अब निरुपमा के विवाह की बातचीत चल रही है। उसके पिता रामसुंदर मित्र ने बड़ी खोज की, लेकिन मनपसंद वर कैसे भी नहीं मिला। अंत में एक बड़े रायबहादुर के घर के इकलौते लड़के को खोज निकाला। उक्त रायबहादुर के पैतृक ज़मीन-जायदाद बहुत कम रह गई है, पर घर तो ख़ानदानी ही था न।

वर-पक्ष ने दहेज में दस हज़ार की रक़म और अनेक प्रकार की दान-सामग्री की माँग की। रामसुंदर बिना सोचे-विचारे ही राज़ी हो गए; ऐसे पात्र को कैसे भी छोड़ा नहीं जा सकता।

कैसे भी रुपयों की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। गिरवी रखकर, बेचकर, बहुत कोशिशों के बावजूद भी छह-सात हज़ार रुपए बाक़ी रह ही गए। इधर विवाह का दिन क़रीब आता जा रहा है।

आख़िरकार विवाह के दिन आ ही पहुँचा। एक आदमी अधिक ब्याज़ पर बाक़ी रुपए उधार देने को तैयार हो गया, लेकिन ऐन मौक़े पर वह भी ग़ैर-हाज़िर रहा। विवाह-मंडप में भारी हलचल मच गई। रामसुंदर ने हमारे रायबहादुर से हाथ-पैर जोड़कर कहा, “शुभ काम संपन्न हो जाने दें, मैं रुपए अवश्य ही अदा कर दूँगा।” रायबहादुर बोले, “रुपये मिले बिना वर को मंडप में नहीं लाया जाएगा।”

इस दुर्घटना के कारण अंतःपुर में रोना-धोना मच गया। इस बड़ी विपत्ति का जो मूल कारण है, वह विवाह की लाल चोली-साड़ी पहने, गहना पहने, माथे पर चंदन चुपड़े चुप बैठी है। भावी ससुर-कुल के प्रति उसमें बड़ी भारी भक्ति या अनुराग उत्पन्न हो रहा हो, ऐसा नहीं कह सकते।

इस बीच एक सुविधा हो गई। सहसा ही वर अपने पितृदेव के प्रति बे-अदब हो गया। पिता से कह बैठा, “ख़रीद-फ़रोख़्त, मोल-भाव की बात मैं नहीं समझता, विवाह करने आया हूँ, विवाह करके ही लौटूँगा।” पिता ने जिस किसी को सामने पाया, दसी से बोले, “देख रहे हैं न, आजकल के लड़कों का आचरण?” दो-एक बुज़ुर्ग लोग थे, उन्होंने कहा, “शास्त्र-शिक्षा, नीति-शिक्षा तो बिल्कुल रही नहीं, इसी से तो ऐसा है।”

वर्तमान शिक्षा का विषम फल अपनी संतान में प्रत्यक्ष देख रायबहादुर हतोत्साहित होकर बैठ गए। विवाह किसी तरह विषण्ण-निरानंद भाव से संपन्न हुआ।

ससुराल जाते समय निरुपमा को हृदय से लगाकर पिता आँसू नहीं रोक सके। नीरु ने पूछा, “बाबूजी, क्या ये लोग मुझे फिर कभी आने नहीं देंगे?” रामसुंदर ने उत्तर दिया, “आने क्यों नहीं देंगे, बेटी। मैं तुम्हें लिवा लाऊँगा।”

अकसर ही रामसुंदर लड़की से मिलने चले जाया करते, पर समधियाने में उनकी कोई प्रतिष्ठा नहीं रही। यहाँ तक कि नौकर-चाकर तक उन्हें नीची निगाह से देखते। अंतःपुर के बाहर अकेले कमरे में किसी दिन पाँच मिनट के लिए बिटिया से मिल पाते, तो किसी दिन मिल तक नहीं पाते।

समधियाने में इस तरह का अपमान तो सहा नहीं जाता। रामसुंदर ने निश्चय किया, ‘जैसे भी हो, रुपया चुकाना ही होगा।’

लेकिन क़र्ज का जितना बोझ अभी कंधे पर था, वही सँभाले नहीं सँभल रहा था। ख़र्च में बेहद कटौती करनी पड़ी। क़र्ज़दार की आँख से बचने के लिए हमेशा कई तरह के हीन कौशल अपनाने पड़ते हैं।

उधर ससुराल में उठते-बैठते कन्या को उलाहने मिलते। पिता के घर की निन्दा सुनकर कमरे का दरवाज़ा बंद कर आँसू बहाना उसका नित्य-कर्म बन गया है।

विशेष रूप से सास का आक्रोश किसी भी तरह कम नहीं होता। यदि कोई कहता, “वाह, कैसा रूप है; बहू का मुख देखकर आँखें जैसे शीतल हो जाती हैं।” सास गरज उठतीं, “हाँ, बड़ी रूपवती है। जैसे घर की बेटी, वैसा ही रूप-रंग।”

यहाँ तक कि बहू के खाने-पहनने तक की कोई परवाह नहीं करता, यदि कोई दयालु पड़ोसी किसी प्रकार की कोई कमी बताता तो सास उत्तर देतीं, “इतना ही बहुत है।” यानी कि बाप ने पूरे दाम दिए होते, तो बेटी की भी पूरी सार-सँभाल होती। सभी ऐसा भाव प्रदर्शित करते, जैसे बहू का इस घर पर कोई अधिकार नहीं, वह धोखा देकर घुस आई है।

शायद कन्या के अनादर-अपमान की ये सारी बातें कानों-कान अंत में रामसुंदर तक पहुँची होंगी, वे घर-बार बेचने का प्रयत्न करने लगे।

लेकिन लड़कों को बेघर करने जा रहे हैं, यह बात उनसे छिपाये रखी। उन्होंने निश्चय किया, घर बेचकर फिर उसी घर को किराये पर ले लेंगे; ऐसे कौशल से चलेंगे कि उनके मरते दम तक यह बात लड़के जान तक नहीं पाएँगे।

लेकिन लड़के जान गए। सब आकर रोने-चिल्लाने लगे, ख़ासकर बड़े तीनों शादीशुदा लड़के, जिनमें से किसी-किसी की संतानें भी हैं, उनकी असहमति बड़ी महत्त्वपूर्ण थी, घर की बिक्री स्थगित रही। तब रामसुंदर इधर-उधर से भारी ब्याज़ पर थोड़े-थोड़े रुपए उधार लेने लगे। इसका नतीजा यह हुआ कि गृहस्थी का ख़र्चा चलाना मुश्किल हो गया।

नीरु पिता का मुख देखकर सब कुछ समझ गई। वृद्ध के पके केश, सूखा चेहरा और सदा संकुचित भाव में दैन्य और दुश्चिन्ता प्रकट हो आई। कन्या के आगे जब पिता अपराधी है, तब वह अपराध-अनुताप क्या छिप सकता है। जब समधियाने की अनुमति से क्षण भर के लिए कन्या से साक्षात्कार होता, तब पिता की छाती कैसी फट रही होती, यह उनकी हँसी देखकर ही अनुमान हो जाता है।

नीरु उस व्यथित पितृ-हृद को सांत्वना देने कुछ दिन के लिए मायके जाने को अत्यंत अधीर हो उठी। वह पिता का म्लान मुख देख अब दूर नहीं रह सकती थी। एक दिन रामसुंदर से बोली, “बाबूजी मुझे एक बार घर ले चलो।” रामसुंदर ने कहा, “अच्छा।”

किन्तु उनका कोई ज़ोर नहीं‒अपनी पुत्री पर पिता का जो स्वाभाविक अधिकार होता है, वह जैसे दहेज के रुपयों के बदले गिरवी रख दिया गया हो। यहाँ तक कि अत्यंत संकोच के साथ पुत्री से मुलाक़ात की भीख माँगनी होती और उसमें कभी-कभी निराश होने पर भी दूसरी बार कुछ कहने का मुख नहीं रहता।

किन्तु पुत्री के स्वयं मायके आना चाहने पर पित उसे न लाकर कैसे रह सकता है। इसलिए समधी के पास इस आशय की अर्जी पेश करने से पहले रामसुंदर ने कितनी दीनता, कितने अपमान, कितने नुक़सान सहकर जो तीन हज़ार रुपए संग्रह किए, उस इतिहास का गोपनीय रहना ही भला है।

वे कुछ नोटों को रूमाल में लपेट, चादर में बाँधकर समधी के निकट जा बैठे। पहले हँसते हुए मुहल्ले की चर्चा छेड़ी। हरेकृष्ण के घर में बड़ी भारी चोरी हो गई, उसका आद्योपांत विवरण कह सुनाया; नवीनमाधव और राधामाधव दोनों भाइयों की तुलना करते हुए राधामाधव की विद्या-बुद्धि-स्वभाव की प्रशंसा और नवीनमाधव की निन्दा की; शहर में एक नए रोग का आगमन हुआ, उस विषय में अनेक अजीबो-ग़रीब आलोचनाएँ कीं, अंत में हुक़्का ज़मीन पर रखते हुए बातों-ही-बातों में बोले, “अरे हाँ, समधी जी, दरअसल वे रुपए तो बाक़ी रह गए हैं। रोज़ ही सोचता हूँ आते हुए कुछ साथ लेता आऊँ, लेकिन समय पर ध्यान ही नहीं रहता। अरे भाई, बूढ़ा जो हो गया हूँ।” ऐसी एक लंबी भूमिका बाँधते हुए अस्थिपंजर की तीन अस्थियों के समान तीन नोटों को अत्यंत सहज भाव से अत्यंत लापरवाही से बाहर निकाला। केवल तीन हज़ार के नोटों को देखकार रायबहादुर ने ठहाका लगाया।

बोले, “रहने दीजिए समधी जी, इसकी मुझे ज़रूरत नहीं।” एक प्रचलित देसी कहावत का उल्लेख करते हुए बोले, “छोटी-सी बात के लिए वे हाथों को बदबूदार नहीं करना चाहते।”

ऐसी घटना के बाद कन्या को घर ले जाने का प्रस्ताव कोई ज़बान पर नहीं ला सकता था‒केवल रामसुंदर ही थे, जिन्होंने सोचा, ‘यह सब रिश्तेदारी का संकोच अब मुझे शोभा नहीं देता।’ मर्माहत हो काफ़ी देर चुप रहने के बाद अंत में मृदु स्वर में बात चलाई। रायबहादुर ने बिना कोई कारण जताते हुए कहा, “यह अभी नहीं होगा।” और यह कहते हुए वे काम के बहाने उठकर चले गए। रामसुंदर पुत्री को मुँह न दिखाकर काँपते हाथों उन कुछ नोटों को चादर की खूँट में बाँध घर लौट आए। मन-ही-मन प्रतिज्ञा की, जब तक सारे रुपए अदा करके निःसंकोच कन्या के अधिकार की माँग नहीं कर सकेंगे‒तब तक फिर समधियाने नहीं जाएँगे।

बहुत दिन बीत गए। निरुपमा आदमी पर आदमी भेजती रही, पर पिता नहीं आए। अंत में रूठकर उसने आदमी भेजना बंद कर दिया‒इससे रामसुंदर के मन पर भारी चोट पहुँची, लेकिन फिर भी वे नहीं गए।

क्वार का महीना आ गया। रामसुंदर ने कहा, “अबकी पूजा में बेटी को घर लाना ही है, नहीं तो मैं…।” ख़ूब लंबी-चौड़ी-सी क़सम खाईं।

पंचमी या षष्ठी के दिन चादर की खूँट में कुछ नोटों को बाँधकर रामसुंदर ने यात्रा की तैयारी की। एक पाँच साल के पोते ने आकर पूछा, “दादाजी, क्या मेरे लिए गाड़ी ख़रीदने जा रहे हो?” ठेला गाड़ी चढ़कर हवा खाने का बहुत दिनों का शौक़ है, पर किसी भी तरह उसे पूरा करने का उपाय नहीं सूझता। छह वर्ष की पोती रोती हुई आकर कहती है, पूजा के अवसर पर निमंत्रण में पहनकर जाने के लिए उसके पास एक अच्छा कपड़ा नहीं है।

रामसुंदर यह सब जानते थे। तंबाकू पीते-पीते बूढ़े ने इस विषय में काफ़ी सोचा। जब रायबहादुर के घर से पूजा का निमंत्रण आएगा, तब उनकी बहुओं को अत्यंत मामूली गहनों के साथ अनुग्रह-पात्र के समान वहाँ जाना होगा, इन सब बातों को सोचकर उन्होंने बड़ी गहरी साँस भरी, लेकिन इससे उनके भाग्य की वार्धक्य रेखा के अधिक गहरे अंकित होने के सिवाय और कोई फल नहीं मिला।

दैन्य पीड़ित घर की क्रंदन-ध्वनि को कानों में भरकर वृद्ध ने अपने समधी के घर में प्रवेश किया। आज उनमें वह संकोच का भाव नहीं, द्वार-रक्षक और मृत्यों के मुँह की ओर भी वह चकित सलज्ज दृष्टिपात दूर हो गया, मानो उन्होंने अपने ही घर में प्रवेश किया हो। सुना, रायबहादुर घर में नहीं है, कुछ देर प्रतीक्षा करनी होगी। मन के उच्छ्वास को न सँभाल पा रामसुंदर ने कन्या के साथ मुलाक़ात की। आनंदतिरेक से दोनों नेत्रों से आँसू बह चले। पिता भी रो रहे हैं, कन्या भी रो रही है; दोनों में से कोई भी बोल नहीं पा रहा है। ऐसे ही कुछ समय बीत गया। फिर रामसुंदर ने कहा, “बेटी, अबकी तुझे ले जाऊँगा। अब कहीं कोई रुकावट नहीं।”

इसी समय रामसुंदर के बड़े लड़के हरमोहन ने अपने दोनों छोटे बच्चों के साथ सहसा कमरे में प्रवेश किया। वे पिता से बोले, “बाबूजी, तो फिर आपने हम लोगों को रास्ते पर बिठा दिया?”

रामसुंदर ने अचानक अग्निमूर्ति को कहा, “तुम लोगों के लिए क्या मैं नरक में जाऊँ, तुम लोग मुझे मेरे सत्य की रक्षा नहीं करने दोगे?” रामसुंदर घर बेच बैठे हैं; लड़के कैसे भी कुछ जान न पाएँ, इसके लिए अनेक उपाय किए, फिर भी वे जान गए हैं, जानकर उनके प्रति अचानक रुष्ट और असंतुष्ट हो उठे।

उनका पोता उनके दोनों घुटनों से यथाशक्ति लिपट मुँह उठाकर बोला, “दादाजी, मुझे गाड़ी नहीं ख़रीद दी?”

सिर झुकाए रामसुंदर से कोई उत्तर न पा नीरु के पास जाकर बोला, “मुझे एक गाड़ी ख़रीद दोगी बुआ!”

निरुपमा सारा मामला समझ गई, बोली, “बाबूजी, यदि तुमने अब एक पैसा भी मेरे ससुर को दिया तो अपनी कन्या का मुँह फिर कभी नहीं देख पाओगे, तुम्हारी देह छूकर मैं यह क़सम खाती हूँ।”

रामसुंदर ने कहा, “राम! राम! ऐसी बात नहीं कहते। फिर, ये रुपए यदि मैं न दे पाऊँ तो तुम्हारे पिता का अपमान और तुम्हारा भी।”

नीरु बोली, “रुपया देना ही अपमान है, तुम्हारी कन्या का क्या कोई सम्मान नहीं। क्या मैं केवल रुपए की थैली भर हूँ, जब तक रुपए है; तब तक मेरा दाम है। नहीं, बाबूजी, ये रुपए देकर तुम मेरा अपमान मत करो। इसके अलावा मेरे पति तो यह रुपये नहीं चाहते।”

रामसुंदर ने कहा, “बेटी, तब यह तुम्हें जाने नहीं देंगे।”

निरुपमा बोली, “न जाने दें तो क्या कर सकते हो बोलो, फिर तुम भी ले जाने के लिए कुछ मत कहना।”

रामसुंदर काँपते हाथों नोट बँधी चादर को कंधे पर डाल चोर के समान सबकी आँखें बचाकर घर लौट गए।

रामसुंदर रुपए लाए थे और बेटी की मनाही के कारण वे रुपए दिए बिना ही लौटा ले गए, यह बात छिपी न रही। द्वार पर कान लगा कौतूहल स्वभाव वाली दासी ने नीरु की सास के पस यह ख़बर पहुँचा दी। सुनते ही उनके क्रोध की सीमा न रही। निरुपमा के लिए उसकी ससुराल अब काँटों की सेज बन गई। इधर उसके पति विवाह के थोड़े दिनों बाद ही डिप्टी मजिस्ट्रेट होकर किसी दूर शहर में चले गए थे, कहीं संग दोष से नीरु को कुशिक्षा न मिले, इसी बहाने अब मायके के रिश्तेदारों से मुलाक़ात की बिलकुल मनाही हो गई थी।

इसी समय नीरु अत्यंत कठिन रोग से पीड़ित हो गई। पर इसके लिए उसकी सास को पूरी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपने शरीर के प्रति वह अत्यंत लापरवाही बरत रही थी। कार्तिक महीने की ओस में रात-भर सिरहाने का द्वार खुला रखती, जाड़े के दिनों में देह पर कपड़ा नहीं रखती, खाने-पीने में कोई नियम नहीं मानती। दासियाँ जब अकसर भोजन लाना भूल जातीं, तब एक बार भी मुँह खोलकर उन्हें स्मरण नहीं दिलाती। वह पराये घर में दास-दासी की तरह स्वामी-स्वामिनी के अनुग्रह पर निर्भर हो रही है, यह संस्कार उसके मन में बद्धमूल हो रहा था। लेकिन इस प्रकार का भाव भी सास को सह्य नहीं था। यदि भोजन के प्रति बहू की किसी प्रकार की लापरवाही देखतीं, तो सास कह उठतीं, “नवाब के घर की बेटी है न। ग़रीब के घर का अन्न इनके मुँह में रुचता नहीं।” फिर कभी कहतीं, “एक बार देखो तो, कैसी बुरी शक्ल बना रखी है, दिन-ब-दिन जैसी जली सूखी लकड़ी-सी हुई जा रही है।”

रोग जब गंभीर होता गया, तब सास बोलीं, “ये सब इसके नखरे हैं।” आख़िर एक दिन नीरु ने अत्यंत विनयपूर्वक सास से कहा, “माँ, मैं एक बार अपने बाबूजी और भाइयों को देखूंगी।”

सास बोलीं, “यह मायके जाने का बहाना है।”

कहने का कोई विश्वास नहीं करेगा‒जिस दिन संध्या के समय नीरु की साँस उखड़ने लगी, उसी दिन पहली बार डॉक्टर ने उसे देखा था और उस दिन ही डॉक्टर के देखने का अंत भी हो गया।

घर की बड़ी बहू मरी, ख़ूब धूमधाम से अंत्येष्टि-क्रिया संपन्न हुई। ज़िले में, प्रतिमा-विसर्जन समारोह के बारे में रायचौधुरियों की जैसी बड़ी लोक-प्रसिद्धि है, बड़ी बहू की अंत्येष्टि संबंधी रायबहादुरों की बहुत कुछ वैसी ही ख्याति फैल गई‒ऐसी चंदन-काठ की चिता इस इलाक़े में कभी किसी ने देखी नहीं। ऐसे समारोह का श्राद्ध अनुष्ठान भी केवल रायबहादुर के घर में ही संभव था, सुना जाता है, इससे उनके ऊपर कुछ क़र्ज भी हो गया।

रामसुंदर को सांत्वना देते समय, उनकी बेटी की कैसे महा-समारोह के बीच मृत्यु हुई, सभी ने उसका बड़ा विस्तृत वर्णन किया।

इधर डिप्टी मजिस्ट्रेट का पत्र पहुँचा, “मैंने यहाँ सारा बंदोबस्त कर लिया है…इसलिए मेरी पत्नी को फ़ौरन यहाँ भेज दें।” रायबहादुर की श्रीमती ने लिखा, “बेटा, हमने तुम्हारे लिए एक दूसरी लड़की का रिश्ता तय किया है, इसलिए छुट्टी लेकर फ़ौरन आओ।”

इस बार बीस हज़ार का दहेज और हाथों-हाथ अदायगी।

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