Moral Story in Hindi: थाली गिरने की आवाज़ सुनते ही बिंदु जी किचन के पास आकर खड़ी हो गयीं और ऊँची आवाज़ में बोलीं
“ संभल कर काम करो बहू. खून पसीने की कमाई है. जिस तरह अपने बर्तनों का मोह रखती हो न,यहाँ की चीज़ों का भी करो”
“ जान बूझ कर तो नहीं गिराया मम्मा”
बिदु जी भी छोड़ने वाली नहीं थीं,
“ अपनी कमाई से ख़रीदी हुई चीज़ का दर्द अलग होता है. यहाँ और अपने घर की चीज़ों को समान भाव से तुम देख ही नहीं सकतीं”
तभी दस साल की उनकी पोती तश्तरी हाथ में लेकर सामने आकर खड़ी हो गई,
“ बड़ी माँ,थोड़ा मक्खन चाहिए. पराँठा खाना है”
“ मक्खन ख़त्म हो गया रानी बेटी,अचार के साथ खा लो”
“मक्खन ख़त्म हो गया? कल सुबह ही तो दो पैकेट मंगाए थे
“ सभी पराँठे पर रख कर खाएँगे तो ख़त्म तो होगा ही. मैंने तो खाया नहीं”
“ न खाकर मुझ पर कोई एहसान तो किया नहीं.घर का खर्चा जिस तरह बढ़ रहा है ,मैं ही जानती हूँ”
“ मंहगाई भी तो बढ़ रही है …”
बिन्दु जी बुरी तरह चिढ़ गयीं,” पंद्रह साल परदेश में रहने के बाद मेरे सामने मंहगाई का रोना रो रही हो? तुम्हारी इस फ़िज़ूलखर्ची की वजह से ही तो मेरा बेटा कभी बचत कर ही नहीं पाया.”
“ इस मंहगाई के ज़माने में दो जून पेट भर खाना मिल जाय वो ही बहुत है.उस पर दो दो बच्चों की पढ़ाई”
“ मैं तो इतना जानती हूँ कि माँ बाप को कभी हज़ार दो हज़ार का मनी ऑर्डर भेजने की सामर्थ्य तो तुम लोगों में ज़रूर होगी . कम से कम तीज त्यौहार पर ननदों को नेग शगुन ही भेज देते”
नीरा ने भी जवाब देने की ठान ली थी.
“ परदेश में खर्चा कैसे चलता है आपने कभी पूछा”
“ ham भी तो बहुएँ थे.क्या मजाल जो सास को पलटकर जवाब देते. एक ये हैं.घर में कदम रखते ही जैसे पूरे घर की खुशियों को सांप ने डस लिया है.मेरा कोख जाया बेटा ही पराया हो गया.जब देखो बस हाय बीबी,हाय बच्चे.. “
“जब तक पैसा भेजते रहे,सिर माथे पर रहने वाले बेटे थे,आज अपने बच्चों को साथ लेकर पालन पोषण कर रहे हैं, तो दुश्मन हो गए”
अचानक पति को आया देख कर नीरा चुप लगा गई. सोमेश ने पूछा,
“ क्या बात है मम्मा?”
“ घर की मालकिन से पूछो…”
“ आख़िर हुआ क्या है? जरा मैं भी तो सुनूँ”
“ आपकी माँ के स्वभाव के कारण अब इस घर में रहना मुश्किल है. बात बात में शक,बात बेबात ताने..”
“ थोड़ा तो सहना पड़ेगा नीरा. पापा को थोड़ा मनाना पड़ेगा.मान जायँ तो मैं यहाँ काम धाम देखूँ”
“ जिस की कोख से जन्मे हो उसी के स्वभाव को तुम नहीं समझ पाए? इस घर में आपकी माँ की इच्छा के विरुद्ध पत्ता भी नहीं हिल सकता.आप जो सोचकर चले हो न कि हम यहीं रहेंगे तो वो,पूरा होने से रहा”
पूरा दिन घर का वातावरण खिंचा खिंचा सा रहा नीरा कई बार खाने को पूछने गई लेकिन बिंदु तब आई जब सोमेश के पिता ने उन्हें कड़े शब्दों में आने का आदेश दिया.
अगले दिन सुबह जलपान के समय घर के सभी सदस्य एक साथ बैठे थे.सोमेश के पापा ने कहा,
“ गाँव के खेतों का इंतज़ाम करने के लिए मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ. ज़्यादा चलने फिरने की ताक़त अब रही नहीं.
एक बार तू ,गाँव के कागजातों को समझ ले तो चैन की नींद सो पाऊँगा”
“ आप जैसा कहें वैसा ही करूँगा”
“ भाई हम लोगों के कहने -करने का सवाल अब नहीं है तुम्हारी समझ में जो आए करो,क्योंकि हम लोगों का कहना तुमने किया ही कब है? “
“ मसलन”
“ मसलन,अपनी कमाई में से लेनदेन की बात ही ले लो,जो कमाया,वो उड़ाते चले गए,हमे तो कभी कुछ दिया नहीं”
“ इस बात का दुख तो मुझे भी है.पापा,चार लोगों के परिवार को विदेश में पालना..और मेरी तनख़्वाह तो आप जानते ही हैं..आप से कुछ छिपा नहीं है”
“ जिसे एक रोटी नसीब होती है न वो भी आश्रितों में बांट कर खाते ही है”बिन्दु जी बीच में ही चिल्लाने लगीं
“ ख़ुद को मेरा आश्रित समझती हो मम्मा तो मेरे साथ चलकर रहो,जिस चौके में चार का खाना बनता है,वहाँ छ: का भी बन जाएगा लेकिन अगर तुम चाहो कि,मेरी तनख़्वाह में से दो चूल्हे जलें तो वो तब संभव होगा अगर हम एक वक्त खाएं और यहाँ मनिऑर्डर भेजें”
“ तो इस नौकरी का क्या फायदा” बिंदुजी की पेशानी पर बल पड़ गए
“ मैं तो बार बार यही कहता हूँ लेकिन आपलोग मानो तब न.कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा न.. या फिर नौकरी से इस्तीफ़ा दे दूँ!”
“ क्या ऽऽऽ लगी लगाई नौकरी छोड़ दोगे?”
“ तो फिर क्या करूँ? एक को तो छोड़ना ही पड़ेगा”
“ लेकिन एकाएक नहीं,बीबी बच्चों को कुछ दिन यहाँ छोड़ो,दो चार महीने अपने साथ रखो,बीचोंबीच में जाकर देखभाल भी करो,आमदनी और खर्चा मुझे बताते रहो. और एक बात”
“ वो क्या?”
“ जो खर्चा बढ़ेगा उसका इंतज़ाम भी तुम्हें करना पड़ेगा”
सोमेश ने थोड़ी नाराज़गी जतलाई,” आपको मकानों का किराया मिलता है,खेतों की आमदनी है,पेंशन आती है,इतने पैसे में क्या घर नहीं चलेगा?”
“ ,आड़े हाथों में वो ही पैसा मेरे हाथ आयेगा. बाक़ी बची मेरी पेंशन,उसमे तो खर्चा चल नहीं सकता”
“ आपको अपने आड़े वक्त की चिंता है,जरा सोचिए,मेरे बच्चों की पढ़ाई लिखाई,शादी ब्याह कैसे होंगे. शहर में खाने पीने की तकलीफ़ सहूँ और आपको पैसे भी भेजूँ और आप मेरे बारे में कुछ भी न सोचें,आपने फ़ोन करके मुझे बुलाया ही क्यों? कल तक तो आप दूसरी बातें करते थे,रात भर में माँ ने आपको ऐसी क्या पट्टी पढ़ा दी कि आपका रवैया ही बदल गया”
थोड़ी देर बाद सोमेश ने अपनी बेटी को पुकारा,” जाओ अपनी माँ से कहो अपना सामान बाँधे,आज शाम को हमे भोपाल के लिए निकलना है”
“ ये क्या कह रहा है? चार दिन बाद होली है ,लोग बाग क्या कहेंगे?”
“ लोगों की छोड़िये आपकी पत्नी तो खुश है न”
“ मैं खुश हूँ?”
“ और क्या यही सब करने के लिए तो आपने जाल बिछाया है”
“ जाल मैं रच रही थी या तेरी बीबी. शुरू से ही अकेली रहती आयी है. सास के साथ कैसे निभेगी”
“ हर सास अपनी बहू के लिए ऐसे ही कहती है.दादी भी तो तुम्हारे लिए यही कहती थी”
“ वो तो अमृत पीकर आयी थी”
“ अमृत पीकर तो तुम आयी हो,इसीलिए तुम्हारी किसी से नहीं बनी. सास ससुर देवरानियाँ किसी से नहीं बनी. दुनिया के लोग कई बार अपने परिवार के लिए ग़ैर जिम्मेवार हो जाते हैं लेकिन तुम तो अपनी संतान को ही ठोकर मार रही हो””
इतना कहकर सोमेश के पिता बुरी तरह हाँफने लगे. पास उल्टा पड़ते देख बिंदु जी घबरा गयीं. उधर नीरा भी चुप हो गई. उम्मीद की चिलमन ,सोमेश के चेहरे पर अभी भी छायी हुई थी कि शायद अभी भी नीरा ,माँ को सॉरी बोल दे तो ये अर्थ क्वैक रुक जाये.
पुष्पा भाटिया
