मेरा घर, मेरा अपना-गृहलक्ष्मी की कहानियां: Mera Ghar Story
Mera Ghar, Mera Apna

Mera Ghar Story: आज मैंने अपने 2 कमरों वाले छोटे से घर के दरवाजे के बाहर अपने नाम की तख्ती लगाई। काले रंग की तख्ती पर सुनहरे रंग से बड़ा-बड़ा लिखा था “मेरा अपना” और नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था “ कामिनी एवं अजय”। कामिनी यानी में और अजय मेरे पति।
पहली बार पूरे हक से अपने घर का एहसास हुआ था।
यूं तो मेरा बचपन का घर है लेकिन वह तो कब का मायका हो चला; जहां शादी हो कर गई थी वह सिर्फ ससुराल था। सुनती थी कि जो लड़की शादी के बाद ससुराल से अपना अलग घर बनाती है, वह उसका ‘ अपना घर’ होता है। लेकिन मेरे साथ ऐसा भी नहीं हुआ था।
मेरा अलग घर मेरे ससुराल वालों के हिसाब से उनके बेटे का घर था। उस घर के लिए बाकी लोग कभी भी अपनी राय दे सकते थे सिवाय मेरे। मेरा रत्ती भर भी हक नहीं था उस घर पर। बस जिम्मेदारियां थी मेरी उस घर में।

धीरे-धीरे यह बातें बढ़ती चली गई । मेरे दो बच्चे उसी घर में हुए, लेकिन मैं उनके पैदा होने की कोई खुशी नहीं मना पाई। पर एक मां होने के नाते उनके हक के लिए मैंने खुद को मजबूत करा। कुछ चीजों में कभी बिना कुछ कहे तो कभी थोड़ा कहकर उनके लिए उनके हक की जगह बनाई। पर मन में एक बात मजबूती से जड़ पकड़ चुकी थी— ‘ मेरा अपना घर’। उसके लिए अपने दम पर अब मुझे कुछ करना था।
ईश्वर ने आवाज और लिखने का वरदान दिया था। अपनी इसी काबिलियत को मैंने अपना हथियार बनाया।
बच्चों की जिम्मेदारी के साथ ज्यादा वक्त के लिए तो मैं घर से बाहर नहीं रह सकती थी, इसलिए कंप्यूटर का सहारा लिया और अपने विचार कहानी और कविताओं के माध्यम से दुनिया तक पहुंचाने लगी। टेक्नोलॉजी की सहायता से अपनी कविताओं के वीडियोस बनाएं। धीरे-धीरे लोगों को मेरी लिखावट में रूचि होने लगी और वह अक्सर पूछते कि मेरी नई कविता या कहानी कब आ रही है।
इसी शौक के चलते एक दिन मेरे पास एक फोन आया, “ आप कामिनी जी बोल रही हैं?” मेरे हां कहने पर उन्होंने अपना परिचय दिया, “ मैं पुस्तक प्रकाशन का संपादक अनिल गुप्ता बोल रहा हूं।” उनका नाम सुनकर 2 मिनट के लिए मैं स्तब्ध रह गई, यह तो बहुत बड़ी प्रकाशन कंपनी है। उन्होंने कहा कि वह एक किताब लिखवाने के सिलसिले में मुझसे मिलना चाहते हैं। पहली बार ऐसा प्रस्ताव सुनकर मुझे घबराहट भी हुई और बहुत खुशी भी हुई। अपने मन को संभाल कर मैंने कहा, “ ठीक है, आप बता दीजिए कब और कहां मिलना है।” उन्होंने जवाब दिया, “ कल दोपहर 12:00 बजे आप हमारे दफ्तर आ जाइए, मैं आपको पता मोबाइल पर भेज दूंगा।” मैंने उनको हामी भर दी।
वक्त के चलते अजय भी मेरा काफी हद तक साथ देने लगे थे। बच्चे भी अब इतने बड़े हो गए थे कि वह स्कूल से आकर अपना ध्यान रख सकते थे। फिर एक ही दिन की तो बात थी जब मुझे संपादक से मिलने जाना था।
अगले दिन 11:00 बजे तक खाना तैयार करके मैं ‘प्रकाशन हाउस’ के लिए निकल गई। वहां पहुंचकर अनिल जी से मिली, उन्होंने मुझसे अपनी किताब के बारे में विस्तार से बताया। जब वह अपने विचार रख रहे थे तभी मेरे दिमाग में कहानी के लिए एक भूमिका तैयार होने लगी थी। अनिल जी से रॉयल्टी वगैरा की बात करके कॉन्ट्रैक्ट पेपर पर मैंने दस्तखत किए और एक कॉपी अपने पास रख ली। मुझे किताब लिखकर 1 महीने में देनी थी।
बच्चों के काम के साथ अपने लिए वक्त निकालना था। मैंने पूरी तरह सोच समझकर एक अनुसूची तैयार करी और कदम रखे अपनी पहली सीढ़ी की तरफ।
दिन रात वक्त निकालकर पूरी मेहनत और लगन के साथ 1 महीने के अंदर मैंने अनिल जी को किताब लिखकर दे दी और एडिटर के साथ मिलकर हमने फाइनल कॉपी तैयार करी। किताब के अनावरण के लिए प्रेस के सामने एक छोटा सा समारोह भी रखा गया। उस समारोह में अजय और मेरे बच्चे भी आए थे। उनकी आंखों में अपने लिए गर्व देख कर मुझे बहुत खुशी हुई थी। मेरी मेहनत और किस्मत ने मेरा साथ दिया। बाजार में आने की देर थी कि किताब के साथ-साथ मेरा नाम लोगों की जुबान पर आने लगा। जितना सोचा था उससे कहीं ज्यादा पैसे मिलने लगे और आगे के लिए काम भी। काफी हद तक लोग मुझे पहचानने लगे थे।
कुछ असाइनमेंट के बात ही मैंने इतने पैसे जमा कर लिए कि अपने पैसों से आज मैंने “ मेरा अपना घर” ले लिया।

अपनी पसंद का पीला गेरुआ रंग कराया था। पसंद के हल्के नारंगी परदे और पुराने जमाने के मिट्टी और तांबे के सामानों से अपना घर सजाया। किताबें पढ़ने का हमेशा से मुझे शौक था, इसीलिए उसके लिए मैंने अलग से एक लकड़ी की अलमारी भी बनवाई थी। जमीन पर एक कोना जहां पर गद्दा बिछाकर, उस पर चादर बिछा कर मैंने उस कोने को कुछ खास तस्वीरों से सजाया था। घर के बाहर एक छोटा सा बरामदा भी था। वहां मैंने झूले वाली कुर्सी और एक छोटा सा स्टूल रखा था। उसके आगे छोटा सा बगीचा जिसमें एक अशोक का पेड़ लगाया था और कुछ पसंद के पौधे भी लगाए थे। तख्ती पर अपने और अपने पति के नाम से ज्यादा “ मेरा अपना” पढ़कर मुझे अपने आप पर बहुत गर्व से फूला नहीं समा रहा था। आज ईश्वर ने मेरी वह गुजारिश पूरी करी थी जो कई साल पहले मेरे मन ने उनसे कही थी…………..