Hindi Kahani: अलका एक खेल शिक्षिका है।आज वह सुबह से दोपहर तक मैदान में ही है।आजकल जिला स्तरीय खेल की तैयारी चल रही है।सभी खिलाड़ी काफी उमंग से तैयारी कर रहे हैं।अलका भी उनके उत्साह को देखकर पूरे समर्पण से कोचिंग दे रही है। मनोज ने दो बार फोन करके पूछा भी है कि आज बहुत समय लगा।अलका ने कह दिया है कि अभी दो घंटे और लग जायेंगे। इस समय एक ब्रेक चल रहा है।अलका भी काफी पीते हुए आराम से बैठ गई है। कुछ छात्र अब भी दौड़ भाग कर रहे हैं।इन सबमें अलका को अपना अतीत नजर आता है।अगर उसके पैर की हड्डी न टूटी होती तो आज वह राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी तो जरूर होती।अलका को खेलकूद बचपन से ही पसंद था।साथ ही साइकिल रेस तो उसका जुनून ही था।हर साल एक ऐसी साइकिल रेस होती थी जिसमें चौदह से लेकर अठारह साल तक के ही प्रतिभागी शामिल हो सकते थे।अलका चार साल तक उसमें विजेता रही।मगर पांचवे साल उसको सड़क पर ऐसी खतरनाक ठोकर लगी कि वह चार महीने ठीक से चल तक न सकी। फ्रेक्चर ऐसा हुआ कि दो महीने बाद अपने आप फिर से हड्डी में दरार आ गई। लेटे लेटे उसका वजन और दुख दोनो ही बढ गये थे।गहरा अवसाद हो गया था ।उसे खेलकूद से डर लगने लगा।फिर एक दिन उसने एक युवक को देखा।वह बैसाखी पर चलकर भी अपना कारोबार कर रहा था।उस दिन अलका ने फिर हिम्मत की।साइकिल रेस में तो अब वह नहीं जा सकती थी मगर मैराथन आदि में वह जरूर दौड़ती थी।उसे कालेज पूरा करके शहर की हाकी टीम में शामिल होना था कि उसका मनोज से रोका हो गया।अलका का तो लगभग
गरीब ही परिवार था।घर आया संबंध इस तरह छोड़ना ठीक भी नहीं था।मनोज ने कोई दहेज आदि की किसी भी तरह की मांग नहीं रखी थी।यह भी राहत की बात थी।अलका ने हामी भर दी।खिलाड़ी से दुल्हन बनना स्वीकार किया।सो गृहस्थी शुरू हो गई।और हाकी रह गई। मगर मनोज के खुलेपन और उसके हंसते खेलते अंदाज में वह अपना खेलकूद भूल गई थी।उसके माता पिता हमेशा याद दिलाते रहते थे।बेटी अलका ऐसा हीरा है दामाद। इतना सरल मन।इतना हंसमुख। इसको कभी गलती से नाराज न करना बेटी।आजकल ऐसे लड़के मिलते ही नहीं हैं। सही तो कहते थे माता- पिता। अलका को एक दिन भी कुछ तकलीफ नहीं दी मनोज ने।कितने काम तो वही कर देता था।सुबह दूध ले आता।नाश्ता बना देता।पानी आता तो पीने का पानी भर देता था।इस तरह सुकून से दिन गुजर रहे हैं।
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छब्बीस साल की अलका के विवाह को तीन साल पूरे हो गये हैं। धीरे धीरे याद आने लगा कि वह भी पहले एक एथलीट थी।कालेज की पढाई और खेलकूद सब करती थी अलका। मनोज तो अक्सर ही यह स्वीकार करता था कि वह उसकी चुस्त-दुरूस्त काया पर ही दिलो जान से फिदा हो गया था।और इसीलिए चट मंगनी पट विवाह हो गया।
जब पिछले साल पति मनोज को नयी नौकरी के लिए गाजियाबाद जाना हुआ तो अलका को अपना खिलाड़ी रूप फिर से याद आने लगा। और
उसने एक स्कूल में प्रार्थना पत्र लगा दिया। अलका को खेल शिक्षक की नौकरी मिल गई। अलका मेहनतकश है। उसका मन लग गया है।यह एक निजी स्कूल है।आठवीं तक का है।खिलाड़ी बच्चे बहुत ही अच्छे हैं। अलका इनको खूब अभ्यास कराती है।मनोज यहां एक चावल की मिल में नौकरी करता है।इस साल नयी नौकरी में आने के बाद अब वह सुपरवाइजर हो गया है। अलका ने मन ही मन मनोज को याद किया। वह अच्छी तरह जानती है कि आज वह ठीक चार बजे आया होगा।पहले वह एक काफी बनायेगा फिर अलका के लिए सैंडविच बनाकर रख देगा। अलका का खूब ख्याल रखता है मनोज। अलका भी तो सरल मन की है।बाहर से लोहा और भीतर से मोम है।मनोज और उसका बंधन इसीलिए इतना मजबूत है।वह मनोज की मित्र मंडली या उसकी देर रात की पार्टी आदि किसी चीज मे टोका- टोकी कभी नही करती।
रविवार को वह दोनों हाट जाते है।अपने लिए जरूरी सामान लेकर आ जाते है।खाना बनाने मे वह दोनो ही निपुण है इसीलिए होटल के खाने की मजबूरी कभी भी नही रहती।ताजा बनाते हैं।आनंदित होकर खाते है। मनोज को अलका की यह आदत यों भी बहुत पसंद है।वह न कोई नखरा करती है।न फिजूलखर्च है।सादा जीवन और आनंद। यही है अलका का मूल- मंत्र ।अलका यही सोच विचार कर रही थी कि अचानक उसके विद्यालय की उप प्राचार्य आ गई। मैदान में उनको देखकर अलका को बेहद खुशी हुई।वह भी इस तैयारी को लेकर उत्साहित थी।अलका तुम सुबह से मैदान मे हो।अब तुमको जाना चाहिए। मैं इनको देख लेती हूँ। कहो तो मोबाइल से इनकी तैयारी रिकार्ड करके भेज दूं। अरे ,नहीं इनके कैप्टन को पता है सब। वह मुझे बता देगा मैडम कहते हुए अलका ने उनको आश्वस्त किया। तब तो तुम आराम से जाओ अलका। कहकर उप प्राचार्य मैडम ने अलका को विदा किया।अलका ने समय देखा।मनोज को बताये समय से पहले ही वह घर पहुंच जायेगी।वाह मनोज को सरप्राइज। आहा। उसने रास्ते में एक जगह पर स्कूटी को रोका।जलेबी और समोसे खरीद लिये।अब वह कुछ गुनगुनाते हुए घर के मार्ग में थी।मनोज को लगेगा कि वह देरी से आने वाली है।मगर वह चट से हाजिर हो जायेगी। खूब मजा आयेगा। उसने कुछ दूर से अपना घर देखा।घर के बाहर एक जानी पहचानी स्कूटी खड़ी थी।ओह, जया जीजी। उनकी परिचित। जया जीजी यहां एक निजी क्लीनिक में
नर्स हैं।उनके कारण कितना सुख और संतोष है अलका को।एक तो जया जीजी अविवाहित हैं।दूसरा उनके घर आती जाती रहती हैं।उनका मन लगा रहता है।जया दीदी एक बार प्रेम करके सगाई में धोखा खा चुकी हैं।अब विवाह के बंधन में नहीं बंधना चाहती हैं।मगर,जया दीदी को आज वह कहेगी। विवाह कर लो।जया दीदी हर बार धोखा नही होता।वह उनको जीती जागती मिसाल देगी।कि जया दीदी जरा मेरे
मनोज को भी देखो कितना सज्जन है कितना सलोना सजन। उनको भी जरूर मिलेगा। यही सोचती हुई वह पहुंच गई घर।बाहर तक खिलखिल कर हंसने की आवाज आ रही थी।” ओ मेरी जान जया ।”मनोज के मुँह से यह सुना तो अलका घबराकर ठिठक कर रह गई।कुछ शक हुआ और वह दबे पांव मेन गेट तक आई ।अब सब साफ सुनाई दे रहा था।”यह खाओ ना।प्यार से बनाया है सैंडविच। वो अलका पागल आयेगी तो देखा जायेगा।अभी तो एक घंटा है उसके लौटने में।”शरारत से ऐसा कहकर मनोज ने शायद कुछ किया था। कि जया की तीखी आवाज आई।” ओह, मनु, डार्लिंग,मेरा गाल तो मत खींचो। मारूंगी।” यह सुनकर अलका के पैर जैसे जम ही गये।मगर उसे फिर सुनाई दिया।”लो मारो ना ।मै तो बेकरार हूँ मार खाने को। ” उसके बाद दोनों के हंसने की, दोनों के ही उठकर भागने की।भीतर शयन कक्ष में जाने की तथा शयनकक्ष का दरवाजा बंद होने की आवाज सुनाई दी।यह अपनी आँखो के सामने होता देखकर,अलका को काटो तो खून नहीं। कुछ सोच कर,उसने भारी मन से दरवाजा खोला।और भीतर आई।उसने देखा कि बैठक में टेबल पर नाश्ता सजा हुआ था।मगर आधे से अधिक जूठा था।अलका के दिल ने कुछ कहा।उसने अपना पर्स लिया और अपने पास रखा।जलेबी और समोसे वहीं पटक दिये।अब वह चुपचाप रसोई घर में जाकर चाय बनाने लगी।अचानक अदरक कूटने की आवाज ने जया और मनोज को चौंका दिया। वह दोनों अस्तव्यस्त हालत में बाहर आये।यह देखकर हक्के बक्के रह गये कि उनकी पोल खुल गई थी।दोनों ने
अलका को बैठकर चाय पीते हुए देखा।अलका ने चाय का घूंट लिया और बस इतना ही कहा।”मनोज मै गरीब घर की बेटी थी।अब मैं आत्म निर्भर महिला हूँ। तुमको यह खुलापन मुबारक। जरा खेल प्रतियोगिता होने दो।उसके बाद मैं इत्मीनान से अपना सामान समेट कर तुमको टा टा बाय बाय कर दूंगी। फिलहाल यह जलेबी और समोसे का शगुन करोगे। संबंध विच्छेद का यादगार पल।”अलका ने इतने आत्मविश्वास के साथ यह कहा था ।सुनकर जया और मनोज अपनी ही नजर में गिर गये।वह कहीं के नहीं रहे।मगर अलका ने उनकी तरफ देखा भी नहीं। अब वह न तो मनोज को पहचानती थी।न जया को। उनसे बेकार बहस करके वह अपनी मानसिक शांति भंग नहीं करना चाहती थी।
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