निकट भविष्य में सरकार गिरने की संभावना ने प्रदेश के जनसेवक की वातानुकूलित नींद में खलल डाला ।
उन्होंने निश्चय किया-स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते देश के नौनिहालों की चिंता में दुबले होना उनका परम कर्तव्य है । देर आए, दुरुस्त आए । अब वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के प्रत्येक सरकारी स्कूल का दौरा करेंगे । एक-एक विद्यार्थी से प्रत्यक्ष भेंट कर उनसे सीधा संवाद करेंगे । खूब धाक जमेगी । बच्चों से सीधे संवाद के मायने हैं सीधे माता-पिता से संवाद; उनके कौटुंबिक जनों से संवाद ।
जनसेवक अपने लाव-लश्कर के साथ एक स्कूल पहुंचे ।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रार्थना समाप्त होते ही बच्चों के कक्षा में जाने से पूर्व जनसेवक ने वात्सल्य से सराबोर स्वर में बच्चों को संबोधित किया :
“मेरे प्यारे बच्चों! अपने आस-पास के परिवेश को स्वच्छ रखना बहुत जरूरी है! मगर उससे भी ज्यादा जरूरी है-स्वयं को स्वच्छ रखना! ‘स्वच्छ रहोगे तो स्वस्थ रहोगे’ पाठ तुमने अपनी किताब में पढ़ा होगा ।”
बच्चों ने कौतुक-भाव से एक-दूसरे का मुंह ताका । किताब का मुंह देखा होता, तब न पाठ पढ़ते!
जनसेवक ने उनके खुले मुंहों को नजरअंदाज किया । धुर देहाती लौंडों की बदतमीजी के क्या मुंह लगें । वे यहां उनके खुले मुंहों को बंद करवाने के लिए तो आए नहीं हैं । जिस उद्देश्य से आए हैं, उसी की ओर बढ़े, वे बढ़ लिए ।
उन्होंने गला खंखारकर साफ किया-
“स्वयं को स्वच्छ नहीं रखोगे तो परिवेश की स्वच्छता निरर्थक है। हां तो बच्चों, स्वयं की स्वच्छता के मायने हैं, अपने शरीर की स्वच्छता, साथ ही कपड़े-लत्तों की स्वच्छता । अस्वच्छता घोतक बीमारियों की जननी है । बीमारियां जानलेवा भी हो सकती हैं । अधिकांश चर्मरोग शारीरिक अस्वच्छता के चलते ही होते हैं । समय रहते सावधानी बरतनी निहायत जरूरी है।”
“बोलो, क्या जरूरी है?”
“बोलो, बोलो, शर्माओ नहीं ।”
“सावधानी बरतनी निहायत जरूरी है।”
मरियल स्वरों ने एक-दूजे का हाथ गहा । जनसेवक के चेहरे पर चमक दौड़ गई ।
“तो कौन-सी सावधानी बरतनी चाहिए?” प्रश्न के साथ उन्होंने स्वयं जवाब दिया-“नियमित रूप से शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए । शरीर के ढके रहने वाले अंगों की विशेष रूप से सफाई करनी चाहिए । गर्दन-कानों के पीछे आदि की सफाई कम महत्त्वपूर्ण नहीं…समझ में आया कुछ?”
प्रधान अध्यापक के निर्देशानुसार बच्चों ने जनसेवक के भाषण का जोरदार तालियों से स्वागत किया ।
गद्गद होकर जनसेवक ने कार्यक्रम के अगले चरण की घोषणा की कि वे पाठशाला के प्रत्येक विद्यार्थी को अपने करकमलों से एक बट्टी नहाने का साबुन, एक बट्टी कपड़ा धोने का साबुन संग खादी का बढ़िया-सा अंगोछा भी उपहारस्वरूप भेंट करेंगे ।
महीने-भर बाद वे पुनः इलाके के सभी स्कूलों का दौरा करेंगे और प्रत्येक विद्यार्थी से भेंट कर उससे जानना चाहेंगे कि उसने शारीरिक स्वच्छता के उस पाठ पर कितना अमल किया है ।
कौतूहल से भरे बच्चों ने अंगोछे पर रखी पन्नी में लिपटी साबुन की बट्टियों को ललककर अंजुरी में इस तरह भर लिया, मानो किसी ने इमरतियों से भरे दोने उनके हाथ में रख दिए हों ।
एकाध उतावले बच्चे ने अपनी जगह पर पहुंचते-पहुंचते नाखून से पन्नी में सेंध लगा, बट्टियों को छूने-टोहने की कोशिश की, और फिर उस नाखून को गूजी-भरी नाक तक ले जाकर उसकी महक नाक में भरने की कोशिश की ।
वायदे के अनुसार, महीने भर बाद जनसेवक मुआयने के लिए उसी स्कूल में पधारे-लगातार सुर्खियों में रहकर सुर्ख हुए-से ।
जनसेवक को देख बच्चों की आंखों में चमक कौंधी । मगर उनके साथ गत्ते के खोखे नदारद पा वे कोयला-पुती पाटी-से कुम्हला गए।
जनसेवक ने क्रमवार बच्चों को अपने पास बुलाना शुरू किया। उनके चीकट-भरे सिर को प्यार से सहलाते हुए उनसे पूछा कि साबुन का उपयोग उन्हें कैसा लगा…मजा आया न!
…मगर उसके कपड़े इतने मैले क्यों हैं? दुर्गंध छूट रही है..
जवाब में दर्जनों बच्चे अटूट मौन साधे खड़े रहे । उनकी आंखें पांवों के अंगूठों से जा लगीं और अंगूठों के संग पाठशाला का गोबर-लिपा फर्श कुरेदने लगीं । बड़ी मुश्किल से कुछ ने साहस किया । उन्होंने बताया कि बट्टियां और अंगोछे उनकी माई ने उनसे झपट लिए। पता नहीं, माई ने उनका क्या किया?
जनसेवक परेशान हो गए । क्या पढ़ेंगे ये खाक! मामूली-सी बात सीखने को तो ये राजी नहीं । बहानों में सारे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो रहे हैं!
तभी पास आए तीसरी कक्षा के विद्यार्थी, अपेक्षाकृत साफ-सुथरे दिख रहे सतीश ने उनकी हताशा को कंधा दिया ।
गर्जन-तर्जन के लिए व्याकुल स्वर में बरबस मिठास घोल उन्होंने पूछा, “चलो, तुम बताओ सतीश! खूब नहाए न तुम साबुन से?”
सतीश की गरदन टूटी टहनी-सी झुक गई ।
“शरमाओ नहीं, सतीश…बोलो!”
सतीश चुप ।
“भाई, हम तुम्हारी माई और बाबू की तरह ही हैं । झिझको नहीं ।”
सतीश की हिम्मत बंधी । उसका सहमा चेहरा ऊपर उठा ।
“साबुन की बट्टी…बट्टी अऊर अंगोछा माई पंसारी की दुकनवा में ले जाके बेच आई!”
“बेच आई? भला क्यों?” जनसेवक की त्यौरियां चढ़ गईं ।
“माई बोली…सरकार खूब मजाक करत हैं-नहा-धोके पेट थोड़ेइ भरने वाला है ।” “मतलब?”
“माई कहत रही… बट्टी अऊर अंगोछा के दाम से दू रोज का पिसान आएगा… तू नहाएगा कि रोटी खाएगा?”
