रीति-अनुसार छानबीन और अर्थ जुटाकर दोनों बड़ी कन्याओं का विवाह हो गया, अब छोटी माता-पिता के नीरव हृदयभार-सी विराज रही है।

जो बोलती नहीं, वह अनुभव तो करती ही है‒ऐसा सबको नहीं लगता; इसलिए उसके सामने ही सब उसके भविष्य के बारे में दुश्चिन्ता प्रकट करते। विधाता के अभिशाप-रूप में उसने पिता के घर में आकर जन्म लिया है, यह बात उसने बचपन से ही समझ ली थी। उसका परिणाम यह हुआ कि वह हमेशा आम लोगों की दृष्टि से अपने को ओझल रखने की चेष्टा करती। उसे लगता, उसे सब भूल जाएँ तो जैसे उसकी जान बचे, पर वेदना क्या कोई कभी भूलता है? माता-पिता के मन में वह सर्वदा ही जागरूक थी।

विशेषतः उसकी माँ उसे अपनी एक त्रुटि स्वरूप मानती रहीं, क्योंकि माँ पुत्र की अपेक्षा कन्या को ही अपने अंश रूप में देखती है‒कन्या की कोई असंपूर्णता देखने पर वह जैसे विशेष रूप से अपनी लज्जा का ही कारण रूप मानतीं। बल्कि, कन्या के पिता वाणीकंठ सुभा को अपनी अन्य कन्याओं की अपेक्षा कुछ अधिक ही स्नेह करते थे। माता उसे अपनी कोख का कलंक मान उसके प्रति बहुत खिंची-खिंची रहतीं।

सुभा के पास वाणी नहीं थी, पर उसके पास सुदीर्घ पल्लव विशिष्ट बड़ी-बड़ी दो काली आँखें थीं‒एवं उसके ओष्ठाधर भाव के आभास मात्र से कोमल किसलय के समान काँप उठते।

हम बातों से जो भाव प्रकट करते हैं, वह हम लोगों को बहुत कुछ अपनी चेष्टा से गढ़ लेना पड़ता है, बहुत कुछ अनुवाद करने जैसा; हर घड़ी ठीक नहीं होता, क्षमता के अभाव में बहुत बार भूलें भी होती हैं। किन्तु, काली आँखों को कोई अनुवाद नहीं करना होता‒मन अपने आप ही उसके ऊपर छाया डालता है, भाव स्वयं ही उस पर कभी प्रसारित कभी मुद्रित होते हैं; कभी उज्जवल भाव से प्रज्ज्वलित हो उठते हैं, कभी म्लानभाव से बुझ आते हैं, कभी अस्तमान चंद्र के समान अनिमेष रूप से ताकते रहते हैं, कभी द्रुत चंचल बिजली के समान दिशा-दिशा में विकीर्ण हो पड़ते हैं। मुख के भाव के अतिरिक्त आजन्म जिसके पास दूसरी भाषा नहीं, उसकी आँखों की भाषा असीम उदार और अतलस्पर्शी गहरी‒बहुत कुछ स्वच्छ आकाश के समान उदयास्त और छायालोक की निस्तब्ध रंगभूमि-सी। इस वाक्यहीन मानव में वृहत् प्रकृति के समान एक विजन महत्त्व है। इसलिए सामान्य बालक-बालिकाएँ उससे एक प्रकार का डर मानते, उसके साथ खेलते नहीं। वह निर्जन दुपहरी की तरह ख़ामोश और निःसंग थी।

गांव का नाम चंडीपुर था। पास बहनेवाली नदी बंगाल की एक छोटी-सी नदी थी। गृहस्थघर की बालिका के समान बहुत दूर तक उसका प्रसार नहीं; निरलसा तन्वी नदी अपने तट की रक्षा करती बहती चली जाती है; दोनों किनारे के गाँव में से सभी के साथ उसका जैसे कोई-न-कोई एक नाता है। दोनों किनारे लोकालय और तरुच्छाया-घन उच्चतट; निम्न तल से ग्राम-लक्ष्मी स्रोतस्विनी आत्मस्मिृत द्रुत पदक्षेप से प्रफुल्ल हृदय अपने असंख्य कल्याण कार्यों में डूब चली जा रही है।

वाणीकंठ का घर बिलकुल नदी के किनारे ही था। उसका बाँस की खपचियों का बेड़ा, फूस के अठपहलू छप्परवाला घर, गोष्ठ, ढेंकी1 घर, भूसे की टार, इमली, आम, कटहल और केले का बाग नाव पर सवार किसी की भी दृष्टि आकर्षित कर लेता। इस गार्हस्थ्य संपन्नता के बीच गूंगी लड़की पर किसी की नज़र पड़ती या नहीं मालूम नहीं, लेकिन काम-काज से जब भी वह अवसर पाती, तभी इस नदी तीर पर आ बैठती।

प्रकृति जैसे उसकी भाषा का अभाव पूरा कर देती है। जैसे उसकी ओर से बोलती हो। नदी की कल ध्वनि, मनुष्यों का कोलाहल, मल्लाहों का गान, पक्षियों का कलरव, तरुओं की मर्मर ध्वनि सब कुछ मिलकर चारों ओर का चलना-फिरना‒आंदोलन‒कंपन के साथ एक होकर समुद्र की तरंग राशि के समान बालिका के चिर निस्तब्ध हृदय-उपकूल के पास आकर पछाड़ खा-खा गिरती। प्रकृति के वे अलग-अलग स्वर और विचित्र गति यह भी गूंगे की भाषा है‒बड़े-बड़े नयन पल्लव विशिष्ट सुभा की जो भाषा है, उसी का एक विश्वव्यापी विस्तार; झिल्लीरवपूर्ण तृणभूमि से शब्दातीत नक्षत्रलोक तक केवल इंगित, संकेत, संगीत, क्रंदन एवं दीर्घनिश्वास।

और मध्याह्न में जब मल्लाह-मछुवारे भोजन को जाते, गृहस्थ सोते, पक्षी नहीं बोलते, सवारी-नौकाएँ किनारे बँधी रहतीं, जनपूर्ण जगत्, सब काम-काज के बीच सहसा रुककर भयानक विजनमूर्ति धारण करता, तब रुद्र-महाकाश के तले केवल एक प्रकृति और एक गूंगी बालिका आमने-सामने गुमसुम बैठ रहतीं, एक दूर-दूर तक फैली धूप में; और दूसरी लघु तरु-छाया में। ऐसी बात नहीं कि सुभा की मित्रमंडली में दो-चार अंतरंग सखाएँ न थीं। गोष्ठ की दो गाएँ थीं‒जिनका नाम था सर्वशी और पांगुलि। ये नाम बालिका के मुख से उन्होंने कभी सुने नहीं, किन्तु वे उसकी पग-ध्वनि पहचानती थीं‒उसमें एक वाणीहीन करुण सुर था, जिसका मर्म भाषा की अपेक्षा कहीं सहजता से समझतीं। सुभा कभी उनको लाड़-प्यार करती, कभी डाँटती, कभी अनुनय करती, इसे मनुष्य की अपेक्षा वे अच्छी तरह समझ पातीं।

सुभा गोष्ठ में प्रवेश कर दोनों बाहुओं द्वारा सर्वशी के गले से लिपट जाती उसके कान के पास अपने गंडस्थल को घिसती और पांगलि स्निग्ध दृष्टि से उसका निरीक्षण करती हुई उसके शरीर को चाटती। बालिका दिन-भर में नियमित रूप से तीन बार गोष्ठ में जाती, इसके अतिरिक्त अनियमित तौर पर भी आना-जाना लगा रहता था, घर में जिस दिन कोई फटकार सुनती, उस दिन वह असमय ही अपने दोनों मूक मित्रों के पास आती। उसकी सहिष्णुता-परिपूर्ण विषाद शांत दृष्टि में वे पता नहीं कैसे एक अंध-अनुमान शक्ति द्वारा बालिका की मर्मवेदना को जैसे समझ पातीं और सुभा के शरीर से लगकर धीरे-धीरे उसकी बाँह से सींग घिसते-घिसते उसे मूक व्याकुलता के साथ सांत्वना देने की चेष्टा करतीं।

इनके अलावा वहाँ बकरी और बिल्ली के बच्चे भी थे, पर उनके साथ सुभा की इस प्रकार की बराबरी की-सी मैत्री न थी, तो भी वे यथेष्टआनुगत्य दिखाते। बिल्ली का बच्चा रात-दिन जब ब सुभा की गरम गोदी पर निःसंकोच अधिकार जमाकर सुख-निद्रा का आयोजन करता और सुभा के उसकी गर्दन और पीठ पर कोमल उँगली फेरने पर उसे नींद को बुलाने में विशेष सहायता मिलेगी, इस अभिप्राय को वह संकेत से बता देता।

उन्नत श्रेणी के जीवों में सुभा को और एक साथी मिल गया था। किन्तु उसके साथ बालिका का ठीक कैसा संबंध था‒इसका निर्णय करना कठिन था। इसका कारण यह था कि वह भाषा विशिष्ट जीव था‒इसलिए दोनों के बीच भी भाषा-समभाषा नहीं थी।

यह था गोसाइयों का छोटा लड़का‒नाम था प्रताप। वह बिलकुल निकम्मा था। कोई काम-काज करके गृहस्थी जमाने की चेष्टा करेगा, लेकिन अनेक कोशिशों के बाद माँ-बाप ने यह आशा भी त्याग दी थी। निकम्मे लोगों की एक सुविधा यह है कि आत्मीय परिजन उनसे नाराज़ ज़रूर रहते हैं, लेकिन अकसर वे बिना संबंधवाले लोगों के प्रियपात्र होते हैं क्योंकि किसी काम में न बँधे रहने के कारण वे सरकारी धन जैसे बन जाते हैं। शहर में जैसे गृह एकाध गृह संपर्कहीन सरकारी बग़ीचे का रहना आवश्यक है, वैसे ही गाँव में दो-चार निकम्मे सरकारी लोगों का रहना निहायत ज़रूरी है। काम-काज में, आनंद-अवसर में जहाँ एक आदमी कम हो जाए, वहीं वे निकट सुलभ हो जाते हैं।

प्रताप का ख़ास शौक़ था बंसी से मछली पकड़ना। इसमें बहुत-सा समय सहज ही कट जाता है। अपराह्न में नदी के किनारे वह अकसर इस काम में लगा दीखता और इसी बहाने सुभा के साथ उसकी अकसर मुलाक़ात होती। चाहे जिस किसी काम में लगा रहे, एक साथी के होने पर प्रताप को अच्छा लगता। मछली पकड़ते समय गूँगा साथी ही सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ होता है। इसलिए प्रताप सुभा का मूल्य समझता। इसलिए सभी सुभा को ‘सुभा’ कहते, प्रताप आगे थोड़ी-सी स्नेह की चाशनी डालकर सुभा को ‘सु’ कहकर बुलाता।

सुभा इमली के पेड़ तले बैठी रहती और प्रताप कुछ ही दूर ज़मीन पर बैठ बंसी पानी में फेंक उसी ओर ताकता रहता। प्रताप का प्रतिदिन एक पान का बीड़ा बँधा था, जो सुभा स्वयं अपने हाथों लगाकर लाती। और शायद बहुत देर बैठे-बैठे देखते-देखते इच्छा करती, प्रताप की कोई एक ख़ास सहायता करने की, किसी काम में लगने की, किसी तरह बता देती कि इस धरती पर वह भी कोई कम प्रयोजनीय व्यक्ति नहीं। किन्तु वहाँ कुछ भी करने को नहीं था। तब वह मन-ही-मन विधाता के पास अलौकिक क्षमता की प्रार्थना करती‒मंत्र बल से सहसा ऐसी एक आश्चर्यजनक घटना घटित करने की इच्छा करती, जिसे देखकर प्रताप आश्चर्य में पड़ जाए और कहे, “अच्छा, तो हमारी सुभी में इतनी क्षमता है, यह तो मैं नहीं जानता था।”

मान लो, सुभा यदि जलकन्या होती, धीरे-धीरे जल से बाहर आकर एक सर्प की मणि घाट पर रख जाती, प्रताप अपना तुच्छ मछली पकड़ना छोड़ उस मणि को लेने जल में डुबकी लगाता और पाताल में जाकर देखता, चाँदी की अट्टालिका में सोने के पलंग पर कौन बैठा है? हमारे वाणीकंठ के घर की वही गूँगी लड़की ‘सु’-उस मणिदीप्त गहरी निस्तब्ध पातालपुरी की एकमात्र राजकन्या हमारी ‘सु’ यह क्या नहीं हो सकता? यह बात क्या इतनी ही असंभव है? असल में कुछ भी असंभव नहीं, किन्तु फिर भी सु प्रजाविहीन पाताल के राजवंश में न जन्म ले वाणीकंठ के घर में आकर जन्मी है और गोसाइयों के लड़के प्रताप को किसी तरह से आश्चर्य में नहीं डाल पा रही है।

सुभा की उम्र धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। धीरे-धीरे वह जैसे अपने में ख़ुद ही अनुभव करती, जैसे किसी एक पूर्णिमा तिथि में किसी एक समुद्र से एक ज्वार का स्रोत आकर उसकी अंतरात्मा को एक नूतन अनिर्वचनीय चेतना-शक्ति से परिपूर्ण कर देता है। वह अपने को स्वयं ही देख रही है, सोच रही है, प्रश्न कर रही है और समझ नहीं पा रही है।

गहरी पूर्णिमा रात्रि में वह कभी-कभी धीरे से शयनकक्ष का द्वार खोलकर डरते हुए अपना मुँह निकाल बाहर की ओर ताकती, पूर्णिमा‒प्रकृति भी सुभा के समान एकाकिनी सुप्त जगत् के ऊपर जगी बैठी‒यौवन के रहस्य में, पुलक में, विषाद में, असीम निर्जनता की एकदम शेष सीमा तक, यहाँ तक कि वह अतिक्रम कर स्तब्ध हो, एक शब्द तक नहीं बोल पा रही है। इस निस्तब्ध व्याकुल प्रकृति के प्रांत में एक निस्तब्ध व्याकुल बालिका खड़ी है।

इधर कन्याभार ग्रस्त माता-पिता चिन्तित हो उठे हैं। लोगों ने भी निन्दा शुरू कर दी है। यहाँ तक कि, जात से बाहर कर देंगे, ऐसी भी अफ़वाह सुनने में आ रही है। वाणीकंठ की संपन्न अवस्था थी, दोनों जून ही मछली-भात खाते, इसलिए उनके शत्रु हो गए थे।

पति-पत्नी में काफ़ी सलाह-मशविरा हुआ। कुछ दिनों के लिए वाणी बाहर गए।

अंत में लौटकर बोले, “चलो, कलकत्ता चलें।”

परदेस की यात्रा की तैयारी होने लगी। कोहरे से ढँके प्रभात के समान सुभा का संपूर्ण हृदय अश्रुवाष्प से एकदम भर उठा। एक अनिर्दिष्ट आशंकावश वह कुछ दिनों से लगातार निर्वाक् जानवर के समान अपने माँ-बाप के संग-संग फिरती बड़ी-बड़ी आँखें फैलाए उनके मुँह की ओर ताकते हुए क्या कुछ समझने की चेष्टा करती, पर वे कुछ भी समझाकर नहीं कह पाते।

इसी बीच एक दिन अपराह्न में पानी में बंसी फेंक प्रताप हँसकर बोला, “क्यों री सुभा, सुना है तेरे लिए एक दूल्हा मिल गया है, तू शादी करने जा रही है? देखना हम लोगों को भूलना नहीं।”

कहकर फिर मछली फाँसने में डूब गया। आहत हरिणी व्याध की ओर जैसे ताकती है, मौन भाव से कहती है, ‘मैंने तुम्हारा क्या अपराध किया’, सुभा ने कुछ इसी तरह प्रताप की ओर देखा। उस दिन पेड़ के नीचे फिर न बैठी। वाणीकंठ निद्रा से उठकर शयनकक्ष में तंबाकू पी रहे थे, सुभा उनके पैरों के पास बैठकर उनके मुख की ओर ताकती हुई रोने लगी। अंत में उसे सांत्वना देते हुए वाणीकंठ के शुष्क कपोलों पर अश्रु ढुलक पड़े।

कल कलकत्ते जाने का दिन निश्चित हुआ है। सुभा गोष्ठी में अपनी बाल सखियों से विदा लेने गई, उनको अपने हाथों से खिला, गले से लिपट एक बार दोनों आँखों से जितना संभव बातें कर उनकी मुँह की ओर देखा‒दोनों नेत्र-पल्लवों से टप-टप आँसू गिरने लगे।

उस दिन शुक्ल द्वादशी की रात थी। सुभा शयनकक्ष से बाहर हो अपने उस चिर-परिचित नदी-तट के कोमल घास की शय्या पर लोट पड़ी‒मानो धरित्री को, इस प्रकांड मूक मानव माता को, दोनों बाँहों की जकड़ में पकड़कर कहना चाहती हो, “माँ, तुम मुझे जाने न देना। मेरे समान अपनी दोनों बाँहों को बढ़ाकर तुम भी मुझे थामे रखो।”

कलकत्तेवाले डेरे में, सुभा की माँ ने एक दिन सुभा को ख़ूब सजाया। कसकर बाल बाँधे, जूड़े में ज़री का फीता लपेटा और अलंकारों से ढँककर उसके स्वाभाविक सौन्दर्य को यथाशक्ति विलुप्त कर दिया। सुभा की आँखों से अश्रु झर रहे हैं, आँखें सूजकर कहीं भद्दी न दीखें, इस कारण उसकी माँ ने उसे बहुत फटकारा, लेकिन अश्रुजल ने फटकार नहीं मानी।

मित्र के साथ वर स्वयं लड़की देखने आए‒कन्या के माता-पिता चिन्तित, शंकित, अत्यंत अधीर हो उठे; जैसे देवता स्वयं बलि पशु को चुनने के लिए आए हों। माँ ने आड़ से बहुत गर्जन-तर्जन और शासन द्वारा बालिका के अश्रु-स्रोत का द्विगुणित कर परीक्षक के सामने भेजा। परीक्षक ने काफ़ी देर निरीक्षण के बाद कहा, “ठीक ही है।”

विशेषतः बालिका के क्रंदन को देखकर समझा, इसके पास हृदय है और हिसाब लगाकर देखा, “जो हृदय आज माँ-बाप की विच्छेद संभावना से व्यथित हो उठा है, वही हृदय आज छोड़ कल मेरे ही काम आएगा।” सीप के मोती के समान बालिका के अश्रुजल ने बालिका का मूल्य ही बढ़ा दिया, उसकी ओर से और कुछ कहा नहीं।

पंचांग मिलाकर श्रेष्ठ शुभ लग्न में विवाह हो गया।

गूँगी कन्या को दूसरे के हाथों सौंपकर माता-पिता घर लौट गए, उनकी जाति और परलोक की रक्षा हुई।

वर पश्चिम की तरफ़ नौकरी करता था। विवाह के बाद ही पत्नी को लेकर उधर चला गया।

एक सप्ताह के अंदर ही सब समझ गए, नई दुल्हन गूँगी है। यह किसी ने नहीं समझा कि यह उसका दोष नहीं। उसने किसी को भी ठगा नहीं। उसकी दोनों आँखों ने सब कुछ बता दिया था, पर कोई उसे समझ नहीं सका। वह चारों ओर ताकती-भाषा नहीं पाती‒जो गूँगे की भाषा समझते, वे आजन्म परिचित चेहरे देखने को नहीं मिलते‒बालिका के चिर नीरव हृदय में एक असीम अव्यक्त क्रंदन ध्वनित होता रहता‒अंतर्यामी को छोड़ दूसरा कोई उसे सुन नहीं पाता।

इस बार उसके पति आँख-कानों की परीक्षा करके भाषा विशिष्ट एक कन्या को ब्याह लाए।

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