Romantic Story in Hindi: विवेक और अल्का की मुलाक़ात कॉलेज के पहले साल में हुई थी। दोनों स्वभाव से बिल्कुल अलग थे, लेकिन शायद यही वजह थी कि वे एक-दूसरे की ओर खिंचते चले गए। विवेक शांत, संतुलित और रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाने वाला इंसान था। अल्का आत्मविश्वासी, महत्वाकांक्षी और सपनों से भरी हुई—वह सिर्फ़ सुरक्षित जीवन नहीं, एक पहचान चाहती थी।

धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदल गई। विवेक के लिए अल्का उसका सुकून थी, और अल्का के लिए विवेक वह भरोसा, जहाँ वह बिना डर अपने सपने रख सकती थी।
अल्का अक्सर कहती,
“मैं ज़िंदगी में बहुत आगे जाना चाहती हूँ।”
विवेक मुस्कुराकर जवाब देता,
“और मैं चाहता हूँ कि तुम उड़ो, पूरे विश्वास के साथ।”

कॉलेज खत्म हुआ और ज़िंदगी ने अपनी असली परीक्षा लेना शुरू कर दिया। विवेक को एक साधारण नौकरी मिली, जबकि अल्का को एक नामी कॉर्पोरेट कंपनी में अवसर मिला। यह उसके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। विवेक ने बिना किसी शिकायत के दूरी स्वीकार कर ली।

ऑफिस में अल्का मेहनती और तेज़ थी। वह देर तक काम करती, ज़िम्मेदारी लेती और खुद को साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। उसके इसी समर्पण ने उसके बॉस राघव मल्होत्रा का ध्यान खींचा। शुरुआत में यह पेशेवर सराहना थी, लेकिन धीरे-धीरे इसमें निजी रुचि घुलने लगी।

अल्का को असहजता होती, पर वह खुद को समझाती—
“यह बस कुछ समय की बात है। करियर बनते ही सब खत्म।”

विवेक को इन बातों की जानकारी नहीं थी। वह अल्का पर पूरा भरोसा करता था। उसे लगता था कि प्यार में शक की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

एक दिन विवेक बिना बताए अल्का के ऑफिस पहुँचा। वह उसे सरप्राइज़ देना चाहता था। काँच के केबिन के भीतर का दृश्य उसके लिए असहनीय था। अल्का अपने बॉस के बहुत क़रीब खड़ी थी। कुछ स्पष्ट नहीं था, पर विश्वास टूटने के लिए इतना काफ़ी था।

घर पर अल्का ने कहा,
“विवेक, यह रिश्ता नहीं है। यह बस मेरे करियर के लिए अस्थायी है।”

विवेक ने पहली बार महसूस किया कि उनके रास्ते शायद अलग हो चुके हैं।
“अगर आगे बढ़ने के लिए आत्मसम्मान और रिश्ते छोड़ने पड़ें,” उसने कहा,
“तो उस मंज़िल का कोई अर्थ नहीं।”

उस रात विवेक चला गया—बिना शोर, बिना शिकायत।

इसके बाद अल्का की ज़िंदगी धीरे-धीरे बिखरने लगी। ऑफिस में बॉस का व्यवहार बदल गया। वादे पूरे नहीं हुए। प्रमोशन रुक गया। सहकर्मियों की नज़रों में उसकी पहचान बदल चुकी थी।

जिस करियर के लिए उसने प्यार खोया था, वही हाथ से निकल गया। और जिस प्यार को उसने समझौते में लिया था, वह वापस नहीं आया।

आईने में खुद को देखते हुए अल्का ने महसूस किया—
अस्थायी फैसलों की कीमत अक्सर स्थायी होती है।

यह कहानी सिर्फ़ अल्का की नहीं, बल्कि आज के उस हर युवा की है, जो सफलता की दौड़ में रिश्तों और आत्मसम्मान को पीछे छोड़ देता है।
क्योंकि सच्ची सफलता वही है, जो इंसान को भीतर से भी समृद्ध करे।