हम तीन बाल्य साथी जिस कमरे में सोते थे, उसकी बग़ल के कमरे की दीवार पर एक पूरा नरकंकाल लटका हुआ था। रात को हवा में उसकी हड्डियाँ खट्खट् शब्द करतीं हिलती रहती। दिन के समय हम लोगों को उन हड्डियों को हिलाना-डुलाना पड़ता। तब हम पंडित महाशय से मेघनाद-वध और कैम्बल स्कूल के छात्र […]
Author Archives: रविंद्रनाथ टैगोर
महामाया- गृहलक्ष्मी की कहानियां
महामाया और राजीव लोचन दोनों का नदी किनारे एक भग्नमंदिर में साक्षात्कार हुआ।महामाया ने बिना कुछ बोले अपनी स्वाभाविक गंभीर दृष्टि कुछ भर्त्सना के भाव से राजीव पर डाली। उसका आशय यह था कि “तुम किस साहस से आज असमय ही मुझे यहां बुला लाए हो। मैं अब तक तुम्हारी सब बातें सुनती चली आई […]
रामकन्हाई की मूर्खता—गृहलक्ष्मी की कहानियां
गृहलक्ष्मी की कहानियां : जो कहते हैं, गुरुचरण की मृत्यु के समय उसकी दूसरी घरवाली अंतःपुर में बैठकर ताश खेल रही थीं, वे विश्वनिन्दक हैं, वे तिल का ताड़ बनाते हैं। असल में गृहिणी उस समय एक पैर के ऊपर बैठी दूसरे पैर के घुटने को ठुड्डी तक उठा कच्ची इमली, हरी मिर्च और झींगा […]
तिनके का संकट-गृहलक्ष्मी की कहानियां
जमींदार के नायब गिरीश बसु के अंतःपुर में प्यारी नाम की एक दासी काम में लगी। उसकी उम्र भले ही कम थी पर स्वभाव अच्छा था। दूर पराये गांव से आकर कुछ दिन काम करने के बाद ही, एक दिन वह वृद्ध नायब की प्रेम-दृष्टि से आत्मरक्षा के लिए मालकिन के पास रोती हुई हाजिर […]
पड़ोसन- गृहलक्ष्मी की कहानियां
मेरी पड़ोसन बाल-विधवा है‒शरद की ओस से धुली वृतच्युत शेफाली के समान। वह किसी सुहागकक्ष की फूल शय्या1 के लिए नहीं, केवल देवपूजा के निमित्त ही उत्सर्ग की हुई है। मैं मन-ही-मन उसकी पूजा करता। उसके प्रति मेरे मन का जैसा भाव था, उसे पूजा के अतिरिक्त किसी अन्य सहज शब्द द्वारा प्रकट करना नहीं […]
गुप्त धन – गृहलक्ष्मी की कहानियां
अमावस्या की आधी रात थी। मृत्युंजय तांत्रिक मतानुसार अपनी प्राचीन देवी जयकाली की पूजा करने बैठा। पूजा समाप्त करके जब वह उठा तो निकटस्थ आम के बग़ीचे से प्रातःकाल का पहला कौआ बोला। मृत्युंजय ने पीछे घूमकर देखा, मंदिर का द्वार बंद था। तब उसने देवी के चरणों में एक बार माथा टेककर उनका आसन […]
वैष्णवी – गृहलक्ष्मी की कहानियां
मैं लिखता रहता हूँ, लेकिन लोकरंजन मेरी क़लम का धर्म नहीं, इसलिए लोग मुझे हमेशा जिस रंग से रंजित करते रहे हैं, उसमें स्याही का हिस्सा ही अधिक होता है। मेरे बारे में बहुत बातें ही सुननी पड़तीं; भाग्यक्रम से वे हितकथा नहीं होती और मनोहारी तो बिलकुल नहीं। शरीर पर जहाँ चोटे पड़ती रहती […]
मुन्ने की वापसी – गृहलक्ष्मी कहानियां
पहले-पहल राइचरण जब मालिक के यहाँ नौकरी करने आया, तब उसकी उम्र बारह वर्ष की थी। जैसोर ज़िले में उसका घर था। लंबे बाल, बड़ी-बड़ी आँखें, साँवला, चिकना और छरहरा। जात से कायस्थ। उसके मालिक भी कायस्थ थे। मालिक के एक साल के बच्चे की देखभाल और पालन-पोषण में सहायता करना ही उसका प्रधान कर्त्तव्य था।
सुभा – गृहलक्ष्मी कहानियां
जब कन्या का नाम सुभाषिणी रखा गया, तब कौन जानता था कि वह गूँगी होगी। उसकी दोनों बड़ी बहनों का नाम सुकेशिनी और सुहासिनी रखा गया था, अतः मेल के अनुरोध पर उसके पिता ने छोटी कन्या का नाम सुभाषिणी रखा। अब सब उसे संक्षेप में सुभा कहते।
चोरी का धन – गृहलक्ष्मी कहानियां
महाकाव्य के युग में स्त्री को पौरुष के बल पर प्राप्त किया जाता था, जो अधिकारी होते वही रमणी-रत्न प्राप्त करते। मैंने कापुरुषता के द्वारा प्राप्त किया, यह बात जानने में मेरी पत्नी को विलंब हुआ। किन्तु, विवाह के बाद मैंने साधना की; जिसे धोखा देकर चोरी से पाया, उसका मूल्य प्रतिदिन चुकाया है।
