विवेक की मदहोशी तब कुछ कम हुई जब उसने कार का दरवाजा खुलने और फिर बंद होने की आवाज सुनी…उसने आंखें खोलने की कोशिश की तो ऐसा लगा जैसे कुछ लहरें-सी चल रही हों।
अचानक उसके कानों में आवाज आई‒”मम्मी! आज पहली बार तो उसे मुश्किल से घर लाई हूं।”
“बेटी! तुम उसके साथ खोली में तो रही हो।”
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“मगर खोली में तो उसने मुझे हाथ भी नहीं लगाया।”
“क्या कह रही हो? क्या तुम दोनों ने सुहागरात नहीं मनाई?”
“ओ नो मम्मी…उसने तो मुझसे इसलिए शादी की है कि उसे विश्वास है कि उसकी पहली पत्नी मर जाएगी…किसी ज्योतिषी ने उसका हाथ देखकर उसे मूर्ख बना दिया है…ऐसा न होता तो वह कभी मुझसे शादी नहीं करता।”
“पागल है…वैसे गधे हसबैंड के साथ लाइफ बड़े मजे में गुजरती है…लेकिन आज खाली हाथ न जाने पाए।”
“इतनी पीने के बाद तो मैंने इसे पूरी बोतल में उतार लिया था।”
विवेक अब पूरी तरह होश में आ चुका था…उसने मैनिका के अंदर जाते कदमों की आहटें सुनीं…फिर देवयानी ने पिछला दरवाजा खोला और विवेक की बांह पकड़कर खींचने लगी।
विवेक ने अचानक उसे जोर से धक्का दिया और वह हल्की-सी चीख के साथ लड़खड़ा कर पीछे हट गई…विवेक बाहर निकलकर लड़खड़ाती आवाज में बोला‒
“साली…तुम मां-बेटी हो या कुछ और…अपन को नहीं मालूम था तू एक नम्बरी’ है तो तेरी मां दस नम्बरी…और साली‒तुम लोगों का कुछ ईमान-धरम भी है।”
“विवेक-तुम नशे में हो….अंदर चलो।”
“धत्त…साली…इस पाप की छत के नीचे अपन एक सांस भी नहीं लेगा।”
विवेक आगे बढ़ने लगा तो देवयानी ने उसकी बांह पकड़ कर कहा‒
“मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी।”
“अबे…हट!” विवेक ने उसे फिर धक्का दिया तो देवयानी कार से टकराई…लेकिन अब उसके ऊपर पागलपन-सा सवार हो गया था…उसने झपट कर विवेक को दबोच कर कहा‒
“नहीं जाने दूंगी…तुम कानून अनुसार मेरे पति हो।”
“ऐ साली…अपन से कुश्ती लड़ने का है क्या? अपन अब तक इसलिए चुप रहा कि तू औरत है।
“मैं तुम्हारी ‘वाइफ’ हूं।”
“और वह अपन की कौन हुई…तेरी मां?”
“मदर-इन ला।”
“इन ला हटा के क्या बनेगी?”
“मदर-मतलब मां।”
“और वह साली अपने बेटे के माफिक सन-इन-ला के बारे में क्या बोलेली थी?”
इस बार विवेक के धक्का लगने से वह काफी दूर तक चली गई…उसकी आंखें जैसे अंगारे-से उगलने लगीं…जैसे वह आगे विवेक से हार मानने को तैयार नहीं है…आज वह उसे अपने साथ सुलाकर ही रहेगी‒इस बार वह पूरी शक्ति से विवेक पर झपटी…लेकिन विवेक होशियार हो गया था…उसने फुर्ती से कन्नी काटी और देवयानी झोंक में आगे निकल गई…साथ ही वह लड़खड़ाकर गिर गई थी। विवेक फाटक की ओर भागा….देवयानी उठकर उसके पीछे दौड़ती हुई चिल्लाई‒”चौकीदार! खबरदार…फाटक मत खोलना।”
विवेक ऊंची छलांग मारकर फाटक पर से सड़क पर आ गया…अंदर से देवयानी चिल्लाई‒
“चौकीदार…पकड़ो…जाने न पाए।”
चौकीदार ने विवेक को भागते हुए देखा तो अचंभे से बड़बड़ाया‒”यह तो जंवाई बाबू हैं…अभी तो गाड़ी में आए थे बेबी और मालकिन के साथ।”
देवयानी फाटक पर रुककर चौकीदार को डांट कर बोली‒”बास्टर्ड, उसे रोका क्यों नहीं…मैं लगातार चिल्ला रही हूं।”
फिर वह खुद फाटक से निकल कर दौड़ने लगी…वह चिल्लाए जा रही थी‒
“विवेक-विवेक…।”
“विवेक…मैं कहती हूं रुक जाओ।”
देवयानी और भी अधिक तेजी से दौड़ती चिल्लाई‒”पकड़ो…पकड़ो…चोर…चोर….पकड़ो…पकड़ो।”
एक ड्यूटी कान्स्टेबल ने सीटी बजाई…तो विवेक भी चिल्लाने लगा‒”चोर…चोर…पकड़ो…पकड़ो…चोर…चोर।”
ड्यूटी कान्स्टेबल उसके साथ-साथ दौड़ता हुआ बोला‒
“कहां है चोर?”
“वह पीछे आ रहा है।”
कान्स्टेबल ने कहा‒”पीछे तो एक मेमसाहब आ रही हैं।”
“वह मेमसाहब नहीं…मेरी वाइफ है।”
“ओहो…मैं समझा था आप चोर हैं।”
“साले…सूरत से तुम चोर नजर आते हो या मैं।”
ड्यूटी… कान्स्टेबल लौट गया….विवेक जल्दी से एक गली में घुस गया…कुछ देर बाद कान्स्टेबल और देवयानी साथ-साथ दौड़ते आगे निकल गए….देवयानी कह रही थी‒
“मैं उसी को पकड़ने को कह रही थी।”
“मगर वह तो कह रहा था आप उसकी मिसेज हैं।”
“शॅट अप एंड गैट लास्ट।”
विवेक आराम से गली से बाहर निकल आया…इतने में एक टैक्सी नजर आई….विवेक उसे रोक कर पिछली सीट पर बैठ गया और ड्राइवर को पता बताकर बोला‒”मैं जरा नींद के मूड में हूं…बस्ती के बाहर मुझे जगाने का है।” खर्राटे लेने लगा….फिर उसे ड्राइवर ने झिंझोड़ कर ही जगाया। विवेक किराया चुका कर जम्हाई लेकर उतरा ही था कि उसने दूसरी टैक्सी देखी जिसमें से देवयानी उतरी और इधर-उधर देखकर तेजी से गली के अंदर चली गई। विवेक जल्दी से खोली के खोके की छत पर चढ़कर लेट गया।
देवयानी ने जोर-जोर से दरवाजा पीट डाला…बस्ती में सन्नाटा था…रीमा देवी ने दरवाजा खोला और आंखें मलकर देवयानी को देखकर चौंक कर पूछा‒
“बहू….तुम! इस वक्त?”
देवयानी संभलकर बोली‒मांजी, विवेक आ गए।
“नहीं तो…वह तुम्हारे साथ ही तो महेश की शादी पर गया था।”
“जी…उन्होंने वहां ज्यादा पी ली थी…पता नहीं किस समय निकल आए।”
“अरे-जाएगा कहां…वापस तो यहीं आएगा। तुम चिन्ता मत करो…अंदर आकर सो जाओ।”
“मांजी…असल में मेरा उनसे झगड़ा हो गया था।”
“तो क्या हुआ? ऐसे कौन-से पति-पत्नी हैं जिनमें आपस में झगड़ा नहीं होता‒तुम सो जाओ।”
“मुझे नींद नहीं आएगी जब तक वह नहीं आ जाते।”
“अच्छा तुम जाओ‒मैं उसे लेकर आती हूं‒मुझे मालूम है ऐसे हालात में वह कहां होता है?”
रीमा सोटी उठाकर बाहर निकली तो देवयानी भी पीछे-पीछे चलने लगी…बाहर आकर रीमा देवी एक खोखे के पास जाकर जोर से सोटी छत पर मार कर चिल्ला कर बोलीं‒”विवेक के बच्चे उतर नीचे…कमीने तू बहू से झगड़ा करता है…चल नीचे आ।”
“मां! यह साली बहू नहीं चुड़ैल है।”
“हांय…क्या बकता है।”
“साली…पास ही तो खड़ेली है…पूछ लो इससे।”
“क्या पूछूं?”
“अपन को शर्म आएली है।”
“बहू…यह क्या कह रहा है?”
देवयानी बौखला गई‒”वो…वह मांजी! मम्मी का कोई बेटा नहीं है…इन्हें देखकर मम्मी को बेटे जैसा प्यार आ गया था।”
“और साली।” विवेक बोला‒”अपन को दामाद की जगह वह न जाने क्या अला-बला बोलेली थी।”
“मांजी…मेरी मम्मी ऊंची सोसाइटी की हैं…क्या वह बेटा-बेटा पुकारतीं…डियर नहीं बोल सकती थीं।”
“अच्छा तू नीचे आता है या नहीं?”
विवेक उठकर बैठ गया और रुआंसी आवाज में बोला‒”आएला है…मारेंगी तो नहीं।”
“नहीं मारूंगी…चल नीचे आ।”
विवेक नीचे कूद पड़ा…रीमा देवी अपनी दरी बाहर लेकर आई और बरामदे से बिछा ली‒”अच्छा बहू…अन्दर से दरवाजा बन्द कर लेना।”
देवयानी ने दरवाजा बंद कर लिया…फिर विवेक की ओर ऐसे मुड़ी जैसे विवेक अंदर कैद हो गया हो‒दूसरे ही क्षण विवेक ने उसे दबोचकर उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया‒उसके हाथों को पीछे बांध कर दोनों टांगे भी बांध दीं।

देवयानी के गले से अजीब-अजीब सी आवाजें निकलती रहीं…बाहर लेटी रीमा देवी के होंठों पर मुस्कराहट आई…फिर वह सो गई‒देवयानी कुछ देर मचलती ही रही और बेबसी से विवेक को देखती हुई वह भी सो गई….लेकिन विवेक पहले ही खर्राटे भर रहा था…और आस-पास सन्नाटा।
दूसरे दिन सुबह जोर से दरवाजा पीटने की आवाज सुनकर विवेक की नींद टूट गई…रीमा देवी दरवाजा खटखटाए जा रही थीं‒विवेक ने जल्दी से उठकर देवयानी को देखा‒वह भी जाग गई थी, लेकिन वैसे ही बंधी पड़ी थी…विवेक ने खाट से कूद कर उसके पास उकडूं बैठकर तेज कानाफूसी में कहा‒
“साली…मां को कुछ बताएंगी तो अपन अक्ख बस्ती को इकट्ठा करके तेरे और तेरी ‘माम’ मां के काले कारना में बता देंगा।”
फिर उसने देवयानी को खोल दिया और खुद जल्दी से लेट गया। देवयानी ने कराह कर अपनी कलाइयां सहलाईं‒फिर दरवाजा खोल दिया…देवयानी का चेहरा ध्यान से देखकर वह मुस्कराई और फिर विवेक को देखकर मुस्करा कर बोलीं‒
“अनाड़ी है बहू…और नादान भी ‒इसकी बातों का बुरा मत मानना…मेरा बेटा कैसा भी सही…मगर दिल का एकदम साफ….है जो दिल में होता है वही जबान पर…बाप की छाया नहीं मिली न इसलिए दुनियादारी भी ठीक तरह नहीं समझता।”
देवयानी कुछ नहीं बोली‒उसने ध्यान से विवेक को देखा‒वैसे तो देवयानी दूसरी लड़कियों की तरह विवेक की पुरानी दीवानी थी….एक बार उसके साथ शारीरिक मिलाप के बाद वह उसके लिए बिल्कुल पागल हो गई थी‒लेकिन आज पहली बार उसने विवेक को ऐसी नजरों से देखा जिसमें वासना नहीं थी‒अनायास उसके दिल में विवेक के लिए प्यार उभरा…रीमा का एक-एक शब्द सही था….सचमुच विवेक बिल्कुल सीधा है…सतयुग का महापुरुष, जो गलती से कलियुग में पैदा हो गया है…जो दिल में होता है वही जबान पर।
वह सोच रही थी इससे बढ़कर और क्या होगा कि साधारण ज्योतिषी के कथन पर विश्वास करके उसकी पहली पत्नी मर जाएगी और यही अंत अंजला के पहले पति का होगा, उसने अपनी प्रेमिका की शादी अपने दोस्त महेश से करा दी।
देवयानी ने झुककर विवेक का माथा चूम लिया…इस गहरी नींद में इस समय वह कोई फरिश्ता-सा लग रहा था।
रीमा देवी उसे दरवाजे के पास चुपचाप खड़ी देख रही थी।

“तू नहा ले बहू…मैंने रात ही को पानी भर लिया था… अगर तू चाहेगी तो मैं विवेक को चंद दिनों के लिए तेरे साथ तेरे मायके रहने को भेज दूंगी।”
देवयानी की कल्पना में उसकी अपनी ‘हाई सोसाइटी’ वाली मां घूम गई…उसने झुरझुरी-सी लेकर कहा‒
“नहीं…नहीं मां…मुझे यहीं अच्छा लगता है…मैं यहीं रहूंगी…जब मां से मिलने को जी चाहेगा…तभी जाया करूंगी।”
“जैसे तेरी खुशी…तू नहा ले दरवाजा अंदर से बंद करके मैं नाश्ते के लिए सामान ले आऊं।”
रीमा देवी चली गई….देवयानी पास ही छोटी-सी दीवार की ओट में स्नान इत्यादि के लिए बने स्थान में कपड़े उतार कर नहाने के लिए बैठी ही थी कि विवेक ने हल्की-सी करवट ली और देवयानी को जाने क्या शरारत सूझी कि उसने पानी के कुछ छींटे विवेक पर फेंक दिए…विवेक एकाएक उठ खड़ा हुआ…उसने चिल्लाकर कुछ कहना चाहा, मगर उसे वस्त्रहीन देखकर जल्दी से लेटकर करवट लेता हुआ बड़बड़ाया‒
“लुच्ची…लफंगी…वेश्या।”
देवयानी मुस्करा कर नहाने लगी…और….विवेक…फिर धीरे से करवट लेकर उसे देखने लगा…मानो भीतर आग सुलगने लगी हो।
