गुप्त धन - गृहलक्ष्मी की कहानियां

अमावस्या की आधी रात थी। मृत्युंजय तांत्रिक मतानुसार अपनी प्राचीन देवी जयकाली की पूजा करने बैठा। पूजा समाप्त करके जब वह उठा तो निकटस्थ आम के बग़ीचे से प्रातःकाल का पहला कौआ बोला।

मृत्युंजय ने पीछे घूमकर देखा, मंदिर का द्वार बंद था। तब उसने देवी के चरणों में एक बार माथा टेककर उनका आसन सरकाया। आसन के नीचे से कटहल के काठ का एक बक्स बाहर निकला। जनेऊ में चाबी बँधी थी। वह चाबी लगाकर मृत्युंजय ने बक्स खोला। खोलते ही चौंककर हाथ से माथा ठोंक लिया।

मृत्युंजय का अंदर का बग़ीचा प्राचीर से घिरा था। उसी बाग़ के एक भाग में बड़े-बड़े पेड़ों की छाया के अंधकार में यह छोटा-सा मंदिर था। मंदिर में जयकाली की मूर्ति को छोड़कर और कुछ न था। उसमें केवल एक प्रवेश-द्वार था। मुत्युंजय ने बक्स उठाकर बहुत देर तक हिला-डुलाकर देखा। मृत्युंजय के बक्स खोलने के पहले वह बंद ही था‒किसी ने उसे तोड़ा न था। मृत्युंजय ने कई बार प्रतिमा के चारों ओर चक्कर लगाकर टटोलकर देखा‒कुछ भी नहीं मिला। उन्मत्त होकर मंदिर का दरवाज़ा खोल दिया‒उस समय प्रभात की किरणें फूट रही थीं। मंदिर के चारों ओर मृत्युंजय घूम-घूमकर व्यर्थ की आशा में खोजते हुए चक्कर लगाने लगा।

प्रभातकालीन आलोक जब प्रस्फुटित हो उठा, तब वह बाहर के चंडीमंडप में आकर सिर पर हाथ रखे बैठकर सोचने लगा। सारी रात जागने के बाद श्रांतदेह को थोड़ी-सी झपकी आ गई, इसी समय हठात् चौंक पड़ा। सुना, “जय हो बाबा।”

प्रांगण में सामने एक जटाजूटधारी संन्यासी खड़े थे। मृत्युंजय ने भक्ति-भाव से उनको प्रणाम किया। संन्यासी ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा, “बेटा, तुम मन में व्यर्थ शोक कर रहे हो।”

सुनकर मृत्युंजय को आश्चर्य हुआ। कहा, “आप अंतर्यामी हैं, नहीं तो मेरा शोक किस प्रकार जान लिया। मैंने तो किसी से भी कुछ नहीं कहा।”

संन्यासी बोले, “वत्स, मैं कहता हूँ, तुम्हारा जो कुछ खो गया है, उसके लिए तुम आनंद मनाओ, शोक मत करो!” मृत्युंजय ने उनके पैर पकड़कर कहा, “तब तो आप सभी-कुछ जान गए हैं‒किस तरह खो गया है, कहाँ जाकर फिर मिलेगा, यह जब तक न बताएँगे मैं आपके चरण नहीं छोड़ूंगा।”

संन्यासी ने कहा, “मैं यदि तुम्हारी अमंगल कामना करता तो बताता। किन्तु भगवती ने कृपा करके जो हर लिया है, उसके लिए शोक न करना!”

संन्यासी को प्रसन्न करने के लिए मृत्युंजय ने सारे दिन विविध प्रकार से उनकी सेवा की। दूसरे दिन प्रातः अपनी गौशाला से लोटा-भर फेनयुक्त दूध दुहकर लाने पर देखा, संन्यासी नहीं थे।

मृत्युंजय जब बच्चा था, जब उसके पितामह हरिहर एक दिन इसी चंडी-मंडप में बैठे हुक़्क़ा पी रहे थे, तब इसी तरह एक संन्यासी ‘जय हो बाबा’ कहते हुए इसी आँगन में आ खड़े हुए थे। हरिहर ने उस संन्यासी को कई दिन घर में रखकर विधिपूर्वक सेवा द्वारा संतुष्ट किया था।

विदा के समय संन्यासी ने जब यह प्रश्न किया, “वत्स, तुम क्या चाहते हो?” तो हरिहर ने कहा, “बाबा, यदि संतुष्ट हुए हों तो एक बार मेरी हालत सुनें। एक समय इस गाँव में हम सबसे समृद्ध थे। मेरे प्रपितामह ने दूर के एक कुलीन को बुलवाकर उससे अपनी एक कन्या का विवाह कर दिया था। उनके वह दौहिजवंशज ही हमको धोखा देकर आजकल इस गाँव में बड़े आदमी बन बैठे हैं। इस समय हमारी अवस्था अच्छी नहीं है, इसी कारण उनका अहंकार सहते रहते हैं। किन्तु अब और नहीं सहा जाता। कैसे हमारा कुल फिर से बड़ा हो, यही उपाय बता दें, यही आशीर्वाद दें।”

संन्यासी ने थोड़ा हँसकर कहा, “बेटा, छोटे होकर सुख से रहो, बड़े होने के प्रयत्न में मुझे भलाई नहीं दिखती।”

किन्तु हरिहर ने फिर भी नहीं छोड़ा; वंश को बड़ा करने के लिए वह सब-कुछ स्वीकार करने के लिए राज़ी था।

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