विपदा-जीवित-है

खद्दर का मैला-कुचैला सा कुर्ता, उसके ऊपर वास्कट, नीचे काले रंग की पैंट और बाहर से काली त्यूंखी पहने हुये बड़ा मायूस सा चेहरा। उम्र यही कोई 35 वर्ष के लगभग, किन्तु वेशभूषा वृद्धों जैसी। ठीक मेरी दाहिनी ओर बैठा था वह व्यक्ति। उसके बगल में बैठा था उसी की वेशभूषा का उसका साथी।

बस में भारी भीड़ थी, कहीं भी पांव रखने की जगह न थी। मुझे खड़ा देख अपने साथी से सटकर बैठने को कहते हुए मुझ से बोला-

‘ऐ बाबू जी ! बैठ जाओ।’

‘नहीं, आप लोग आराम से बैठ जाओ, कोई बात नहीं।’ मैंने औपचारिकतावश कहा।

‘अरे नहीं बाबू! ये ठीक बात नहीं, आप बाहर से आये मेहमान हैं। हमको तो बस यहीं आगे तक जाना है। आपको तो दूर जाना होगा।’ उसने कहा।

मैं उसका आग्रह नहीं टाल सका। दो आदमियों की सीट थी, फिर भी मैं उसके बगल में बैठ गया। मेरे हाथ में सूटकेस था, उसे किसी तरह मैंने सीट के नीचे फंसा लिया।

वे दोनों एकटक मुझे देख रहे थे, मानो उनके लिये मैं किसी अन्य ग्रह से आया हुआ प्राणी होऊँ। मुझे लगा कि वे मुझसे कुछ पूछना चाहते हैं, लेकिन पूछ नहीं पा रहे हैं।

मैंने ही पहल की- ‘कहां से आ रहे हैं?’

‘गैरसैंण से!’ उसने जवाब दिया।

‘जाना कहां है?’ मैंने अगला सवाल किया।

‘वकरोड़ा गांव’

‘कितनी दूर है यहां से?’

‘अगले स्टेशन पर उतरना है, फिर चार किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़नी है।’

‘चार किलोमीटर पैदल!’ मैंने आश्चर्य व्यक्त किया।

‘हां, कोई ज्यादा नहीं है।’ उसने ऐसे कहा मानों चार किलोमीटर की चढ़ाई चार मीटर हो।

‘ज्यादा नहीं है मतलब?’ मैंने फिर आश्चर्य किया।

‘मतलब इतना तो हम रोज ही पैदल चलते हैं। घास लकड़ी के लिये या जानवरों को चुगाने के लिये।’ उसने स्पष्ट किया।

मुझे विश्वास तो नहीं हो रहा था, किन्तु वह सच बोल रहा था। गैरसैंण काफी पिछड़ा क्षेत्र है। अभी तक गांवों में पूरे जीवनोपयोगी साधन नहीं पहुंच पाये हैं। सड़कें तो बहुत ही कम हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं की पहाड़ के हर गांव को अभी आवश्यकता है। यह बात पिछले एक महीने से मैं लगातार देखता आ रहा था।

पौड़ी से एक अखबार निकालना शुरू किया था मैंने। और उसी के संदर्भ में पहाड़ के लगभग सभी जिलों में मुझे भ्रमण करना था। पिछले एक महीने से मैं लगातार भ्रमण पर था, अब तक चमोली और पौड़ी जिले के हर विकास खण्ड तक मैं घूम आया था।

सारे कस्बों और बाजारों में घूमकर मैंने अखबार भेजने और समाचार संकलन की व्यवस्था पूरी कर ली। कल मैं गैरसैंण पहुंचा था, और आज मुझे वापस पौड़ी लौटना था।

मैंने बातों का क्रम पुनः आगे बढ़ाया- ‘तो आप लोग प्रधान होंगे और ब्लाक से आ रहे होंगे?’

‘अजी नहीं बाबूजी ! प्रधान ऐसे होते हैं क्या? हम तो गरीब लोग हैं।’ उसने उत्तर दिया।

‘तो क्या करते हैं, आप दोनों?’

‘खेती करते हैं।’

‘खेती में क्या-क्या फसल होती है?’ मैंने फिर पूछा।

‘सभी कुछ होता है धान, मण्डुआ, झंगोरा, गेहूं और अपने गुजर-बसर के लायक थोड़ी बहुत दालें भी।’ उसने बताया।

मुझे उसकी बातों में रुचि आ रही थी। मैंने आगे पूछा- ‘बैल होंगे?’

‘हाँ वही तो हमारे सब कुछ होते हैं, नहीं तो खेती कैसे कर पायेंगे।’

‘गाय-भैंस भी तो होगी?’

‘न तो गाय है और न भैंस। मेरे बच्चे तो बिना दूध के ही पल रहे हैं।’ उसने बेझिझक कहा और फिर अपने साथी की ओर इशारा करते हुये कहा- ‘इसके पास तो है भैंस।’

मैंने देखा उसके साथी ने उसे कोइनी मारी, शायद उसे मेरा उसका आपस में बातचीत करना अच्छा नहीं लग रहा था या फिर वह नहीं चाहता था कि उनके घर, गांव और परिवार की कोई समस्या अजनबी आदमी को बताई जाये। कोहनी का संकेत शायद वह समझ गया था, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उसकी और आंखें तरेर कर कहा- ‘क्या है यार! झूठ बोल रहा हूं कोई?’

उसका साथी लज्जित हो गया और नजरें घुमाकर बाहर खिड़की की तरफ देखने लगा। मैं उससे और अधिक सवाल करना चाहता था, ताकि पर्वतीय जनजीवन की अधिक से अधिक जानकारी जुटा सकूँ।

सच तो यह है कि अखबार निकालने का मेरा मुख्य लक्ष्य भी यही था। अखबार को केवल खबरों वाला कागज न बनाकर मैं उसे आम जनजीवन की समस्याओं, कठिनाईयों और दुःख-दर्द का एक चिट्ठा बनाना चाहता था। मैं चाहता था कि समाज में ऊँची कुर्सियों और ऊँचे ओहदों पर बैठे लोग इस अखबार के माध्यम से गरीब और दबे-कुचले समाज की आवश्यकताओं और समस्याओं को समझ सकें।

इसके लिये मुझे अधिक से अधिक लोगों से जनसम्पर्क करना था, दूर-दराज के गांवों में जाकर समस्याओं ओर आवश्यकताओं को समझना था और विगत एक माह से मैं यही सब कर रहा था।

मैंने बात आगे बढ़ाई- ‘आजकल तो सरकार गाय-भैंस और बैलों को खरीदने के लिये गांव वालों को पैसा दे रही है।’

‘दे रही होगी।’ उसने रूखा सा जवाब दिया।

‘आपको पता नहीं है?’ मैंने उसे कुरेदा।

‘अरे बाबू जी! हम तो गरीब लोग हैं, हमें कौन बतायेगा। सरकार की सारी योजनायें तो अमीरों के लिये होती हैं। गरीबों के लिये कौन करता है कुछ।’ उसके स्वर में आक्रोश था।

‘लेकिन ये पैसा तो गरीबों के लिये ही है।’

‘होगा।’ उसका संक्षिप्त सा उत्तर था।

‘लेकिन आपको पता नहीं है?’ मेरा फिर वही प्रश्न।

‘पता भी हो तो क्या करना है। गरीबों के लिये तो योजनायें हजार हैं, लेकिन बिचौलिये सब कुछ खा रहे हैं। उन्हीं लोगों को पैसा देते हैं जिनके पास उनको देने के लिये कुछ होता है। हमारे पास तो बाबू जी एक भी पैसा नहीं है। खेती में कड़ी मेहनत और मजदूरी करने के बाद बड़ी मुश्किल से परिवार की रोजी-रोट चलती है। फिर किसी को पैसा कहाँ से देंगे। यदि उन्हें दे भी दिया तो बाल-बच्चे भूखे नहीं मर जायेंगे?’ उसने अपनी पूरी पीड़ा व्यक्त कर दी।

मैंने देखा उसके साथी ने इस बार फिर उसको कोहनी मारी। कोहनी ही नहीं मारी बल्कि धीरे से गढ़वाली बोली में फुसफुसाया भी- ‘क्यों रामायण सुना रहा है?’

वह शायद मुझे बाहर का कोई बड़ा आदमी ही समझ रहा था, किन्तु मैं तो गढ़वाली ही हूँ, समझ गया कि वह क्या कह रहा है। फिर भी मैंने अनजान बनते हुये पूछा- ‘क्या कह रहे हैं यह?’

‘कुछ नहीं!’ उसने बात टाल दी।

‘मैं तुम्हें भैंस के लिये लोन दिलाऊंगा, अगर तुम हाँ कहो तो…..?’ मैंने उससे कहा। उसने शंका की दृष्टि से मुझको देखा।

‘लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।’

‘किसलिये?’

‘आपको देने के लिये।’ वह बोला- ‘लोन दिलाने के लिए तो बहुत लोग कह रहे हैं। आज हम गैरसैंण ब्लाक से ही आ रहे हैं। लोन लेने ही गये थे, लेकिन सबको पहले पैसा चाहिये।’ सपाट स्वर में बोला था वह।

अब सारी कहानी मेरी समझ में आ गई थी। वह शायद मुझको भी कोई दलाल या बिचौलिया समझ रहा था। मैंने उसकी पूरी पीड़ा और आक्रोश समझ लिया था। कल के अखबार के लिये मुझे अपनी ‘लीड न्यूज’ मिल गई थी। मैंने तुरन्त उसकी बात का खण्डन किया- ‘मुझे पैसा नहीं चाहिये और न तुम्हें ही किसी को पैसा देना पड़ेगा। बोलो………?’

उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा। हाँ या ना कहने के बजाय उसने पहली बार प्रश्न दाग दिया- ‘आप कौन हैं? क्या करते हैं?’

‘मैं पत्रकार हूँ।’

और मेरा उत्तर सुनकर उसके चेहरे पर एक चमक उभर आई। कण्डक्टर ने सीटी बजाई- ‘पाली वाले जल्दी से उतर जाओ।’

वह खड़ा हो गया। साथ में उसका साथी भी उठ गया। उसने यकायक दोनों हाथों से मेरे दोनों हाथ थाम लिये व बोला, ‘बाबू जी आप मुझे लोन मत दिलाइये। मुझे नहीं चाहिये लोन, लेकिन हम गरीबों की कहानी आप अपने अखबार में अवश्य छाप दीजिये। छापेंगे, न ?’

वह बहुत भावुक हो गया था। मैंने उसे आश्वस्त किया- ‘जरूर छापूंगा। पौड़ी जाकर पहला काम यही करूंगा।’

हम कुछ और बातें करते, इससे पहले ही कण्डक्टर गरजा-

‘जल्दी उतरो’ और वह दोनों उतर गये। जाते-जाते मैंने उससे पूछा- ‘तुम्हारा नाम क्या है?’

‘विपदा!’ उसने जाते-जाते बताया था।

मैं खिड़की की तरफ बैठ गया। बस चल पड़ी थी, मैंने पीछे की ओर मुड़कर देखा दूर तक वह मुझे कातर नजरों से देखता रहा।

तब से बीस वर्ष गुजर चुके हैं। मैंने रोज अपने अखबार में गरीबों और गाँव की समस्याओं और आवश्यकताओं को अपनी पहली खबर बनाया। आज तक लगातार लिख रहा हूँ। विपदा तब से आज-तक पुनः मुझे नहीं मिला। वह अब जीवित होगा भी या नहीं, मुझे नहीं मालूम! लेकिन मेरे हृदय में आज भी विपदा जीवित है, जो आज भी मुझे असहाय, बेवस व गरीबी का संत्रास झेल रहे विपदा जैसे हजारों-हजार मानस जाति के लिए कुछ कर गुजरने का सम्बल प्रदान करते हुये सदा प्रेरित करता रहता है।

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