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गृहलक्ष्मी की कहानियां - गुलामी
Stories of Grihalakshmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां – ‘‘ गुलामी कहानी है एक ऐसी लड़की की जो सामाजिक परिवेश में हो रहे गलत रीति रिवाजों ओर परम्परा से व्यथित है लेकिन वह विद्रोह नहीं करती। अपने अंदर की मनोदशा से उसका द्वंद्व होता रहता है।

किताबें यू हीं कमरे में इधर-उधर पड़ी हैं। मां ने देखा तो पूछा, तू अभी तक सोई नहीं हैं। मैं रख दूं ताकि मनु और छोटी के काम आ जाएं।”
मां के हाथों में कपड़े और गहने देखकर अनु ने मां से पूछा, ये किसके लिए हैं मां।”
मां” तुम्हारे लिए।
अनु ” सारे मेरे लिए ” (आश्चर्य से)
मां (हॅंसकर) हां ये सारे तुम्हारे लिए है।”
अनु ” मां, सारे बहुत सुंदर हैं।”
मां, हां तेरी शादी के लिए रखी है मैंने, पसंद आई तुझे।
अनु (खुश होकर) ‘‘हां मां सब बहुत सुंदर है और मंहगे भी।”

मां पास बैठकर, ‘‘जानती है तू, जब मैं तुम्हें नए खिलौने और कपड़ों के लिए मना करती थी तो बहुत बुरा लगता था मुझे । लेकिन क्या करूं। वो पैसे इसी दिन के लिए तो बचा रही थी ताकि तेरी शादी अच्छे और पैसेवालों घर में कर सकूं। ताकि तुम्हें कभी किसी चीज की कमी न हो। पैसे होने से जिंदगी काफी आराम से कटती है। तुझे तो पता ही है कि आजकल लड़के वालों की मांग कितनी बढ़ गई है। गहने, गाड़ियां पैसे सभी चीजें मांगते हैं वे लोग।”
अनु ‘‘लेकिन मां खुशी का आधार सिर्फ पैसा ही तो नहीं होता क्या किसी को ज्यादा दहेज देकर और पैसे वाले घर में शादी कर देने से ही उनकी बेटी ज्यादा सुखी होगी, इसकी कोई गारंटी है? खुश रहने के लिए तो प्यार करनेवाला, इज्जत करनेवाला सच्चा और ईमानदार पति भी होना चाहिए ना।”
मां (डांटते हुए) ‘‘सभी तेरी तरह नहीं सोचते है फिर तो आजकल यही चलन है। जो सब करते हैं, वही हमने भी किया।
अनु! लेकिन मां…
मां अब तू ज्यादा सोच मत और सो जा नहीं तो फूलों सा चेहरा मुरझा जायेगा और कल से सारे मेहमान आने शुरू हो जाएंगे। फिर कहां आराम? बस दिन भर भाग दौड़ लगी रहेगी।”

अगले तीन दिनों में अनु की शादी है। अनु सोने की कोशिश करती है लेकिन नींद नहीं आ रही है। रह-रहकर पुरानी बातें याद आ रही है। जब मां बचपन में हमसे ज्यादा छोटे भाई मनीष को प्यार करती थी और हमें किसी भी चीज़ के लिए झट से मना कर देती तो काफी ईर्ष्या होती थी उससे। पापा से भी हमारे लिए उनका झगड़ा हो जाता था। क्योंकि पापा हमारा साथ देते और भाई को डांट पड़ती। पापा की आय इतनी थी कि घर ठीक-ठाक से चल जाता था। हमें लगता था मां हम दोनों बहनों से ज्यादा हमारे भाई से प्यार करती हैं। आज समझ आया कि वह तो हमारे लिए ही पैसे बचा रही थीं, जिससे हमारे लिए खुशियां खरीद सकें।

घर में मेहमानों का आना शुरू हो गया। बुआ-फूफा, मामा-मामी, चाचा-चाची, मौसा-मौसी ने मां से कहा, सुना है बड़े पैसेवाले हैं वे लोग दहेज भी काफी मांगा होगा उन लोगों ने। मां (गहरी सांस) लेते हुए ‘‘हां लड़का बड़ी कम्पनी में मैनेजर है। दस लाख में बड़ी मुश्किल से रिश्ता पक्का हुआ है वरना आजकल तो लड़के वालों के नखरे पूछो मत! बस अच्छी तरह से शादी निपट जाए।

शादी में पूरी व्यवस्था की गयी। पूरा घर फूलों से सजा। बहुत खूबसूरत लहंगा मां ने मेरी शादी के लिए बनवाया है। सब मेरे लंहगे की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। बारात आई, बहुत धूमधाम से मेरी शादी हुई। लड़के वालों को अपनी सामर्थ्य से ज्यादा दिया पापा ने। कोई कमी नहीं छोड़ी मेरी शादी में। ससुराल वालों में भी इसकी चर्चा थी। फिर भी विदाई के समय अजब सी बैचेनी थी मेरे अंदर। मन रह-रहकर घबरा रहा था। आखिरी बार अपने कमरे में गई तो आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे।

मां ने कहा, क्या हुआ! लड़का हीरा है और तुम्हारे ससुराल वाले वे सब तो बहुत अच्छे हैं। हमसे भी अच्छी तरह से ख्याल रखेंगे तुम्हारा। मैंने अलमारी खोली और शॉल निकालकर मां को दी मां ” अरे ये क्या कब खरीदी तुम और इतने पैसे कहां से आए तुम्हारे पास।

अनु ‘‘ मां आप जो पॉकेटमनी हमें खर्च के लिए देती थी उसी में से बचाए थे मैंने और सिर्फ ये शॉल ही नहीं है बल्कि छोटी के लिए झुमके मनु के लिए जूते और पापा के लिए पर्स भी खरीदा है मैंने।

मां ‘‘ अरे वाह! ते मुझे तुम्हें यह समझने की जरूरत नहीं है कि घर कैसे चलाते हैं क्योंकि अब तू वाकई बड़ी हो गयी है और जिम्मेदारियां उठाना भी सीख गई हैं।

अनु‘‘ हां मां तुम्हारी बेटी हूं। तुम्हीं से सीखा है बचत करना।
मां (खुश होकर) , ‘‘हमारे भरोसे को कभी मत तोड़ना।”
अनु , कभी नहीं मां।” (मां से गले मिलते हुए )

ससुराल वाकई बहुत पैसे वाला है। बड़ा-सा घर, गाड़ियां नौकर-चाकर सुख और आराम की सारी चीजें है घर में। ससुराल वाले ने भी खुले दिल से मेरा स्वागत किया पर सासू मां ने आते ही सुना दिया” तुम्हारी मां ने तुम्हें तो सब कुछ दिया लेकिन दामाद को देने में कंजूसी कर दी। मेरा बेटा ब्रांडेड कम्पनी के कपड़े और घड़ियां पहनता है, लेकिन उन्होंने तो सस्ते से ही काम चला लिया। खैर सासू मां इतना कहकर चली गईं। अमित देहरादून में बड़ी कम्पनी में मैनेजर हैं। छुट्टियां खत्म होते ही वे काम पर लौट गए और मैं भी उनके साथ ही देहरादून में रहने लगी। वे मेरा बहुत ख्याल रखते। मेरे लिए मंहगी साड़ियां- गहने लाते। मेरी हर जरूरत का ख्याल रखते। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था काफी खुश थे हम।

मां ठीक ही कहती थी, पैसा रहने से जिंदगी काफी आराम से कटती है। तीन-चार महीने में तो सब कुछ ठीक-ठाक रहा लेकिन धीरे-धीरे पता चला कि अमित बहुत गुस्से वाले हैं। छोटी-छोटी बात पर गुस्सा होना, चीखना-चिल्लाना आम सी बात थी। ये चीजें यहां क्यों रखी, कपड़े ठीक से इस्तरी नहीं हैं। खाने में ये क्यों नहीं बनाया हमेशा डांटते रहते। हां लेकिन दिन में कितना भी गुस्सा हो, रात को सारा गुस्सा छू हो जाता उनका। उनका गलत तरीके से मुझे छूना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता मुझे, फिर भी कभी मना नहीं कर पाई। हमेशा यही सोचा, पति है वे मेरे उनका मुझ पर पूरा हक है। मैं सिर्फ उनके लिए उपयोग की वस्तु बन कर रह गयी थी। ये सोच-सोचकर अंदर-ही-अंदर ही घुट रही थी मैं।

एक फाइल के लिए उस दिन क्या कुछ नहीं सुनाया उन्होंने मुझे। मैं कितनी देहाती और अनपढ़ लड़की हूं। मुझे लोगों के बीच उठना बैठना नहीं बोलता कुछ नहीं आता। मुझे कई चीजें इस्तेमाल करनी नहीं आती क्योंकि वे चीजें मेरे मायके में नहीं हैं। उनकी जीवन शैली उच्च स्तर की है और मैं बिल्कुल गवांर हूं। उस दिन इतना गुस्सा आया कि अब कुछ सुनाया तो कह दूंगी अब मैं आपकी गुलामी नहीं करूंगी। जिंदगी भर हम औरतें तो गुलाम ही बनी रहती हैं, अपनी इच्छाओं को मारकर जीते हैं हम। हमारी कौन सुनता है, दिल में इतनी आग लगी थी बस सब कुछ जलाकर ही बुझेगी ये आग।

शाम को वे घर आये। मैंने उससे बात तक नहीं की। उन्होंने खाना खाया और चुपचाप कमरे में सोने चले गए। मुझसे एक शब्द नहीं कहा। मैं कमरे में नहीं गयी और बाहर हॉल में ही बैठी रही उन्होंने भी अंदर कमरे में नहीं बुलाया। रात को बारह बजे में अंदर गयी तो कमरे की लाइट बंद थी। सामने मेज पर केक पर मोमबत्तियां जल रही थी और नीचे बैठकर कहा ‘‘हैप्पी बर्थ-डे जान। आई लव यू सो मच और सॉरी। मैंने सुबह तुम्हें कितना कुछ सुनाया। सच तो ये है कि काम का प्रेशर इतना है सारा गुस्सा तुम पर निकाल दिया। अब ऐसा नहीं होगा प्लीज अब गुस्सा छोड़ भी दो। कहो तो जिंदगी भर तुम्हारी गुलामी करूंगा।

इतना सुनते ही मेरे ऑखों से ऑसू बहने लगे। मैं इतने गुस्से में थी कि मुझे याद भी नहीं कि मेरा जन्मदिन है। और ये गुलामी नहीं ये तो प्यार है जिसमें लोग अपना अस्तित्व मिटाकर अपने प्यार के हो जाते हैं। प्यार में लोग फना हो जाते हैं ‘‘हॉ ये प्यार है गुलामी नहीं।”(अपने आप को तसल्ली देते हुए)

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