गरमी की अलसाई सुबह! ऊपर से देर रात तक जागने से उनींदी आंखें! घंटी की तेज़ आवाज ने अलका को उठने पर विवश कर दिया। किसी तरह शरीर को घसीटती हुई वह ड्राईंग रूम तक पहुंची। दरवाज़ा खोला तो कामवाली थी। च्राम राम भाबीज् खींसे निपोरते हुए उसने कहा तो अलका झुंझला उठी। इतनी सुबह! अभी कुल छह ही तो बजे हैं। याद आया पड़ोस के वर्मा जी कल ही सपरिवार छुटियां बिताने गए हैं। पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं। महरी जल्दी न आए तो ऑफिस, घर, बच्चों का स्कूल, सब काम तितर-बितर हो जाते हैं। पर यहां! अपनी सुविधा के लिए उसकी नींद खऱाब की! अलका के घर वह सुबह साढ़े सात से पहले कभी नहीं आई। अलका भुनभुना रही थी। फिर भी उसने नोट किया, राधाबाई की चुस्त सलीके से बंधी साड़ी, माथे पर गोल टीका और बालों में ताज़े फूलों का गजरा, कैसे यह सब इतनी जल्दी कर लेती हैं। जैसे ही अलका दरवाज़ा बंद करने को हुई, बाहर समाचार पत्र का गोल बंडल पड़ा देखा। वह फिर झुंझला उठी। ये न्यूज़ पेपर वाले भी! कितनी भी जल्दी उठो, ये अखबार उससे पहले ही डाल जाते हैं। पता नहीं, रात को सोते भी हैं या नहीं? और फिर अख़बार के साथ कितने पैमफ्लेट्स, जितनी खबरें उससे अधिक विज्ञापन! खोला तो हिंदी के रविवारीय परिशिष्ट पर नजऱ पड़ी। पूरे घर में हिंदी परिशिष्ट केवल वही देखती है। कुछ कौतूहल, कुछ हिंदी में अपनापन सा लगता है।
अखबार लिए-लिए ही वह सोफे पर पसर गई। राधाबाई चाय का गरम प्याला थमा गई तो फिर इत्मीनान से परिशिष्ट खोला। मुख पृष्ठ पर धुंधली सी तस्वीर थी। नीचे शीर्षक पढ़ा-‘ग्राम सेविका फसब कंवर! अपनी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए जि़लाधीश द्वारा सम्मानित। उसकी हंसी छूट गई। फ़सब कंवर! क्या नाम है। और तभी याद आया। उस दिन भी तो वह ऐसे ही हंसी थी। नींद और झुंझलाहट हवा हो गई। पुन: तस्वीर से मिलान किया, माथे तक पल्ला, दुबली-पतली काया और आंखों की निश्चल चमक-होठों पर खेलती अव्यक्त मुस्कान। यही तो पहचान थी उसकी। एक-झटके में ही पूरा समाचार पढ़ गई अलका फसब कंवर गांव में कन्या शिक्षा अभियान से जुड़ी जीवट नारी हैं। महिला उत्थान, गरीबी, बीमारी और समाज सेवा के कार्यों का निरंतर नेतृत्व कर रही हैं।
कितने वर्ष बीत गए। मन यादों के गलियारों में डोलने लगा। शायद अठारह या बीस वर्ष पहले ग्रेजुएशन के बाद उसने पास ही एक निजी संस्थान द्वारा संचालित विद्यालय में अध्यापन कार्य किया गया था। न तो उसकी अध्यापन में रुचि थी, न ही उन श्रमिक वर्ग के बच्चों के प्रति कोई लगाव। उसके लिए नौकरी यूं ही कुछ अतिरिक्त आय और टाइम पास का माध्यम मात्र थी। कक्षा एक की प्रभारी थी वह। बच्चे अवश्य उसके विविध परिधानों और गाड़ी से प्रभावित रहे होंगे।
निजी होते हुए भी विद्यालय में शिक्षा विभाग के नियमों और गतिविधियों की अनिवार्यता थी। उन्हीं दिनों राज्य सरकार द्वारा आयोजित ‘कन्या शिक्षा अभियान’ के अन्तर्गत इस दुबली-पतली गंवार सी लडक़ी को प्रवेश दिया गया था। प्रधानाध्यापिका ने उसे ऑफिस में बुला कर इस नई छात्रा का नाम लिखने का आदेश दिया था। एक निगाह डालते ही मन वितृष्णा से भर उठा था। घुटने से नीचे तक लटकती बेडौल, शायद मांगे की फ्रॉक! नंगे पॉव! बेतरतीब रूखे बाल! ‘ये पढ़ेगी’ मेरे मन के भावों को समझ कर प्रधानाध्यापिका स्वीकृति और कुछ आश्वासन से मुस्करा दी थी। नाम’ फसब कंवर! अनायास ही उसकी हंसी छूट गई थी। जैसी बेढंगी वैसा ही नाम! शायद पुष्प का देहाती रूपांतर रहा होगा। पास ही उसकी मां घूंघट से मुंह ढापे फर्श पर ही बैठी अपने नवजात शिशु को दूध पिला रही थी। बाप निर्लिप्त भाव से खड़ा था। साफ दिख रहा था कि कुछ स्वयंसेवकों ने इन्हें ज़बरदस्ती बेटी का नाम लिखाने भेजा होगा।
थोड़ी देर बाद चपरासन फसब को कक्षा में छोड़ गई। कक्षा एक के छात्र दो साल की के.जी. कक्षाओं के बाद काफी अनुशासित और संतुलित थे। फसब कक्षा में आई तो बच्चे अचकचा उठे। दस-ग्यारह साल की यह लडक़ी उन बच्चों के बीच अजूबा लग रही थी। अलका के इशारे पर उन्होंने सरक कर टाटपट्टी पर इस नए आगंतुक के लिए जगह बना दी और वह अकर-बकर चारों ओर देखती रही, जैसे किसी अजायबघर में आ गई हो। दो दिन ऐेसे ही निकले। इस बीच श्यामपट पर लिखित अक्षरों व उच्चारित शब्दों पर उसका ध्यान केंद्रित हुआ। फिर उसे विद्यालय की ओर से बस्ता, पुस्तकें, यूनीफार्म आदि दिए गए। पुस्तक हाथ में आते ही जैसे उसे कोई अनमोल खज़ाना मिल गया हो। वह श्यामपटट पर लिखे अक्षरों का किसी चित्रकार की सी कुशलता से अनुकरण करती। बहुत जल्दी उसने कविताएं कंठस्थ कर लीं। देखते ही देखते वह अधिकांश बच्चों के समकक्ष और फिर उनसे आगे बढ़ गई। स्टाफ रूम में उसकी चर्चा होती। अलका मन ही मन कक्षाध्यापिका होने के नाते उसके इस कायाकल्प का श्रेय खुद लेना चाहती। पर फिर झटके से याद करती कि मैंने तो उसे कभी प्रोत्साहित ही नहीं किया।
फसब के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा आकर्षण था उसकी उजली उत्सुक आंखें और अनजाने ही होठों पर थिरकती हंसी।
विद्यालय में खेलकूद प्रतियोगिताएं आयोजित हुई तो वह सिर पर पानी से भरी भारी मटकी रखकर फुर्ती से दौड़ी और प्रथम आई। कितने ही इनाम उसने झोली में बटोरे। हर काम के लिए तत्पर रहती। कक्षा का पूरा दायित्व उसके ऊपर था। डस्टर, चॉक, कापियां सब व्यवस्थित रखती। जब एक बार कक्षा का एक छात्र झूले से गिर कर बुरी तरह चोट खा गया, तो उसने एक कुशल नर्स की तरह उसे संभाला। घाव धोया, पट्टी की। आदेशात्मक स्वर में बच्चों की भीड़ हटा कर उसकी तीमारदारी की। ऐसी दबंग थी वह एक बार, केवल एक बार बड़े अनुग्रह से उसने कहा था- मैडम, मैं भी बड़े होकर आपकी तरह टीचर बनूंगी। बदले में अलका ने धीरे से उसका गाल सहला दिया था।
चार महीने निकल गए। कभी एक दिन भी उसने नागा नहीं किया। साफ धुले कपड़े करीने से की गई कंघी। कक्षा में जैसे कोई सुगंध बिखेर देती। सचमुच ही अगर उसे विद्यालय का आधार न होता तो उसका अद्भूत व्यक्तित्व गुमनामी के अंधेरे में दम तोड़ देता।
फिर एक दिन वह विद्यालय नहीं आई। दो दिन चार दिन ऐसे ही बीते। आशंका हुई तो पता लगाया। ‘गांव ले गए हैं, ब्याह है।’
शादी? अलका सन्न रह गई। तनमन झन्ना उठा। शादी इस उम्र में? जैसे आसमान से गिरी। अभी तो पहली बार उसने खुली आंखों से दुनिया को निहारा है। शादी, घर और बच्चे! क्या यही उसकी नियति होगी! जिस झोंपड़े में वह रहती थी, उसे खाली कर गए थे। मन किया, किसी तरह उसके गांव जाकर यह अनर्थ न होने दे। पर फिर वही उदासीनता, कुछ असमर्थता की भावना हावी हो गई और समय अपनी गति से गुजऱता चला गया। अलका ने भी वह साल जैसे-तैसे निकाला और फिर व्यस्तताओं ने घेर लिया।
अलका का दिल भारी हो गया। वह स्वयं पति, परिवार और दोनों बेटों के साथ सुरक्षित है। न कभी अभाव देखा न पीड़ा सही। फिर भी उसे अपना जीवन उस अपरिचित नारी के समक्ष बौना लग रहा था। वह स्वयं क्या है? सजी हुई गुडिय़ा चमचमाती कार, शॉपिंग, किटी पार्टियां… जैसे किसी फ्रेम में जडक़र रह गया हो उसका व्यक्तित्व! कितना बोझिल, सारहीन जीवन है उसका!
और यह फसब! नदी की तीव्र धारा जो हर बंधन लांघने को बेताब है। वहां संघर्ष है। हर पल चुनौती है। परम्पराओं की टक्कर है। न जाने कितनी बार गिरी होगी, संभली होगी। फसब तुम हारी नहीं। तुम नहीं ‘हारी’, शान से कहो ‘मैं हूं फसब।’
अलका उद्वेलित हो उठी। क्या करूं? उसके गांव का पता ठिकाना पाना कुछ कठिन नहीं होगा। वहां जाऊं और सबके सामने उसे गले लगा कर कहूं, ‘याद करो फसब। मैं हूं तुम्हारी टीचर।’ पर नहीं। अलका को लगा, यह उसका अहं बोल रहा है फिर! ‘क्या उसे अपना रुपया-पैसा, ऐश्वर्य दिखाने जाऊं? उसे इसकी दरकार कहां है? वह तो स्वयं मशाल हैं।
सोमेश से कहे तो भी क्या लाभ! उसने तो पति से कभी फसब के नाम का जिक्र तक नहीं किया है। फिर आज रविवार को जल्दी उठने का क्या काम? कल रात के शो में ‘रंग दे बंसती’ देख कर आए हैं। देर रात तक उस पर चर्चा हुई है। सबके अपने -अपने तर्क। फिर आज बच्चों को डिज़नीलैण्ड भी ले जाना है। एक बार फिर मन का आलस शरीर पर हावी हो गया हमेशा की तरह।
यह भी पढ़ें –मूल्याकंन – गृहलक्ष्मी कहानियां
-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com
-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji
