों से छूटा हुआ रिश्ता फिर से जुड़ गया था पर मामा जी के इस दुनिया से जाने के बाद एक बार फिर वह रिश्ता टूट गया था।राजीव भैया के बेटे की शादी तय होती ही उम्मीद की एक नई ज्योत जल उठी थी।शायद मायका है ही ऐसी चीज,पचहत्तर साल की उम्र में भी माँ मायके जाने का मोह छोड़ नहीं पाई थी।
“ऋचा राजीव के बेटे की शादी है हमारे यहाँ व्यवहार में दो बार सामान देना होता है।एक व्यवहार कहलाता है और दूसरा मुँह दिखाई। तुम्हारे बाप पता नहीं कौन से जमाने में जीते हैं कहते हैं मुँह दिखाई में पाँच सौ रुपए दे दो।अरे हम बुआ-फूफा है, गनीमत है कि बच्चे पूछ रहे हैं वरना आज के जमाने में दूर के रिश्तों को पूछता कौन है?”
दूर!जिस मायके में माँ का बचपन बीता था,आज वो गलियाँ पराई नज़र आ रहीं थीं।
“माॅं आप क्या चाहती हैं?”
“अरे इस महंगाई के जमाने में जहाॅं वो मरी सी भिंडी भी अस्सी रुपए किलो में मिलती हैं,वहाॅं पाॅंच सौ रुपए देना अच्छा नहीं लगेगा।काम से कम इक्कीस सौ तो देना ही चाहिए।”
ऋचा चुपचाप मम्मी की बात सुन रही थी।
“हमारे घर में बेटिया किसी भी उम्र की हो उन्हें खाली हाथ विदा नहीं किया जाता फिर यह तो शादी की बात है। अगर उन्होंने हमारे विदाई कर दी तो बहुत खराब लगेगा। जितना तो दिया नहीं उतना तो लेकर वापस लौटेंगे। वैसे भी मैं इस उम्र में किसी का एहसान नहीं रखना चाहती।”
माॅं के अंदर इस वक्त मायका एक पगली हवा की तरह हिलोर मार रहा था।
“माॅं पापा कहाॅं हैं ?”
“दूसरे कमरे में है दिनभर काम ही क्या है या तो अखबार पढ़ते रहेंगे या फिर टीवी में सर दिए बैठे रहेंगे। रिटायरमेंट के बाद इनकी तो मौज है पर मेरी सजा हो गई।औरतों की किस्मत में रिटायरमेंट नहीं होता, उन्हें जिंदगी भर काम करना है।”
माॅं ने गलत तो नहीं कहा था।माॅं इस उम्र में भी गृहस्थी संभाल रही थी।भाभी को घर-गृहस्थी से मतलब कुछ कम ही रहता था पर माॅं अपने पति की मेहनत से बने इस घर को यूॅं ही नहीं छोड़ सकती थी।
“आप परेशान न हो,मैं बात करती हूँ।”
माँ ने उलाहने भरे लहजे में कहा था
“देख ले मेरी तो सुनते नहीं, तेरी ज़्यादा सुनते हैं!”
माँ ने हवा में तीर छोड़ा,ऋचा मुस्कुरा कर रह गई थी।
“हेलो पापा कैसे हैं आप…?”
“ठीक ही हूँ ऋचा, तू कैसी है।”
“ठीक ही!”
“अच्छा बाबा ठीक हूँ।”
पापा ने बात संभालते हुए कहा था।”ही!”ही शब्द में रिचा को एक निराशा एक अवसाद सा नजर आता था। हर साल गर्मियों की छुट्टियों में जब वह मायके जाती पापा पहले से ज्यादा बूढ़े और कमज़ोर महसूस होते।पापा वक्त के साथ धीरे-धीरे बूढ़े होते जा रहे थे।कंधे झुक चुके थे,चेहरा झुर्रियों से भर चुका थ।ऋचा के मन में एक डर बना रहता था कि अगली बार जब वह आएगी तो यह निगाहें यह हाथ आगे बढ़कर उसका स्वागत करेंगे या नहीं शायद यह डर मायके से ससुराल लौटती हर बेटी के मन में होता है।
“पापा राजीव भैया की बेटी की शादी में जा रहे हैं ना…”
“तेरी माँ ने बता दिया?”
पापा की आवाज में एक नाराज़गी थी।उस छोटे बच्चे की तरह जिसकी गलती को किसी अपने ने पकड़ लिया हो।ऋचा ने बात संभालते हुए कहा
“इसमे छुपाने जैसा क्या था,जो माँ ना बताती।”
पापा उसके ज़वाब को सुन चुप हो गए थे।
“क्या सोचा है जा रहे हैं न…?”
“जाना ही पड़ेगा।”
“जाना ही पड़ेगा! इस बात का क्या मतलब है?”
ऋचा ने खीझ कर कहा
“तेरी मम्मी के साथ ही रहना है इस बुढ़ापे में उनको नाराज करके भी नहीं चला जा सकता।”
पापा की आवाज में एक शरारती छोटे बच्चों की झलक थी।
“क्या देने की सोंच रहें हैं?”
“तेरी माँ तो तुझे सब कुछ बता ही चुकी होगी फिर तू मुझसे क्यों पूछ रही है!”
ऋचा पापा की बात सुन अचकचा गई थी पर उसने अनजान बनते हुए कहा
“फिर भी आपकी भी कोई राय होगी।’
“तू बता कितना देना चाहिए।”
ऋचा ने सधी हुई आवाज में कहा
“पापा वह आपका ससुराल है।”
“ससुराल! जब सास-ससुर ही नहीं रहे तब काहे की ससुराल…”
“जो भी हो आप उस घर के दामाद हैं कुछ अच्छा ही देना होगा। माँ की इज्जत का सवाल है।”
“तेरी माँ तो लंबा-चौड़ा सोच कर बैठी हैं।ऋचा हम सिर्फ़ देते रहेंगे,हमारे बच्चों की शादियां हो चुकी है हमें कौन देगा।”
ऋचा पापा की बात सुन मुस्कुरा दी। पापा कभी-कभी रिश्ते सिर्फ़ लेन-देन के लिए नहीं होते समाजिकता के लिए निभाए तो जाते ही हैं।”
पापा सोच में पड़ गए।
“बड़ी हो गई है।”
वह कहना चाहती थी और शायद आप बच्चे… इस वक्त वह बेटी से ज़्यादा एक माँ का किरदार अदा कर रही थी। जो बातें माँ समझा नहीं सकती थी वह उन्हें प्यार से समझ रही थी। पापा बड़ी देर तक उसकी बातों को सुनते और समझते रहे।
“ठीक है जैसा तू चाहती है वैसा ही होगा।”
“तू बात करके देख ले,वैसे भी तेरी ज्यादा सुनते हैं।”
मम्मी की कही बात उसके कानों में गूंज उठी।ऋचा पापा की बात सुन मुस्कुरा पड़ी थी।मोबाइल में उनकी सिर्फ आवाज़ सुनाई दे रही थी पर बंद आँखों में पापा का पूरा चित्र उभर आया था। पापा ने मम्मी को आवाज़ लगाई।
“सुनती हो ऋचा से बात हो गई। राजीव के बेटे की शादी में तुम जो लेना-देना चाहती हो देख लो,तैयारी कर लो। मुझे कोई दिक्कत नहीं है।”
ऋचा सोच रही थी सुनना शायद इस दुनिया में सबसे जरूरी चीज है।सुनना, एक दूसरे की दिल की बात मन की बात जो शायद पापा ने उसके माध्यम से सुन ली थी। ऋचा को इस वक्त उसे पापा बिलकुल उस बच्चे की तरह लग रहे थे जिसकी बात को थोड़ी सी हील-हुज्जत के बाद माँ ने मान ली हो।
