इस शिशु ने समय के साथ ही राइचरण की गोद छोड़कर स्कूल, स्कूल छोड़कर कॉलेज, अंत में कॉलेज छोड़कर मुंसिफ़ी में प्रवेश किया। राइचरण अब भी उनका नौकर था।

उसके छोटे मालिक की एक और बढ़ती हुई है; उनके विवाह के बाद उनकी पत्नी घर में पधारी हैं, अतः अनुकूल बाबू पर राइचरण का पहले जितना अधिकार था, उसका अधिकांश ही अब नई मालकिन के हाथों में आ गया है।

पर मालकिन ने जैसे राइचरण का पूर्वाधिकार घटा दिया है, वैसे ही एक नया अधिकार सौंप, उसका बहुत कुछ पूरा भी कर दिया है। कुछ ही दिन हुए अनुकूल के एक पुत्र हुआ है‒और राइचरण ने मात्र अपनी चेष्टा और अध्यवसाय से उसे पूर्णरूपेण अपने वश में कर लिया है।

वह उसे इतने उत्साह के साथ झुलाना शुरू करता है, उसे दोनों हाथों से पकड़ ऐसी निपुणता के साथ आकाश में उछालता है, उसके मुँह के पास जाकर ऐसी आवाज़ के साथ सिर हिलाता रहता है, किसी उत्तर की प्रत्याशा न करके ऐसे सब बिलकुल अर्थहीन, असंगत प्रश्न सुर के लहज़े में शिशु से करता रहता है कि यह छोटा अनुकूल वंशजात राइचरण को देखते ही एकदम पुलकित हो उठता है।

और जब बच्चा घुटनों के बल रेंगता अत्यंत सावधानी से चौखट पार करता और किसी के पकड़ने आने पर खिलखिलाहट भरी हँसी और किलकारी के साथ तेज़ी से किसी सुरक्षित स्थान में छिपने की कोशिश करता, तब राइचरण उसके असाधारण चातुर्य और विचार-शक्ति को देखकर चकित रह जाता। वह माँजी (छोटी मालकिन) के पास जाकर गर्व और विस्मय से कहता, “माँ, तुम्हारा बेटा बड़ा होकर जज बनेगा, और पाँच हज़ार रुपए रोज़गार करेगा।”

दुनिया में कोई दूसरी मानव संतान इस आयु में चौखट लाँघने जैसा असंभव चातुर्य का परिचय दे सकती है यह राइचरण की समझ से परे है, केवल भावी जज के लिए ही कुछ आश्चर्य नहीं।

आखिर शिशु ने जब टलमलाकर चलना शुरू किया तो वह आश्चर्यजनक घटना थी और जब माँ को माँ, बुआ को बुइ तथा राइचरण को चन्न कहकर पुकारने लगा, तो राइचरण उस अविश्वसनी संवाद की जिस-तिस के पास घोषणा करने लगा।

सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि ‘यह माँ को माँ, बुआ को बुआ, पर मुझे चन्न कहता है।’ वास्तव में, शिशु के मस्तिष्क में यह बुद्धि कैसे आई, कहना कठिन है। निश्चय ही कोई वयस्क व्यक्ति कभी भी इस प्रकार के असाधारण का परिचय नहीं दे सकता और यदि देता भी तो उसके जज पद-प्राप्ति की संभावना के विषय में जनसाधारण के मन में संदेह उत्पन्न होता।

कुछ दिनों बाद राइचरण को मुँह में रस्सी लगाकर घोड़ा बनना पड़ा और मल्ल बनकर शिशु के साथ कुश्ती लड़नी पड़ी‒फिर पराभूत होकर भूमि पर धराशायी न होने पर तो भारी विप्लव मच जाता।

इसी समय अनुकूल बाबू की पद्मा नदी के किनारेवाले किसी ज़िले में बदली हो गई। अनुकूल अपने शिशु के लिए कलकत्ता से एक बच्चों की ठेलागाड़ी ले गए। साटिन का कुरता, सिर पर ज़री की टोपी, हाथों में सोने के कड़े और पैरों में पाजेब पहनाकर राइचरण‒नव कुमार को दोनों वक़्त गाड़ी में हवा खिलाने ले जाता।

वर्षा ऋतु आई। भूखी पद्मा अपने एक-एक ग्रास में बाग़-बगीचे, गाँव के गाँव और शस्य खेत मुख में डालती चली गई। बालूचर के कास-वन और वन झाऊ पानी में डूब गए। किनारे के टूटने के निरंतर चुपचाप शब्द और जल के गर्जन से दसों दिशाएँ मुखरित हो उठीं और द्रुतवेग से धावमान फेन राशि ने नदी की तीव्र गति को प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर कर दिया।

अपराह्न में बादल छाए थे, लेकिन वर्षा की कोई संभावना नहीं थी। राइचरण के ख़ब्ती छोटे मालिक किसी भी तरह घर में रहना नहीं चाहते थे। गाड़ी में चढ़ बैठे। राइचरण धीरे-धीरे गाड़ी ठेलता हुआ धान के खेत के किनारे नदी तीर पर आ पहुँचा। नदी में एक भी नाव नहीं, खेत में एक भी आदमी नहीं‒बादलों की सुराख़ों से ही दिख पड़ा कि उस पार जनशून्य बालुका-तीर पर शब्दहीन दीप्त समारोह के साथ सूर्यास्त का आयोजन हो रहा है। उस निस्तब्धता के बीच सहसा शिशु ने एक ओर उँगली-निर्देश करते हुए कहा‒”चन्न, फू…।”

कुछ ही दूर जलपूर्ण पंकिल भूमि पर एक विशाल कदंब वृक्ष की ऊँची डाल पर कई एक कदंब के फूल खिले थे, उसी ओर शिशु की लुब्ध दृष्टि आकृष्ट हुई थी। दो-चार दिन हुए, राइचरण ने उन्हें एक सींक में पिरोकर कदंब फूल की गाड़ी बना दी थी, उसे रस्सी से बाँधकर खींचने में इतना आनंद आया था कि उस दिन फिर राइचरण को लगाम बाँधनी पड़ी, घोड़े से एकबारगी ही साईस के पद पर उसकी बढ़ोतरी हो गई थी।

कीचड़ में से होते हुए फूल चुन लाने की इच्छा चन्न की नहीं हुई, जल्दी से विपरीत दिशा में उँगली-निर्देश कर वह बोला, “देखो-देखो-वह देखो चिड़िया, वह उड़ गई। अरी चिड़िया, आ-जा रे…” इस प्रकार निरंतर कई तरह से बहलाता हुआ वह वेग से गाड़ी ठेलने लगा।

किन्तु जिस बालक के भविष्य में जज होने की कुछ भी संभावना हो, उसे इस प्रकार सामान्य उपायों से भुलाने की प्रत्याशा व्यर्थ है‒और ख़ास तौर पर तब, जबकि चारों ओर दृष्टि आकर्षण के लिए उपयोगी कुछ भी नहीं था और काल्पनिक चिड़िया को लेकर अधिक समय तक काम नहीं चलता।

राइचरण ने कहा, “तब तुम गाड़ी में ही बैठे रहना, मैं चट् से फूल चुनकर ला रहा हूँ। ख़बरदार, किनारे पर मत जाना।” कहते हुए घुटने के ऊपर धोती उठाकर वह कदंब वृक्ष की ओर चल पड़ा।

पर जल के किनारे जाने का जो निषेध हुआ‒इससे शिशु का मन कदंब फूल से प्रत्यावृत्त हो‒उसी क्षण जल की ओर धावित हुआ। देखा, जल कलकल-छलछल करता दौड़ता चला जा रहा है; जैसे शैतानी करते किसी एक वृहत् राइचरण के हाथ से बचकर एक लाख शिशु प्रवाह सहास्य कल स्वर से निषिद्ध स्थान की ओर द्रुतवेग से भागा जा रहा हो।

उनके उस असत् दृष्टांत से मानव शिशु का चित्त चंचल हो उठा। गाड़ी से धीरे-धीरे उतरकर वह जल के किनारे गया‒एक लम्बी घास बीन उसमें बंसी की कल्पना कर झुककर मछली पकड़ने लगा‒विह्वल जलराशि ने अस्फुट चंचल भाषा में शिशु को बारबार अपने खेल के घर में आने का आह्वान जनाया। एक बार झप से एक शब्द हुआ, किन्तु वर्षा में पद्मा के किनारे ऐसे शब्द कितने ही सुनाई पड़ते हैं। राइचरण ने अँगोछा भरकर कदंब के फूल चुने। पेड़ से उतरकर वह मुस्कराता हुआ गाड़ी के पास आया। देखा‒कोई नहीं है। चारों ओर ताका, कहीं किसी का कोई चिह्न तक नहीं।

क्षण-भर में राइचरण के शरीर का सारा ख़ून जमकर बर्फ़ हो गया। सारा जगत् मलिन विवर्ण धूमिल-सा लगने लगा। वह टूटे दिल से एक बार जी-जान लगाकर चिल्ला उठा, “बाबू‒मुन्ना बाबू‒मेरे प्यारे भैया बाबू…!”

किन्तु ‘चन्न’ कहते किसी ने उत्तर नहीं दिया, किसी शिशु कंठ की शैतानी भरी हँसी भी नहीं सुनाई पड़ी; केवल पद्मा पूर्ववत् छल्छल्-कल्कल् कर भागती जा रही थी, जैसे वह कुछ भी न जानती हो और दुनिया भर की इन तमाम साधारण घटनाओं की ओर ध्यान देने के लिए उसके पास जैसे एक क्षण का भी समय न हो।

संध्या हो जाने पर उत्कंठित जननी ने चारों ओर आदमी दौड़ाए‒हाथ में लालटेन लिए हुए आदमियों ने नदी के किनारे देखा, राइचरण निशीथ की तूफ़ानी हवा के समान सारे खेतों में, “बाबू‒मेरे मुन्ना बाबू”….कहता बैठे गले से चिल्लाता फिर रहा है। अंत में घर लौटकर राइचरण माँजी के पैरों में आकर धड़ाम-से-गिरा। उससे जितना ही पूछा जाता, वह रोते-रोते यही बताता, “मुझे कुछ नहीं मालूम माँ।”

यद्यपि सभी ने मन-ही-मन समझ लिया कि यह काम पद्मा नदी का ही है फिर भी गाँव के पास ख़ानाबदोशों के एक दल का समागम हुआ है, उनके प्रति भी संदेह दूर नहीं हुआ। और माता जी के मन में ऐसा संदेह उपस्थित हुआ कि शायद राइचरण ने उसे कहीं छिपा रखा है; यहाँ तक कि उसे बुलाकर बड़ी चिरौरी करते हुए बोलीं, “तू मेरे बच्चे को लौटा दे‒तू जितने रुपए चाहे, मैं तुझे दूँगी।” यह सुनकर राइचरण ने माथा पीट लिया। मालकिन ने उसे भगा दिया।

अनुकूल बाबू ने अपनी पत्नी के मन से राइचरण के प्रति इस अनुचित संदेह को दूर करने की चेष्टा की थी। उन्होंने पूछा था, “आख़िर राइचरण ने ऐसा जघन्य अपराध किस उद्देश्य से किया होगा?” मालकिन बोलीं, “क्यों, उसकी देह पर सोने के गहने जो थे।”

राइचरण अपने गाँव लौट गया। इतने दिनों तक उसे संतान नहीं हुई थी, होने की विशेष आशा भी नहीं थी। पर दैवयोग से वर्ष के पूरे होते न होते उसकी पत्नी ने अधिक आयु में एक पुत्र संतान को जन्म दे अपनी लोकलीला संवरण की।

इस नवजात शिशु के प्रति राइचरण के मन में अत्यंत विद्वेष जगा। सोचा, यह जैसे छल से ही मुन्ना बाबू का स्थान अधिकार करने को आया हो। उसे लगा, मालिक के इकलौते बेटे को जल में बहाकर ख़ुद बेटे के सुख का उपभोग करना जैसे एक महापातक हो। अगर राइचरण की विधवा बहन न होती, तो यह शिशु पृथ्वी की वायु का अधिक दिन भोग नहीं कर पाता।

आश्चर्य की बात यह है कि इस बच्चे ने भी थोड़े दिनों के बाद ही चौखट लाँघना शुरू किया और सभी प्रकार की मनाही की अनेदखी करने में सकौतुक चतुरता प्रकट करने लगा। यहाँ तक कि इसका कंठस्वर‒हँसने-रोने की आवाज़ बहुत कुछ उसी शिशु जैसी थी। कभी-कभी इसका रोना सुनकर, राइचरण की छाती सहसा ज़ोरों से धड़कने लगती। लगता, भैया बाबू राइचरण को न पाकर कहीं रो रहा है।

फेलूना1‒राइचरण की बहन ने इसका नाम रखा था फेलूना-समय आने पर उसने ‘बुआ’ को ‘बुआ’ कहकर बुलाया। उस परिचित बुलाहट को सुनकर एक दिन सहसा राइचरण के मन में आया‒‘फिर तो मुन्ना बाबू मेरा मोह-बंधन तुड़ा नहीं पाये हैं, उसने तो मेरे घर में ही आकर जन्म लिया है।’

इस विश्वास के पक्ष में कई अकाट्य युक्तियाँ थीं, पहली, उसके जाने के साथ ही साथ इसका जन्म। दूसरी, इतने दिनों के बाद अचानक उसकी पत्नी के गर्भ से ही संतान का जन्म-ग्रहण, जो कभी भी स्त्री के निजगुण से नहीं हो सकता है। तीसरी, यह भी घुटनों के बल रेंगता है, टलमलाकर चलता है और बुआ को ‘बुआ’ कहता है। जिन सभी लक्षणों के रहने पर भविष्य में जज हुआ जा सकता है, उनमें से अधिकांश इसमें मौजूद हैं।

तब माँजी के उस भयानक संदेह की बात सहसा याद आई‒चकित हो उसने मन-ही-मन कहा, ‘वाह, माँ के मन ने जान लिया कि उसके बच्चे को किसने चुराया है।’ तब इतने दिनों तक शिशु की जो अवहेलना की थी, उसके लिए बड़ा अनुताप हुआ। वह फिर शिशु की पकड़ में आ गया।

अब से फेलूना को राइचरण इस प्रकार पालने लगा, जैसे वह बड़े घर का लड़का हो। उसे साटिन का कुरता ख़रीद दिया। ज़री की टोपी ले आया। मृत पत्नी के गहने गलाकर चूड़ी और बाला तैयार हुए। मुहल्ले के किसी भी लड़के के साथ उसे खेलने नहीं देता। रात-दिन केवल स्वयं ही उसके खेल का साथी रहता। मोहल्ले के लड़के मौका पाकर उसको नवाबज़ादा कहकर मज़ाक़ उड़ाते और गाँववाले राइचरण के इस प्रकार के सनकी आचरण से आश्चर्य में पड़ गए।

फेलूना की जब विद्याभ्यास की उम्र हुई, तब राइचरण अपनी सारी ज़मीन-जायदाद बेच उसे लेकर कलकत्ता चला गया। वहाँ बड़ी मुश्किलों से एक नौकरी जुटाकर उसने फेलूना को विद्यालय भेजा। स्वयं जैसे-तैसे रहकर लड़के को अच्छा खिला-पहनाकर अच्छी शिक्षा देने में कोई क़सर नहीं छोड़ती। मन-ही-मन कहता, ‘बेटा, तू स्नेहवश मेरे घर में आया है, इससे तेरी देखरेख में कोई कमी हो, यह नहीं होगा।’

इसी तरह बारह वर्ष बीत गए। लड़का पढ़ने-लिखने में अच्छा और देखने-सुनने में भी ख़ासा, मोटा-ताज़ा और उज्जवल श्याम वर्ण का था‒पहनने-ओढ़ने केश-विन्यास की ओर उसका विशेष ध्यान था‒मिज़ाज से भी कुछ बेहद शौक़ीन था। पिता को ठीक पिता-सा नहीं मान पाता था। क्योंकि राइचरण स्नेह में पिता और सेवा में नौकर जैसा था। उसका एक दोष यह भी था कि वह फेलूना का पिता है, यह बात उसने सबसे छिपा रखी थी। जिस छात्रावास में फेलूना रहता था, वहाँ के छात्र पूर्वी बंगाल2 के राइचरण का हमेशा मज़ाक उड़ाते और पिता की अनुपस्थिति में फेलूना भी उस हँसी-मज़ाक में शामिल नहीं रहता हो, ऐसा नहीं कह सकते। फिर निरीह वात्सल्य स्वभाववाले राइचरण का सभी बहुत आदर करते थे और फेलूना भी स्नेह करता था, पर जैसा कि पहले कहा गया ठीक पिता की तरह नहीं, वह किंचित् अनुग्रहमिश्रित था।

राइचरण बूढ़ा हो चला है। मालिक उसके काम में हमेशा खोट ही निकालते। वास्तव में उसका शरीर अब शिथिल हो आया है। काम में भी उतना मन नहीं लगा पाता, हमेशा कुछ-न-कुछ भूल जाता। लेकिन जो व्यक्ति पूरा वेतन देगा, वह वार्धक्य के बहाने को नहीं मानना चाहेगा। इधर राइचरण ज़मीन-जायदाद बेचकर जो नक़द रुपए संग्रह कर ले आया था, वह भी अब ख़त्म हो चला। आजकल फेलूना ने भी पहनने-ओढ़ने की कमी के मामले में हमेशा अपनी नापसंदगी को ज़ाहिर करना शुरू कर दिया है।

एक दिन राइचरण ने अचानक काम से जवाब दे दिया और फेलूना को कुछ रुपए देकर बोला, “ज़रूरत आ पड़ी है, मैं कुछ दिनों के लिए गाँव जा रहा हूँ।” यह कहकर वह बारासत जा पहुँचा। उस समय अनुकूल बाबू वहाँ के मुन्सिफ़ थे।

अनुकूल के फिर दूसरी संतान नहीं हुई, गृहिणी अभी तक पुत्र-शोक हृदय में पाले जा रही हैं।

एक दिन शाम को बाबू कचहरी से आकर विश्राम कर रहे थे और मालकिन किसी संन्यासी से संतान-कामना के उद्देश्य से बहुमूल्य जड़ी-बूटी और आशीर्वाद ख़रीद रही थीं। इतने में आँगन से आवाज़ आई, “माँ, जय हो!”

बाबू ने पूछा, “कौन है रे?”

राइचरण ने आकर प्रणाम करते हुए कहा, “मैं राइचरण हूँ।” बूढ़े को देखकर अनुकूल बाबू का हृदय आर्द्र हो आया। उसकी वर्तमान हालात के बारे में हज़ारों प्रश्न और फिर से उसे काम में लगाने का प्रस्ताव दिया।

राइचरण ने म्लान हँसी के साथ कहा, “मैं माँजी को एक बार प्रणाम करना चाहता हूँ।”

अनुकूल उसको साथ ले अंतःपुर में गए। माँजी ने प्रसन्न भाव से राइचरण का आदर नहीं किया। राइचरण इस बात पर ध्यान दिए बिना ही हाथ जोड़े बोला, “मालिक, मालकिन, मैंने ही तुम्हारे लड़के को चुराया है। न तो पद्मा ने और न किसी दूसरे ने, दरअसल कृतघ्न और अधम तो मैं ही हूँ।”

अनुकूल बोल उठे, “क्या कह रहे हो, कहाँ है वह!”

“जी मेरे पास ही है, मैं परसों ला दूँगा।”

उस दिन रविवार को कचहरी बंद थी। प्रातःकाल से पति-पत्नी दोनों प्राणी उन्मुख हो रास्ता देख रहे थे। दस बजे फेलूना को साथ लेकर राइचरण हाज़िर हुआ।

अनुकूल की पत्नी ने बिना कोई प्रश्न किए, बिना कोई ना-नुकुर किए उसे गोद में बिठा, उसे स्पर्श कर, उसे सूँघकर, अतृप्त नयनों से उसके मुख को निहारा, और हँसते-रोते व्याकुल हो उठीं। वास्तव में लड़का देखने में अच्छा था‒वेश-भूषा, आकार-प्रकार में दारिद्रय का कहीं कोई चिह्न नहीं। मुख पर अत्यंत प्रियदर्शन विनीत सलज्ज भाव उसे देखकर अनुकूल के हृदय में भी सहसा स्नेह उच्छ्वसित हो उठा।

फिर भी उन्होंने अविचलित भाव धारण किए हुए पूछा, “कोई प्रमाण है?”

राइचरण ने कहा, “ऐसे काम का प्रमाण कैसे रह सकता है। मैंने जो तुम्हारा लड़का चुराया, इस बात को तो बस भगवान ही जानते हैं, दुनिया में दूसरा और कोई नहीं जानता।”

अनुकूल ने सोचकर निश्चय किया कि लड़के को पाते ही उनकी पत्नी ने जिस आग्रह के साथ उसे सँभालकर पकड़ रखा है, अब प्रमाण जुटाने के लिए प्रयत्न करना युक्तियुक्त नहीं होगा। जैसा भी हो, विश्वास करना ही ठीक होगा। इसके अलावा राइचरण ऐसा लड़का पाएगा कहाँ से और बूढ़ा नौकर अकारण ही उनकी प्रतारणा क्यों करेगा?

उन्होंने लड़के से भी बातचीत की और जाना कि वह बचपन से ही राइचरण के साथ है और राइचरण को ही वह पिता के रूप में जानता है। लेकिन राइचरण ने कभी पिता के समान उसके साथ व्यवहार नहीं किया, उसमें बहुत कुछ नौकर-सा ही भाव था।

अनुकूल मन से संदेह को दूर हटाते हुए बोले, “लेकिन राइचरण, अब तू हम लोगों के पास भूल से भी नहीं रुक सकता।”

राइचरण हाथ जोड़े गद्गद वाणी से बोला, “मालिक, अब मैं बुढ़ापे में कहाँ जाऊँगा?”

मालकिन ने कहा, “बेचारे को यहीं कहीं रहने दो, हमारे बच्चे का कल्याण होगा, उसे मैंने माफ़ कर दिया।”

न्यायपरायण अनुकूल ने कहा, “उसको क्षमा नहीं मिलेगी।”

राइचरण अनुकूल के पैरों से लिपटकर बोला, “मैंने कुछ नहीं किया, ईश्वर ने किया है।”

अपने पाप को ईश्वर के मत्थे मढ़ने की कोशिश देख अनुकूल और ज़्यादा चिढ़कर बोले, “जिसने ऐसा विश्वासघाती काम किया है, उसका फिर से विश्वास कर लेना उचित नहीं होगा।”

राइचरण ने मालिक के चरण छोड़ते हुए कहा, “वह मैं नहीं हूँ!”

“फिर कौन हैं?”

“मेरा भाग्य है।”

पर इस सफ़ाई से किसी शिक्षित व्यक्ति को संतोष नहीं हो सकता।

राइचरण बोला, “दुनिया में मेरा कोई नहीं है।”

फेलूना ने जब यह पाया कि वह मुन्सिफ़ का लड़का है और राइचरण ने इतने दिनों तक उसे चुराकर अपना लड़का कहकर अपमानित किया है, तो उसे मन-ही-मन थोड़ा क्रोध आया फिर भी उदारतापूर्वक पिता से बोला, “बाबूजी, आप उसे माफ़ कर दें, घर में यदि न रखें तो उसके हर महीने कुछ रुपए बाँध दीजिए।” इसके बाद राइचरण ने बिना कुछ बोले एक बार बेटे के चेहरे की ओर देखा, सबको प्रणाम किया, उसके बाद दरवाज़े के बाहर जाकर दुनिया के अनगिनत लोगों में मिल गया। महीने के अंत में, अनुकूल ने जब उसके गाँव के पते पर कुछ रुपए भेजे, तब वे रुपए लौट आए। वहाँ उस नाम का कोई व्यक्ति नहीं था।

1. बंगला अर्थ ‘निरादृत’; हिन्दी समानार्थक ‘फेंकू’।

2. पश्चिमी बंगाल के लोग पूर्वी बंगाल के लोगों को नीची निगाह से देखते रहे हैं और उन्हें ‘बांगल’ कहकर संबोधित करते हैं, जो अपमानबोधक है।

यह भी पढ़ें –चोरी का धन – गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji