मां पापा होते तो ये पर्व उदास न होती-गृहलक्ष्मी की कविता
Maa Papa Hote To Ye Parv Udaas na Hoti

Hindi Poem: हृदय रो पड़ता है विशेष त्योहारों पर,
आर्शीवाद का कोई फोन नहीं आता तीज त्योहारों पर,
हमारी मायके की आस न टूट रही होती
मां पापा होते तो ये पर्व उदास न होती..
जब आता तीज का पावन पर्व,
गुलाबी साड़ी मोतियों वाली मां ने चूड़ी सिंदूर संग भिजवाई होती..
पहनती जब तीज के दिन वो साड़ी,
मां पापा का आशिर्वाद लिए नैन खुशी से रोती ,
मां,पापा होते तो ये पर्व उदास न होती..
आती फिर मकर संक्रांति का जब त्योहार,
चूड़ा,तिलकुट,रेवड़ी संग कितना उपहार
चुपके से मां उनमें कुछ पैसे रख भेजती
नाती के कपड़े लेना दामाद संग तुम भी ले लेना कोई कुर्ती…
अपने हाथों प्रेम से खिचड़ी भी बना भेजती,
हमलोगों का आशिर्वाद समझ खा लेना “पुपुन “ऐसा लिख भेजती..
ये जो लिख रही हूं स्वप्न सा ही है,
मां,पापा उन चांद तारों जैसे ही दूर हैं
नहीं आता ऐसा कोई निमंत्रण मायके से
न तीज की चूड़ी बिंदिया, न चूड़ा तिलकुट वहां से,
सहज ही उनकी तस्वीर के सामने अर्पण करती हूं,
खुशी से फिर सबको बांटती हूं,
आंखों में नीर भर कर,
स्वयं कह उठती हूं आई है
ये मेरे मां के घर से, मेरे मायके से

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