अचानक मेहता जी की आवाज़ धीमी हो गई। सभी एकसाथ नितिन की ओर देखने लगे। नितिन की पत्नी निशा हाथ में कुछ लिफ़ाफ़े लिए कुछ बोलना चाह रही थी। बड़े भाइयों ने झल्लाते हुए नितिन को बोला ” अरे यार ! क्या अजीब सा शौक और ज़िद पाल रखा है तुम्हारी बीवी ने? लिफाफों में कविताएं और कहानियां भर कर भेजते रहने से कोई महादेवी वर्मा या प्रेमचंद नहीं बन जाता। “

” आखिर तुम्हारे पापा की भी इज़्ज़त की बात है। जिस घर में खुद का प्रेस हो और वो दूसरी प्रेस से अपनी किताब छपवाने के लिए भीख मांग रहा है ।क्या इज़्ज़त रह जाएगी हमारी? ” मौका मिलते ही नितिन की मां ने भी सास होने का दबदबा दिखाना चाहा। 

” अरे निशा तुम्हें अपनी किताब छपवा कर सहेलियों के बीच अपनी इज़्ज़त ही तो बढ़ानी है न ! फिर अपनी प्रेस भी कोई खराब नहीं है। ” एक व्यंग्य भरी मुसकान के साथ जेठानी जी ने भी अपने दिल को सुकून दिलवाना चाहा।

निशा चुपचाप खड़ी होकर इज़्ज़त की परिभाषाएँ सुनती रही। एक नज़र नितिन को देखा फिर मुस्कुराकर अपने लिफाफों को लेकर बाहर की ओर चल दी। घर की खोखली इज़्ज़त की परवाह किए बिना शायद अपने आत्मसम्मान का ठौर ढूंढने।

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