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दहेज—गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: अब यह दहेज फिर क्यों साथ मेंकलेजे का टुकड़ा, तुम्हें दे दिया है।अब यह दहेज फिर, किस बात में।।कतरा लहू का, तुम्हें दे दिया है।अब यह दहेज फिर, क्यों साथ में।।कलेजे का टुकड़ाअपने लहू से ,यह सींचा है फूल।संजोकर अरमान, दिल में बहुत।।किसी की नजर, नहीं लग जाये ।पाला है संभालकर, इसको बहुत।।फूल […]

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