Mayavi Bahu
Mayavi Bahu

Summary: जब सास बनी बोझ: आधुनिक बहू और बेटे के बीच छूट गई मां की जगह

यह कहानी बताती है कि कैसे आधुनिकता और अहंकार के बीच बुज़ुर्ग मां की इज़्ज़त खो जाती है। अंत में शिवकांता देवी ने खुद को मजबूत बनाकर अकेले जीना सीख लिया और अपनी पहचान वापस पा ली।

Sad Story in Hindi: मैनपुरी के एक शांत मोहल्ले में शिवकांता देवी अपने बेटे अजय के साथ रहती थीं। पति का देहांत बरसों पहले हो चुका था, और बेटे को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाया था। अजय की नौकरी लगी तो उन्होंने उसकी शादी बड़े चाव से करवाई। बहू रिमी शहर की पढ़ी-लिखी लड़की थी, सुंदरता और फैशन में माहिर। शादी के बाद कुछ दिन तक तो सब ठीक चला, लेकिन धीरे-धीरे सास के जीवन में अंधेरा उतरने लगा।

शुरुआत में रिमी बड़े अदब से रहती थी, परंतु जैसे ही घर का माहौल समझ में आया, उसने अपने असली रंग दिखाने शुरू किए। वो हर काम पर टोकने लगी, ‘मम्मीजी, इतना सुबह उठकर क्या कीजिएगा?’, ‘ये पुराने साड़ी और मंदिर की मूर्तियाँ हटा दीजिए, घर का लुक बिगड़ रहा है।’

शिवकांता देवी कुछ नहीं कहतीं। वो समझ रही थीं कि आज की बहुएं थोड़ी अलग सोच रखती हैं। लेकिन रिमी की ‘अलग सोच’ सिर्फ आधुनिकता तक सीमित नहीं थी, बल्कि हद से ज़्यादा मनमानी और अधिकार जताने की तरफ बढ़ चुकी थी।

रिमी ने धीरे-धीरे किचन पर कब्ज़ा कर लिया। कहती  ‘अब मैं काम करती हूं, आप आराम कीजिए।’ लेकिन उसका मतलब था  ‘मेरे हिसाब से चलिए।’ शिवकांता देवी अगर दूध में हल्दी डाल देतीं, तो ताना मिलता, ‘ये देसी नुस्खे मत अपनाइए, साइंस से कोई लेना-देना नहीं।’

अजय, जो कभी मां का लाडला था, अब अपनी पत्नी के कहने में रहने लगा। रिमी ने इतनी चालाकी से माहौल बनाया कि अजय को लगने लगा कि उसकी मां पुराने ज़माने की सोच वाली हैं और घर की प्रगति में बाधा बन रही हैं।

अब घर में पूजा भी सिर्फ बहस का मुद्दा बन गई थी। अगर शिवकांता देवी घंटे भर भजन गातीं, तो रिमी कहती, ‘मुझे सिरदर्द हो रहा है, प्लीज़ बंद कीजिए।’ वो घर में एक तरह से गेस्ट बनकर रह गईं  खाने में टोकाटाकी, टीवी देखने पर पाबंदी, हर काम में नखरे।

परिवार की शांति धीरे-धीरे टूट रही थी, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ा। आख़िरकार एक दिन रिमी ने सारी हदें पार कर दीं। बोली
‘मम्मीजी, अब तो आप 60 की हो गई हैं, वृद्धाश्रम का एक बढ़िया विकल्प मिला है… मैं फॉर्म भर देती हूं?’

ये सुनते ही शिवकांता देवी की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन उन्होंने खुद को कमजोर नहीं बनने दिया। चुपचाप अपनी एक पुरानी FD तोड़ी, शहर के पास एक छोटा-सा फ्लैट देखा और वहां शिफ्ट हो गईं  बिना किसी को बताए।

कुछ ही हफ्तों बाद अजय की नौकरी छूट गई। EMI, खर्चा, राशन  सब मुश्किल में पड़ गया। रिमी की फिजूलखर्ची ने हालत और बिगाड़ दी। अब रिमी दिन भर कुंठा में रहती, और अजय गुस्से में। वो माहौल जो कभी शिवकांता देवी की उपस्थिति में शांत था, अब बोझिल और टकराव से भरा हुआ था।

एक दिन अजय ने कहा, ‘मां होतीं तो आज हमें संभाल लेतीं।’ रिमी चुप थी पहली बार।

अब दोनों ने कोशिश की मां को मनाने की, लेकिन शिवकांता देवी साफ बोल चुकी थीं  ‘मैंने अब अकेले रहना सीख लिया है… वहां तुम्हारे घर में मां नहीं, सिर्फ ‘बुज़ुर्ग महिला’ बनकर रह गई थी। अब मेरी जिंदगी मेरी है।’

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...