फिर वह सीटी बजाता हुआ आगे बढ़ता चला गया।
फाइनल एग्जाम शुरू हो गए थे और विवेक ने नियम से पढ़ना और कॉलेज जाना शुरू कर दिया था‒उसे इस बात का विश्वास हो गया था कि अब वह तीसरी शादी कर सकता है, इसीलिए यह भी विश्वास बन गया था कि महेश का ऑपरेशन सफल नहीं होगा…उसे अंजला मिल ही जाएगी।
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आजकल वह मन लगा कर पढ़ रहा था। पढ़ाई के लिए उसका एकांत स्थान खोली के खोके की छत थी…कॉलेज से आकर वह आधी रात तक वहीं पढ़ता रहता…खोके के पास ही एक लैम्प पोस्ट भी था जिसकी रोशनी अच्छी-खासी थी।
इन दिनों खोके के आस-पास बच्चों का खेलना, हॉकर्स की आवाजें बिल्कुल बंद थीं…क्योंकि उधर के सभी विवेक को जानते थे‒सुबह देवयानी भी गाड़ी लेकर आती-जाती थी…देवयानी के साथ ही वह कॉलेज जाता था।
उस दिन विवेक का आखिरी पर्चा था…वह खुश था नहा-धोकर कपड़े बदलकर नाश्ते के बाद रीमा देवी के चरण छू कर वह बाहर निकला तो देवयानी की कार खड़ी थी…वह देवयानी के साथ आ बैठा और कार चल पड़ी।
“आज तुम्हारा आखिरी पर्चा है।” देवयानी ने कार चलाते हुए पूछा।
“हां…पर तेरा।”
“कल मैं भी फ्री हो जाऊंगी।”
“एक बात बोलेंगी?”
“पूछो।”
“तेरे को पता है अपन के लेख में क्या है?”
“तुम्हारी पहली पत्नी मर जाएगी।”
“अरे…तू कौन है?”
“तुम्हारी पहली पत्नी।”
“क्या तेरे को विश्वास नहीं कि तू मर जाएंगी?”
“विश्वास है।”
“फिर काहे को पढ़ेली है?”
“पढ़ाई से मरने-जीने का क्या सम्बन्ध?”
“अरे…तू क्या ‘ऊपर वाले’ के यहां स्टैनो की नौकरी करेगी?”
“तुम कुछ भी समझ लो।”
“महेश ने काहे को पढ़ना छोड़ा?”
“क्योंकि उसे विश्वास नहीं कि वह बचेगा या नहीं।”
“फिर?”
“फिर भी उसे जीने की आस है इसलिए ऑपरेशन कराने गया है।”
“चला गया?” विवेक उछल पड़ा।
“कल ही गया है।”
“पर अपन को कोई खबर नहीं।”
“कौन करता?”
“अंजू तो अपन को कर सकती थी।”
“अंजू ने मुझे खबर करने को बोला था।”
“उसे मालूम है कि जो कुछ मुझे मालूम है, तुम्हें भी मालूम हो जाएगा।”
“अंजू उसके साथ नहीं गई?”
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि वह गर्भवती है।”
“क्या बोला? गर्भवती है।”
“हां।”
“किसका गर्भ है उसकी कोख में?”
“तुम्हारा।”
“झूठ-जरूर महेश को होगा।”
“क्या तुम्हें अंजला पर भरोसा नहीं?”
“है।”
“तो फिर वह झूठ क्यों बोलेगी…वह तभी गर्भवती हो गई थी जब तुमने उसके साथ सुहागरात मनाई थी।”
“यह बात क्या महेश को मालूम है?”
“नहीं।”
“अगर हो गईएली तो?”
“तो भी कुछ नहीं होगा।”
“क्यों?”
“अंजला ने उसे बता दिया था कि जब किसी ने उसे महेश की मौत की झूठी खबर दी थी…उसने तुमसे शादी भी कर ली थी और ‘गोल्डन नाइट’ भी मना ली थी।”
“तो वह खूसट जगमोहन को क्या बोलेंगे?”
“महेश बताएगा कि वह उसका अपना गर्भ है।”
विवेक के चेहरे पर जैसे खुशी की लहर-सी दौड़ गई..वह सिर पर हाथ फेर कर बड़े खुश स्वर में बोला‒”अबे साला बाप भी बन जाएंगा…यह तो अपन सपने में भी नहीं सोचेला था।”
“अब तुम एक जिम्मेदार आदमी बनने जा रहे हो।”
“साली! आज अपन आखिरी पेपर देने जाएला है या जिम्मेदार आदमी बनने?”
“विवेक! मैं खास आज की बात नहीं कर रही…आज तुम आखिरी पर्चा देकर ‘एग्जाम’ से फारिग हो जाओगे। मैंने मम्मी से कहकर तुम्हारे लिए नौकरी का भी प्रबंध कर दिया है‒तुम बगैर इन्टरव्यू के एक प्राइवेट फर्म में इन्जीनियर लग जाओगे।”
“रीयली।”
“अब तुम समझो न समझो…मैं तो तुम्हें अपना हसबैंड मानती हूं…तुम मेरे प्रति अपना कोई कर्तव्य समझो या न समझो…मैं तो अपना कर्तव्य निभाती रहूंगी।”
“जाने दे जाने दे…ज्यास्ती नाटक नहीं करने का।”
“तुम्हें कम से कम मेरी एक बात तो माननी पड़ेगी।”
“साली ‘बैडरूम’ वाली बात के सिवा हर बात मानूंगा।”
“तुम क्या सोचते हो…मैं हर समय बैडरूम के बारे में सोचती रहती हूं।” अब की देवयानी ने झुंझला कर कहा।
“अच्छा-अच्छा…बोल-बोल…क्या मानने का है?”
“भले ही तुम खोली और बस्ती के वासी हो, मगर तुम एक पढ़े-लिखे नौजवान हो…तुम्हें और ऊपर उठना है…अब तुम अपनी जबान ठीक करो…ऐसे मवालियों की तरह ‘बम्बइया’ बात करने वाले इन्जीनियर नहीं बनते।”
“अपन कोशिश करेंगा।”
“अपन कोशिश करेंगा नहीं…मैं कोशिश करूंगा।”
“अच्छा…मैं…कोशिश करूंगा। आई विल ट्राई माई बेस्ट।” विवेक मुस्करा कर बोला।
“हां…यह हुई न बात।”
“इतने में कॉलेज आ गया और कार पार्किंग में रुक गई…दोनों अपनी-अपनी क्लासों की ओर बढ़ गए।
विवेक ने ‘नोटिस बोर्ड’ पर अपना नाम देखा…वह परीक्षा में फर्स्ट क्लास फर्स्ट रहा था…जल्दी-जल्दी वह भीड़ से निकला और खुशी भरी आवाज में स्वयं बोला‒”हुर्रें…अपन पास हो गएला।” फिर खुशी से दौड़ता हुआ फाटक और पार्किंग के फाटक पर पहुंच कर उसने चौकीदार से पूछा‒
“देवयानी नहीं आएली?”
“अभी नहीं साहब, मुबारक हो आप पास हो गए।”
“साला! अपन मेहनत किएला है तो पास काहे को नहीं होएगा।”
आज इस समय उसमें कुछ अनियंत्रित जोश-सा आ गया था…उसने कार के हैंडल पर ऐसा झटका मारा कि ‘हैंडल टूट कर हाथ में आ गया। चौकीदार ने घबरा कर कहा‒
“साहब! यह आपने क्या किया मेम साहब नाराज होंगी।”
“वह अपन का वाइफ है…कैसे नाराज होएगा।” फिर उसने शीशे पर जोर लगाया तो शीशा नीचे सरक गया…अंदर हाथ डालकर ‘लॉक’ खोला…अगली सीट पर बैठकर लॉक खोला और मोबाइल निकाला…नम्बर मिला कर मोबाइल कान में लगा लिया…कुछ देर बाद आवाज आई‒”हैलो!”
“ट्राई मारो कौन बोल रहा है?”
“ओह! विवेक…तुम हो?”
“यार कितने दिन बाद अपन तुम्हारी आवाज सुनेली है।”
“तुम्हारे रिजल्ट का क्या हुआ?”
“होना क्या था…साला हमारा रिजल्ट है…पास होने ही का था।”
“थैंक्स गॉड! मैं तुम्हारे लिए बड़ी चिन्तित थी।”
“रीयली?”
“देवयानी बता रही थी…उसने अपनी मम्मी से कहकर तुम्हारे लिए जॉब फिक्स करवा ली है।”
“अपन को भी बताएली…पर तुमको अपन का फिकर काहे को है?”
“तुमने सबसे पहले…मुझे क्यों फोन किया?”
“अबे तुमको क्या मालूम कि अपन पहले तुम्हारे ही को खबर किया?”
“तुम कार में बैठे हो…कार पार्किंग में है….स्टूडेन्टों का शोर सुनाई दे रहा है…सही है न।”
“साली…क्या तेरे को फोन पर भी नजर आता है?”
“मैं समझ सकती हूं…अंदाजा लगा सकती हूं…तुम मोबाइल से बोल रहे हो…मोबाइल देवयानी की कार के डैशबोर्ड में रखा रहता है और इस समय वह तुम्हारे साथ नहीं।
“साली तू इस तरह कॉमेन्ट्री बोलेला है जैसे क्रिकेट मैच चल रहा हो।”
“मुझे तुम्हारे रिजल्ट की इसलिए चिन्ता थी कि अब तुम मांजी को आराम कराओ…उन्होंने तुम्हारे लिए बहुत मेहनत की है।”
“साली! यही तो अपने जीवन का सपना है…अपन नौकरी मिल जाने पर यह खोली बड़ी कराएंगा, सजवाएंगा…फ्लश सिस्टम बनवाएंगा…शानदार बाथरूम।”
“क्या बकवास कर रहे हो…इंजीनियर बनकर भी तुम खोली में रहोगे…तुम्हें कम्पनी की ओर से बंगला मिलेगा।”
“देखेंगा पर, अपन को बस्ती से प्यार है…उधर का लोग अपन को प्यार करेला है;..वह खोली अपन को मां की माफक रखेला है।”
“विवेक! तुम्हारे विचार बहुत अच्छे हैं…इंजीनियर बनकर तुम कम खर्चे में खोलियों के हुलिये बदल सकते हो।”
“ठीक है…ठीक है…अपन सोचेंगा। तू बोल महेश जिन्दा है या मर गएला?”
“विवेक…वह तुम्हारा दोस्त है…डॉक्टर हैमरसन को दो एमरजेन्सी ऑपरेशन करने के लिए इंग्लैंड और फ्रांस जाना पड़ा।”
“यह साले ‘फॉरेन’ वाले भी बीमार पड़ते हैं…खैर जाने दो…कब होएगा महेश का ऑपरेशन, कब मरेंगा वह?”
“अगले महीने की ‘डेट’ मिली है।”
“एक महीना और…अरे साला…लानत है अपन पर भी ओह! शायद ट्रंक कॉल आया‒ठहरो।” अंजू ने कहा और डिसक्नेक्ट हो गया।
इतने में दूसरी ओर का दरवाजा खुला और देवयानी अंदर बैठती हुई बोली‒”लगा दी तोड़-फोड़ तुमने?”
“अरे साली…काहे को लॉक करके गएली थी?”
“कांग्रेचुलेशन…तुम पास हो गए!”
“तेरा क्या हुआ?”
“मैं फेल हो गई।”
“बहुत-बहुत बधाई…साली तेरे को एक साल और कॉलेज में लटकने का है।”
“देवयानी कार को रिवर्स में लेती हुई हंस पड़ी।”
“काहे को हंसी?”
“क्या मैं एक बरस जिन्दा रहूंगी?”
“ओह…साला अपन भूल गएला था…तेरे को तो मरने का है।” कार सड़क पर आ गई थी..विवेक ने कहा‒”तेरे को फेल होने का ही था तो काहे को स्टडी की, एग्जाम दिया?”
“जब तक जिन्दा हूं किसी तरह तो टाइम गुजारना ही है।”
“तू मरने के वास्ते टाइम गुजारेली है…उधर साला महेश मरने का नाम ही नहीं लेता, जिन्दा रहने पर तुल गएला है।”
“किसी के लिए ऐसा क्यों सोचते हो? क्या तुम भगवान को नहीं मानते? उस पर भरोसा नहीं करते?”
“मानता हूं…सैन्ट परसेन्ट।”
“उसने जिसके लिए जो समय निश्चित किया है उससे पहले वह नहीं मर सकता‒महेश को अगर छः महीने के अन्दर मरना है तो वह उस समय के अंतिम क्षण तक जी सकता है।”
“करेक्ट।”
“अब तुम अपनी मां और बस्ती वालों के लिए मिठाई खरीदो…इतनी अच्छी पोजीशन लेकर पास जो हुए हो।”
देवयानी ने एक ‘स्वीट शॉप’ के सामने कार रोक दी।
बस्ती के बाहर कार रुकते ही विवेक बिल्कुल बच्चों की तरह उछलता हुआ खोली की ओर दौड़ा।
“अपन पास हो गएला…अपन इन्जीनियर बनएला मां…मां…तुम्हारा आशीर्वाद पूरा हुआ।”
बस्ती के बच्चे खुशी से चीख पड़े‒लेकिन किसी बड़े ने उसका साथ नहीं दिया।
विवेक एकदम रुक गया जैसे ब्रेक लग गए हों-फिर उसने खोली के बाहर इकट्ठे हुए लोगों को देखा और बोला‒
“अपन के पास होने की आप लोगों को खुशी नहीं हुई…बस्ती का एकइच आदमी इन्जीनियर बनेला।”
फिर भी लोग चुप रहे…वह सामने खड़े बच्चों को इधर-उधर धकेलता आगे बढ़ा…दरवाजे के पास आकर कदम ठिठक गए…उसके दिमाग पर जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो…वह धीरे से बड़बड़ाया-
“मां!”
फिर एकदम जोर से चिल्लाया‒”मां!” उसके दिल पर और भी प्रबल धक्का लगा…मां खाट पर बेसुध पड़ी थी और एक डॉक्टर उस पर झुका चैक कर रहा था।
“शिश…!” डॉक्टर ने कहा‒”इन्हें नींद का इंजेक्शन दिया गया है।”

“पर अपन की मां को क्या हो गयाला है डॉक्टर साहब?”
“बाहर आओ।” डॉक्टर बैग बंद करता हुआ बोला‒”और खोली के आगे से भीड़ हटा दो‒ताजा हवा अन्दर आए।”
देवयानी वहां पहुंच चुकी थी…वह लोगों को हटाने लगी…विवेक ने डॉक्टर का बैग पकड़ लिया और साथ चलता हुआ बोला‒
“डॉक्टर साहब! आप बताएले काहे को नहीं।”
“वह तुम्हारी मां है न।”
“जी हां।”
“विधवा हैं और तुम उनके इकलौते बेटे हो।”
“जी हां”
“क्या करते थे तुम? तुम्हारी मां ने इतनी मेहनत की है कि कोल्हू का बैल भी नहीं करेगा…अपने फेफड़े गला लिए हैं।”
“नहीं….।”
“उन्हें टी.बी. है…क्षय रोग।”
“नहीं…।” विवेक को लगा जैसे उसके सिर पर पहाड़ गिर पड़ा हो।
डॉक्टर अपनी कार तक पहुंच गया था। ड्राइवर ने दरवाजा खोला….विवेक ने बेचैनी से कहा‒”अपन की मां बच तो जाएंगी।”
“अगर उचित देखभाल, पूरा इलाज और शुद्ध जलवायु मिली तो।”
“अपन सब कुछ कराएंगा डॉक्टर साहब।”
“तो सबसे पहले इन्हें इस गंदी खोली से निकालो। याद रखो…अगर वह यहां की घुटन में रहेंगी तो उनकी उमर चौथाई भी नहीं रहेगी।”
“नहीं…नहीं…नहीं…यह नहीं होने को सकता।”
“टी.बी. पहले ला-इलाज बीमारी थी, लेकिन अब ऐसी कोई बात नहीं, हां…सही इलाज…अच्छी खुराक और साफ-सुथरा वातावरण मिले और साथ ही आराम भी तो ठीक हो जाएंगी।”
डॉक्टर ने अपना कार्ड दिया और बोला‒”मैं सरकारी हस्पताल में हूं…मेरे पास आना…मैं पूरा ट्रीटमेंट लिखकर दे दूंगा…मगर इनको यहां से हटाना बहुत जरूरी है।”
फिर वह कार में बैठ गया और कार चल पड़ी।
“प्लीज-डॉक्टर साहब आपकी फीस।” अचानक बाहर आने पर विवेक बोला।
तभी किसी ने पीछे से विवेक के कंधे पर हाथ रखा तो एक बूढ़ा खड़ा कह रहा था‒
“फीस पहले ही दे दी गई है।”
“मगर…चाचा…।”
“रीमा देवी तुम्हारी मां है तो अपन लोग की भी कुछ है‒इधर कई लोगों ने मिलकर डॉक्टर को बुलाया था…सबने मिलकर फीस दे दी है।”
“चाचा…अपन को माफ कर दो…अपन साला एक नम्बर का घोंचू है…अपन तू लोगों को गलत समझेला था।”
“जाओ…मां के पास जाने का है….उनकी देखभाल तुम्हारा सबसे बड़ा फर्ज है।”
विवेक आंसू पोंछता हुआ खोली में आया…देवयानी रीमा देवी के पास बैठी थी…विवेक भी बैठ गया…उसने मां का माथा चूमा और रुंधे गले से कहा‒
“तेरे को कुछ हो गएला तो अपन इस दुनिया को आग लगा देंगा…साली वह ‘डिग्री’ फाड़ कर फेंक देंगा जिसको मेरे लिए खरीदने के लिए तूने अपनी सेहत बेच दी।”
“विवेक धीरज से काम लो।” देवयानी ने सांत्वना दी।

“अरे देवयानी…अपन पास हो गएला पर…अभी मां का इलाज-अच्छी आबो हवा, अच्छी डाइट…तू ऐसा कर, आज ही से उधर नौकरी पर लगवा दे…एक महीने की पगार एडवांस में दिलवा दे…अपन पर तूने बहुत उपकार कियेला है…पर यह उपकार अपन कभी नहीं भूलेगा।”
देवयानी ने विवेक का हाथ पकड़ लिया और बोली‒
“विवेक! क्या मां के प्रति मेरा कोई कर्तव्य नहीं है?”
“अबे हट…तू अपन की पत्नी कहां है?”
“दोस्त तो हूं…तुम मेरे जीने तक मुझे अपनी पत्नी मानो या न मानो…मगर मां की नजरों में…धर्म-समाज की नजरों में मैं तुम्हारी पत्नी ही हूं…तुम एक जिद्दी, ढीठ और घटिया आदमी हो।”
“क्या बोला?”
“ठीक बोला?”
“ठीक बोला…तुम अपनी मां से नहीं…अपने अहम से प्यार करते हो।”
“साली…अब बोलेगी तो अपन गला दबा देंगा।”
“दबा दो…मर जाऊंगी तो तुम्हारा सपना पूरा हो जाएगा…मेरे और तुम्हारे बीच का रिश्ता भी टूट जाएगा।”
“देवयानी! तेरे को अपन को नौकरी दिवालाने का है या नहीं?”
“दिलवाऊंगी-मगर एक शर्त पर।”
“अरे बोल‒आज तेरी हर शर्त मानने को तैयार है…अपन ‘बैडरूम पार्टनर’ के लिए भी।”
“सचमुच बहुत घटिया आदमी हो तुम…मैं स्वार्थी नहीं हूं…तुम्हारे साथ रहकर तो मेरी जिन्दगी बदल गई…मैं एक आवारा, बदलचन लड़की थी…तुम्हारे चरित्र ने मुझे सुधार दिया और तुम…।”
“कम टू द प्वाइंट अपन को नौकरी मंगता।”
“कल से ही मिल जाएगी…मगर अभी मांजी को लेकर मेरे साथ कार में मेरे बंगले पर चलना पड़ेगा।”
“क्या?”
“जल्दी बोलो-शर्त मंजूर है या नहीं।”
“मंजूर है…पर तेरी मम्मी…।”
“वह एक डिप्टी मंत्री के साथ एक महीने के टूर पर फॉरेन गई हुई हैं…हो सकता है अधिक समय भी लग जाए-तब तक तुम आराम से रह सकते हो। मैं तुम्हें कल ही नौकरी दिलवा दूंगी…अगर इन्जीनियर का बंगला खाली हुआ तो वह मिल जाएगा।”
“चल अपन तैयार है।”
“मैं बस्ती वालों से बात करती हूं…तुम मांजी को उठाकर कार की तरफ लेकर आओ।”
विवेक ने मां को उठा लिया…देवयानी बाहर निकल आई। विवेक जैसे ही बाहर निकला, पीछे एक पुलिस जीप आकर रुक गई और विवेक ठिठक गया।
इतने में देवयानी आ गई…वह भी ठिठक गई। उसने कार का दरवाजा खोला और विवेक ने पिछली सीट पर धीरे से मां को लिटा दिया।
एक सब-इन्स्पेक्टर ने पास आकर कहा-”इस बस्ती में क्या विवेक नाम का कोई आदमी रहता है?”
“अपन है…बोलो।” विवेक ने पूछा।
“तुम्हें डी.एस.पी. साहब ने बुलाया है।”
“किस वास्ते?”
“वहीं चलकर पूछ लेना।”
“अपने डी.एस.पी. को बोलने का, इधर अपन का मां का तबियत खराब है…अपन के पास इसका टैम नहीं है।”
“विवेक!” देवयानी ने कहा‒”मैं मांजी को लेकर बंगले चल रही हूं…तुम पुलिस स्टेशन होकर आ जाना।”
“अरे…अपन कोई चोर-डकैत है कि वारंट आ गएला।”
“कोई बात हो मुझे फोन कर लेना…मां के साथ मैं हूं… फिर तुम्हें क्या चिन्ता है।”
“ओ.के….अपन जाएला।”
फिर वह जीप में सवार हो गया और देवयानी कार में…दोनों गाड़ियां गली से बाहर निकलकर विपरीत दिशाओं में चली गईं।
