Summary: सावित्री और सत्यवान की अमर प्रेम कथा, निष्ठा और समर्पण की अद्भुत शक्ति
सावित्री ने अपने अटूट प्रेम और बुद्धिमत्ता से यमराज से वरदान लेकर सत्यवान को मृत्यु से वापस ला दिया। यह कथा सिखाती है कि सच्चा प्रेम और विश्वास हर बाधा को पार कर सकता है।
Savitri Satyavan Story: बहुत समय पहले की बात है एक सुंदर, बुद्धिमान और निष्ठावान स्त्री सावित्री थी। उसकी सुन्दरता और गुणों की दूर-दूर तक चर्चा थी। वह न केवल अपनी बुद्धि के लिए, बल्कि अपने पति के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण के लिए भी प्रसिद्ध थी।
सावित्री का पति सत्यवान था। वह एक नेक, दयालु और साहसी युवक था, जो जंगल में रहकर लोगों की भलाई करता था। सावित्री और सत्यवान का प्रेम इतना गहरा था कि लोग कहते थे उनकी प्रेम कहानी केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन और आत्मा में जिंदा थी।
एक दिन, देवर्षि नारद सावित्री के पास आए। उन्होंने सावित्री को चेताया, “हे सावित्री! तुम्हारे पति की आयु बहुत कम है। अगर चाहो तो दूसरा वर चुन लो।”
सावित्री की आँखों में आंसू तो थे, पर उसके होंठों पर दृढ़ता थी। उसने कहा, “नहीं, मेरे जीवन का हर क्षण सिर्फ सत्यवान के साथ ही है। मेरा प्रेम केवल उसके लिए है। कोई दूसरा वर मैं नहीं चाहती।”
तभी सत्यवान को अचानक तेज़ दर्द हुआ। सावित्री ने तुरंत उसे अपने कोमल हाथों में लिया और वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में लिटा दिया। उसका दिल काँप रहा था, पर उसके मन में अपने पति के प्रति अटूट विश्वास और प्रेम की शक्ति थी।
इसी समय यमराज अपने यमदूतों के साथ आए। सत्यवान का प्राण लेने के लिए वे उसे लेकर जाने लगे। सावित्री ने हिम्मत दिखाई और यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी। यमराज ने देखा और बोले, “हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति के साथ रह सकती है। अब लौट जाओ।”
सावित्री ने बड़ी श्रद्धा और आत्मविश्वास से उत्तर दिया, “जहाँ मेरे पति रहेंगे, मैं वहीं रहूंगी। यही मेरा धर्म है।”
यमराज सावित्री की भक्ति और प्रेम देखकर प्रसन्न हुए और बोले, “तुम तीन वर मांग सकती हो। जो चाहो मांग लो।”
सावित्री ने अपने पति के लिए तीन वर मांगे…अपने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति, ताकि उनकी आँखें फिर से स्वस्थ हो जाएँ। अपने ससुर का खोया हुआ राज्य वापस पाने का वर और अपने पति सत्यवान के साथ सौ पुत्रों की माता बनने का वर।
यमराज ने उन्हें आशीर्वाद दिया, “तथास्तु! तुम्हारे ये वर सभी पूर्ण होंगे।”

सावित्री फिर वट वृक्ष के पास लौट आई, जहाँ सत्यवान मृत पड़े थे। उसने अपने पति का सिर अपने कोमल हाथों में रखा और अपनी भक्ति और प्रेम से उनके जीवन में संचार कर दिया। सत्यवान फिर से जीवित हो उठे।
इतना ही नहीं, सावित्री ने अपने सास-ससुर की आँखों की ज्योति लौटाई और खोया हुआ राज्य भी वापस दिलवा दिया।
तब से यह व्रत मनाया जाता है ज्येष्ठ अमावस्या और पूर्णिमा को महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं और पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए अपने पति की लंबी उम्र और सौभाग्य की कामना करती हैं।
सच्चा प्रेम केवल शब्दों का नहीं होता। यह समर्पण, निष्ठा और विश्वास से बना होता है। सावित्री और सत्यवान की कहानी यह दिखाती है कि जो प्रेम सच्चा और निष्ठावान हो, वह किसी भी शक्ति को परास्त कर सकता है।
