पसीने से नहाए हुए वह जेठ के तपते सन्नाटे को दरवाजे पर छोड़ देहरी लांघने को ही हुआ कि एकाएक ठिठक गया । किसी के उबकाने के तीखे-तीखे स्वर करेरे-करेरे-से खिंच रहे सुनाई दिए । लगा कि भीतर मथती उमथाहट कलेजे समेत बाहर आ जाना चाहती है, लेकिन मुंह तक आते-आते पनियाती पलट पड़ती है। कौन हो सकता है? अनी? अनी ही होगी शायद । सुबह कॉलेज के लिए तैयार होते समय उसने भूमिका बांधी थी-“लो, भुगतो! आठ-दस दिन ऊपर हो रहे हैं ।”

अविश्वास से भरकर उसने अनी की ओर देखा था-“तुम्हें गलतफहमी हो रही है!”

“यकीन करो ।”

“कैसे? कहीं तारीख तो गड़बड़ नहीं कर रहीं?”

“गड़बड़ कैसी? साफ तो है । चौदह को होली जली थी, पंद्रह को रंग चला । उसी रात की तो बात है, याद करो । पंद्रह से पंद्रह महीना हो गया कि नहीं! आज अट्ठाइस है । फिर मुझे तो हर बार पांच दिन पहले ही…”

“हम तो पूरी सावधानी बरतते हैं!” वह परेशान हो आया ।

“फालतू बात मत करो…सब था? कितना मना किया, पर माने? अपने-आपको बड़ा पहुंचा हुआ जानकार समझते हो…कुछ नहीं होगा । ये दिन बड़े सुरक्षित होते हैं..अब?”

“अरे नहीं, सब ठीक होगा ।” उसे आश्वस्त करने के बहाने उसने स्वयं आश्वस्त होना चाहा, “कुछ रोज और रास्ता देख लो ।”

“सोच लेना, कोई बात है ही तो देरी करना उचित नहीं होगा न ।”

“कॉलेज से लौटकर बात करता हूं ।” कहते हुए वह तत्परता से सीढ़ियां उतर गया था ।

उसका अनुमान सही निकला । आवाज नहानघर से ही आ रही थी ।

खमसारों से गुजरता हुआ वह नहानघर की ओर बढ़ा । कराहता हुआ स्वर स्पष्ट होने लगा । तबीयत बेहद बिगड़ी हुई है और पूरा घर है कि चिराया हुआ पड़ा है। ठंडा ढूंढ-ढांढ़कर सब आराम से लंबी ताने सो रहे होंगे। आवाज कानों में पड़ी भी होगी तो उन्हें क्या मतलब। किसी को किसी की फिकर नहीं इस घर में । अम्मा को तो बहुओं से वैसे भी लगाव नहीं दिखता बस रातदिन आजी की सेवाशुभूषा में जुटी रहती हैं! जब से आजी का हगना-मूतना खटिया पर चल रहा है, वे अन्य दायित्वों से निर्लिप्त हो गई हैं।

नहानघर के निकट पहुंचकर वह अनी को लगभग पुकारने ही वाला हुआ कि सहसा अम्मा को नहा पर बैठी देख सकते में आ गया । अम्मा की डिगहाई धोती का पल्ला नहा की उघड़ी हुई फर्श पर सिमटे जमे पानी में बेतरह लिथडा रहा था । हमेशा घूंघट में छिपे रहने वाले उनके अंगुलभर खिचड़ी बाल रिबन बंधी चुटिया में गरदन के नीचे झुकने और फिर ऊपर उठने की प्रक्रिया में उठ-बैठ रहे थे । बेहाल-सी वे ‘थुह’ ‘थुह’ करती मुंह की पनियाहट थूक रही थीं ।

उसे जैसे बिजली का तार छू गया वह एकदम से पलटा । दिमाग में द्वंद्व की हाथापाई होने लगी। कहीं…? दूसरा खयाल पुख्ता ही नहीं हुआ। हो सकता है अम्मा गरमी खा गई हों या खाने-पीने में गड़बड़ हो गई हो। हैजा भी तो बुरी तरह फैला हुआ है आजकल इस इलाके में ।

अम्मा का ढाई साल पुराना स्वरूप उसकी आंखों के आगे नाचने लगा । शन्नो का अस्तित्व समेटे उनका पेट डबलरोटी-सा फूल आया था । उसे अम्मा चलती हुई नहीं लुढकती हुई महसूस होतीं । ठमके कदम ने उनकी बेडीलियत की रही-सही कसर भी पूरी कर दी थी । उन पर जब-जब निगाह पड़ती, वह शर्म और संकोच से सिकुड़ने लगता । सामने पड़ जातीं तो उसकी पूरी कोशिश होती कि वह कन्नी काटकर निकल जाए। वे रोक ही लेतीं और कुछ कहने को होतीं तो वह ‘हूं-हां’ करने में भी अजीब दिक्कत महसूस करता। दृष्टि कभी अलगनी पर फैले फड़फड़ाते कपड़ों पर झूलने लगती या खमसारो के प्लास्टर-झरे गोल खभों से लिपट जाती।

उन दोनों के मध्य मौजूदा हालत कोलेकर तनाव की शुरुआत की खुल्लमखुल्ला अभिव्यक्ति का वह पहला दिन था, जब पहली मर्तबा उसने अपना विरोध अम्मा पर यू जाहिर किया तनख्वाह मिलते ही घर के हिस्से की किस्त उसने अनी के हाथो उनके पास भिजवाई। क्रुद्ध अम्मा ने नोट उठाकर अनी के मुंह पर दे मारे। घबराई हुई अनी ने अपनी स्थिति स्पष्ट की थी-‘उन्होंने दिए, मैंने आपको लाकर दे दिए । मैं बीच में कहाँ आती हूं । ऊपर बैठे हैं । चलकर बात कर लीजिए। न लेने हों तो उन्हें ही रुपये लौटा दीजिए।’

लेकिन अम्मा ने उसकी एक न सुनी। चीख-चीखकर पूरा घर सिर पर उठा लिया था-‘अब कहने-सुनने को बाकी ही क्या रह गया है। जूते लगाने-भर की कसर रह गई है, सो वह भी छाती जुड़ा ले आकर…’

अम्मा के व्यवहार से आहत अनी आवेश से कांपती हुई कमरे में घुसी और पलंग पर ढेर हो, फूट-फूटकर रोने लगी थी। उसने सारा प्रकरण सुन लिया था। बेवजह ही प्रताड़ित हुई थी । मनाने के लिए आगे बढ़ा तो वह तमककर हाथ झटकते हुए बोली, “छूने की कोशिश की तो अटारी से नीचे कूद जाऊंगी। मां -बेटे के नाटक से मुझे क्या सरोकार। जो कुछ कहना-सुनना है, खुद हिम्मत क्यों नहीं करते? मेरी फजीहत क्यों करवाते हो? आगे से मुझे बीच में धकेला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।

ऊपर अपने कमरे में पहुंचकर देखा, अनी कोहनी आंखों पर रखे चित सो रही थी, दाहिनी बांह से शन्नो को बगल में सिमटाए हुए । बदरिया के बच्चे-सी चिपटी पड़ी अबोध शन्नो के शमीज का घेरा और घुंघराले बालों के बेतरतीब छल्ले टेबल फैन की तपती तेज हवा में फरफरा रहे थे गहरे कत्थई रंग की झालरवाली कच्छी कमर से कुछ नीचे खिसकी हुई उसके गोल-मटोल वजूद को मासूमियत से सराबोर कर रही थी।

जमुनापारिन बड़ी भाभी जब-तब ठिठोली करती हैं-‘कुछ भी कहो, लाला। यह पेटपोछन हू-ब-हू गई तो तुम पे ही है । पुतलियों का भूरा रंग तक नहीं छोड़ा ।’

कई बार मन हो आया कि सोती हुई शन्नो की पलकें उठा पुतलियों का रंग देखे। क्या वाकई उसकी पुतलियां भूरी है? हू-ब-हू उसी-सी? एक किलकती ललक दुराग्रह को पीछे धकेल, उससे विद्रोह कर सिर उठा लेती कि उसकी रिबन-बंधी नन्हीं-नन्हीं चुटियों को पकड़कर वह झकझोर दे, गालों पर चुटकी भर ले नहीं हथेलियों पर-‘चिर्रो-मिर्रो, बुलाकर कांख में गुदगुदा दे…रक्तिम कानों की लवों को जी भरकर चूम ले । लेकिन पता नहीं क्यों अचानक शन्नो शून्य में परिवर्तित हो जाती और उसकी लालसा को सहसा अम्मा का डबलरोटी-सा फूला पेट ढक लेता। शन्नो की ओर बड़े हुए हाथ उसे छूने से पहले ही ठिठक जाते । एक अवश तिलमिलाहट उस पर तारी होने लगती और क्षुब्ध हो वह अपने ऊपर सैकड़ों राक्षसी अट्टहासों का उपहास अचानक मसक रही छत-सा मरमराया हुआ महसूस करता। उसे लगता कि कभी आवेशवश हाथ शन्नो की ओर बढ़ ही गए तो उंगलियों में नन्ही देह की दुधाई सुगंध नहीं, एक जहरीली लिसलिसाहट चिपक जाएगी, जो धीरे-धीरे उसकी पूरी देह को कुकुररखाज से भर देगी।

छह भाई-बहनों में वह सबसे छोटा था । अब नहीं रहा । शन्नो ने उसे इस एकाधिकार से वंचित कर दिया । उसे अच्छी तरह याद है। वह आठेक साल का रहा होगा जब काकी को पुष्पा हुई थी । बचपन की धुन्नू! सौर के मुहारे खड़े-खड़े वह उस गोलमटोल गुड़िया को चार-पांच रोज अकसर गौर से लगातार देखता रहा था और उसे गोद में खिलाने को व्यग्र हो उठा था । सभी ने उसे डरा-धमका रखा था कि न तो वह सौर के भीतर ही घुसे और न ही बच्चे को छुए। किंतु एक दोपहर जब सभी अपने-अपने ठौर-ठिकाने पड़े सुस्ता रहे थे और धुन्नू को बगल में लिटाए काकी भी झपकियां भर रही थीं, वह पट् से सौर में घुस गया और बंदर की भाति धुन्नू को गोद में उठा दुछत्ती में जा छिपा । धुन्नू न रोती तो वह बड़ी देर तक उसकी चुम्मियां लेता रहता और उसके छोटे-छोटे रुई के फाहों-से नरम गुलाबी पैरों को अपने गालों से सड़ता रहता…

पकड़े जाने पर बड़ी बुआ ने धुन्नू को उसकी गोद से छीन, उसकी हिमाकत पर बेरहमी से तड़ातड़ गाल चटखा दिए थे । अम्मा ने आगे बढ़कर उसे छुड़ा लिया था । बड़ी देर तक वह उनसे लिपटा हिचकियां भरता रहा । उसकी समझ में नहीं आया कि यह कौन-सी रीत है कि एक बच्चा सामने लेटा हुआ है और उसे छुआ नहीं जा सकता, खेलाया नहीं जा सकता?

उसने अम्मा से सवाल किया था, “काकी, बचिया कहां से लाई?”

“बाजार से खरीदकर ।”

“तो तुम भी मुझे एक धुन्नू खरीद दो । मैं काकी की धुन्नू को कभी हाथ नहीं लगाऊंगा!” उसने रोष से भरकर कहा ।

“ठीक है, ला दूंगी, जरा पैसे जोड़ लूं । खूब लगते हैं ।” अम्मा ने उसे बहलाया । मगर कुछ ही दिनों बाद वह अपनी जिद भूलकर मस्त हो गया । फिर धुन सौर से बाहर आ गई और उसे न छूने की सारी वर्जनाएं टूट गईं ।

वर्षों बाद जब नितांत अपनी धुन, की कामना का बाल-सुलभ हठ वास्तविकता में अंकुरित होने लगा तो इस उम्र में छोटी बहन पाने की कल्पना मात्र से वह लज्जित हो उठा । सबसे बड़ी जिज्जी चार बच्चों की मां थी, जो अपनी बड़ी बेटी रंजना के हाथ चार साल पहले पीले कर चुकी थी । रंजना से छोटे उमेश की शादी उसी साल हुई, जिस साल उसका तिलक चढ़ा । तभी जिज्जी उसके ब्याह में नहीं आ पाई । बड़े और मंझले भैया के बच्चे कॉलेज जाने लगे । गीता और सुषमा क्रमशः एक और दो बच्चों की माएं बन गई । खुद उसकी शादी का चौथा साल चल रहा है । बच्चे नहीं हुए तो सिर्फ इसी वजह से कि उसने और अनी ने फिलहाल चाहे नहीं ।

शादी की पहली रात को ही उन्होंने तय कर डाला कि जब तक वह अपनी थीसिस पूरी कर दाखिल नहीं कर देता और किसी डिग्री कॉलेज में प्राध्यापक नहीं बन जाता, वे संतान के विषय में कतई नहीं सोचेंगे । भूले-भटके कहीं कुछ गड़बड़ हो ही गई तो ‘सफाई’ करवा लेंगे ।

“आगे नहीं हुए तो?” अनी ने संशय प्रकट किया ।

“अनाथालय से गोद ले लेंगे ।”

तब अनी केवल मैट्रिक पास थी और वह उसे आगे पढ़ाने का इच्छुक था । शादी के बाद उसने फर्स्ट इयर की परीक्षा में अनी को प्राइवेट कैंडीडेट के रूप में बिठवाया । पढ़ने में भी उसकी भरसक सहायता की; नतीजन सारी घरेलू अड़चनों और बंधनों के बावजूद वह पास हो गई । फिर तो वह उत्साह से भर गई और स्वयं परिश्रम करने पर उतर आई । कस्बई सपनों के दायरों में महासागर का विस्तार जड़ें जमाने लगा । इंटर भी हो गया । अब बी.ए. की तैयारी हो रही है ।

एक अम्मा हैं, न कुछ सोचना चाहती हैं, न समझना । दकियानूस! बच्चा पैदा करने की मशीन! दूसरों की भावनाओं की कद्र करना उन्हें आता ही नहीं । ऊपर से फूहड़ ठिठोलियों में रस लेती और आनंदित होती उनके भीतर की बेलिहाज, बेशर्म स्त्री! सामने जवान बेटा खटिया पर बैठा हो तब भी संकोच न करना। कोई खयाल करतीं तो नाउन काकी को झिड़क देतीं । आजी को इशारा कर देतीं ।

वे आंगन में दुबके सर्दियों के दिन थे । मांसपिंड के रूप में आकार लेती शन्नो के दिन । गुनगुना घाम था । खटिया पर आराम से वह ‘थीसिस’ से संबंधित संदर्भ पुस्तक पढ़ने में लीन घाम सेंक रहा था कि सहसा नाउन काकी की पारखी चुहल ने उसकी तन्मयता भंग की-

“अई, दुलहिन, तुरुक कुछ है का?” नाउन काकी ने बड़े फूहड़ तरीके से अनी के पेट पर हाथ फिराते हुए सप्रश्न उसे देखा ।

प्रत्युत्तर में शर्म से दोहरी होती हुई अनी बगैर जवाब दिए ही भीतर भाग ली । इस अशालीन चुहलबाजी के चलते उसके कान तप आए। नजरों को जबरदस्ती किताब में अटकाए रखना मुश्किल महसूस हुआ । परंतु एकाएक उठ भी नहीं पाया । घाम सेंकना बड़ा भला लग रहा था ।

तभी नाउन काकी का दूसरा जुमला उसे चौंकाता पहाड़ से नीचे ढकेल गया, “बधाई हो जिया! सास-बहुरिया का ‘जापा’ एकै सौर में निपटि जाई।” फिर उसकी और कटाक्ष कर हंसी, “हम तो तुमसे नेग में लायलोन की दुइ साड़ी लेबे, छोटू! एक मेहरिया कै, एक महतारी कै । अंटी कसे रहो!”

“छिनार! वहिसे नेग-नेगार की बातें काहे करित हय? अरे, दे-ले वारी अबै तो हम जिंदा बैठी हन । यहि देहरी की पुरखिन!” आजी की पोपली हिनहिनाती आवाज से उत्साह छलछलाया-“पोता-परपोता साथ होई तो तोहिका बनारसी पहिरैबै । एक बात बता, भिकुआ की महतारी, छोटू की बहुरिया के सच्ची कुछौ हय?”

जवाब अम्मा ने दिया । पटरे पर बैठी वे कद्दूकश पर घिया कस रही थीं-“मोरी नाउन काकी कै बातें…कुछ नहीं है वहिके ।” और आंखें मिचकाकर हंसने लगी थीं, “झूठी-फुरी लगावा करती है ।”

“चलो, झूठी-फुरी ही सही । तुम अपनी कहो । तोहार कौन महीना है, दुलहिन?” नाउन काकी ने अम्मा से सच्चाई जाननी चाही ।

“तीसरा ।” जवाब आजी ने दिया, “छोटू कै पीठ भागमान है ।”

फिर ‘खू, खू, खू, खू’ खांसने लगी । खांसी हलकी हुई तो उत्साह से भरी बोली, “उतरत बैसाख तक जाई । कै दुलहिन?”

बैठना दूभर हो उठा । अम्मा ने उसके लिए चूल्हे पर चाय चढ़ा रखी थी । सुबह आंगन में धाम सेंकना और लगातार चार-पांच कप चाय पीना ही छुट्टी की सुबह का उसका प्रिय कार्यक्रम होता ।

उसे उठ के जाता देख अम्मा ने पीछे से आवाज लगाई?

जवाब उसने नाउन काकी को दिया, “चाय ऊपर भिजवा दो, काकी।” एकाएक लगा कि अम्मा किसी फूले पेटवाली सुअरिया की काया में प्रविष्ट हो गई हैं और सुअरिया अपनी थुलथुल देह हिलाती मैले की ढेरियों की ओर बढ़ रही है ।

घिनाकर किताब उसने पलटकर परे रख दी । पढ़ नहीं पा रहा, पढ़ भी नहीं सकता । बस पैरों पर रजाई डाले, लेटे-लेटे छत की धन्नियां घूरता हुआ सोचता रहा कि आखिर इस अधेड़ उम्र में अम्मा को यह क्या सूझी? मृदा-बुढ़ऊ शर्म-हया घोंटकर पी गए । उसी रात उसने अनी से कहा, “एक काम करो, तुम अम्मा को समझातीं क्यों नहीं?”

“क्या समझाऊं?”

“यही कि…” वह कह नहीं पा रहा था । इस संदर्भ में किसी भी तरह की बातचीत उसे असमंजस में डाल रही थी ।

“यानी?”

“तुम तो उठ के भाग आई । आजी बता रही थीं कि अम्मा को तीसरा महीना चल रहा है ।” उसने अपने तात्पर्य की भूमिका बांधी, “सबके सामने बात जाएगी तो लोग-बाग क्या सोचेंगे कि उधर बच्चों के बच्चे हो रहे हैं, इधर अधेड़ मां बिया रही है । छिह! उचित यही होगा कि अम्मा फौरन सफाई करवा लें । बस एक दिन का तो काम है । खर्चा भी ज़्यादा नहीं लगेगा । मैं दे दूंगा । तकलीफ कुछ होती नहीं । किसी को भनक भी नहीं लगेगी ।” वह सारी बातें, सारी घुमड़न एक ही सांस में कह गया । स्वयं पर अचंभा भी हुआ कि यही सब कहने की खातिर वह पूरे दिन मानसिक तनाव झेलता, छटपटाता, अनी से कहने की हिम्मत संजोता रहा था ।

“भला मैं किस मुंह से उनसे ऐसी बात करूं?” अनी ने संकोच से भरकर कहा, “अपनी महतारी को जानते नहीं?”

“तुम्हारी हिचक सही है, मगर उनसे कहना भी तो जरूरी है कि…”

अनी ने एक सुझाव दिया, “जो झिझक तुम्हारे आड़े आ रही है वही मुझे भी पस्त कर रही है । देखो, जिज्जी से उनकी पटरी बैठती है । तुम उनसे ही आग्रह क्यों नहीं करते कि वे अम्मा को इस बाबत समझाएं। वही इस घर में अम्मा से कुछ कहने की हिम्मत कर सकती हैं ।”

उसे अनी का सुझाव दुरुस्त लगा ।

सीढ़ियों पर ही था कि उत्तेजित अनी ने उससे फौरन कमरे में पहुंचने का इशारा किया और उसके भीतर आते ही किवाड़ भिड़ाकर उसने एक सांस में सारी घटना ज्यों-कीं-त्यों कह सुनाई थी-“गनीमत समझो कि तुम सामने नहीं पड़े । वरना अम्मा ने रो-चीखकर घर सिर पर उठा लिया, ‘अरे, वहि दहिजार कैर हिम्मत कैसे परी रे…बेटवा-बेटार तो सब भगवान का परसाद होत हैं । नहीं तो मनई तरसि जात है,

देवी-देवता मनावत है, कथा-भागवत सुनत है, टोना-टोटका करावत है । तीनेऊ पै औलाद नहीं नसीब होती और फिर, अबै तो जिया बैठी हैं छांह धरे…हमरे तीज-त्योहार करै वाली । नेग-न्योछावर धरे वाली । पैदा करि रहन हैं तौ का इन लठलुमड़न कै भरोसे! जिनका अपनी मेहरिन कै चूतड़ चाटै से फुरसत नहीं मिलती !”

“बड़ी जिज्जी की जो दुर्गति की अम्मा ने…तौबा!” भयभीत अनी ने आंखें निकाल कानों को हाथ लगाया-“अभी तक अम्मा अपनी कोठरी की कुंडी चढ़ाए भूखी-प्यासी भीतर बंद हैं । हमारे लिए एक चेतावनी है कि उससे कह दो कि जो तो उसे इस घर में सीधे-सीधे रहना है तो रहे, नहीं तो अपनी माई (अनी) को लेकर कहीं अलग ठौर-ठिकाना कर ले ।”

“भाड़ में जाएं!” क्षुब्ध हो वह भुलाया, “और दो-चार पिल्ले पैदा कर लें-मेरी बला से…बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम!”

अम्मा की अलग हो जाने की धमकी पर उसे याद आया कि शुरुआत में अनी को इस घर में तमाम असुविधाएं महसूस हुई थीं । नहानघर पर किवाड़ नहीं थे । ‘टट्टी’ के लिए रोज तड़के उसे लोटा लेकर खेतों में जाना पड़ता था । लौटकर बिसूरती, लड़ती कि यूं खुले में सरेआम नहाना कब तक संभव है? नहीं हो सकता । निरुपाय दरवाजे की आड़ बनाने के लिए वह एक भारी-भरकम खटिया खड़ी कर खुले हिस्से को ढक देती और उस पर चादर या धोती पसार देती, ताकि निस्संकोच होकर नहा सके । उसकी इस हरकत पर सभी मखौल उड़ाते, टीका-टिप्पणी करते कि परदे पड़े हुए हैं । इलाहाबादवाली बेगम साहब नहा रही हैं!

एकाध बार उसकी परेशानियों में खुद को रखकर सोचा तो वे उसे वाजिब भी लगीं और यह भी लगा कि पति होने के नाते अनी की तकलीफें नजरअंदाज करना गैर-जिम्मेदाराना हरकत होगी । मगर सभी तो उन्हीं परिस्थितियों में रहकर गुजर कर रहे हैं! इस तर्क ने उसे सदैव संयत रखा । यूं तो वह भगवत नगर में अपने कॉलेज के आस-पास एक या दो कमरे का अच्छा मकान कभी भी ले सकता है और आने-जाने की लंबी भागा-दौड़ी से भी बच सकता है, मगर इन कारणों और सुविधाओं के चलते अम्मा से अलग होने की कल्पना भी उसे असह्य प्रतीत होती । यही सोचता कि जब तक कोई अन्य बाध्यता उत्पन्न नहीं होती, वह अम्मा के पास रह ले । यूनिवर्सिटी में पहुंचने की जद्दोजहद तो जारी ही है। वहां नियुक्ति होते ही बाहर रहना उसकी मजबूरी हो जाएगी । तब ये तकलीफें खुद ही खत्म हो जाएंगी ।

बाद में कोई अशिष्ट कदम न उठाकर उसने इतना ही किया कि घर के माहौल से कन्नी काट स्वयं को अटारीवाले कमरे तक सीमित कर लिया । शन्नो पैदा हुई, उसे पता-भर चला । अम्मा अस्वस्थ हुई । भरतीपुर के डॉ. सिंह उन्हें देखने आए । अम्मा ठीक हो चलीं । वह थीसिस के सिलसिले को लेकर अधिक व्यस्त बना रहा । अनी शन्नो को कभी-कभार कमरे में साधिकार ले आती, बावजूद उसकी अनिच्छा के ।

मगर क्लेश से बचने के लिए वह उदासीनता ओढ़े रहता। वैसे भी जब वह पढ़ रहा होता या लिखने-लिखाने में व्यस्त होता, अनी शन्नो को कदापि ऊपर न लाती। दरअसल वह अनी को शन्नो से कुछ अधिक ही जुड़ता हुआ महसूस कर रहा था । लेकिन इस वात्सल्य-गठबंधन के निरंतर सुदृढ़ होते जाने के पीछे वह अपनी व्यस्तता को ही कारण मानता। ऐसा मानने से ही उसे तसल्ली मिलती। हालांकि कई दफे वह अपने-आपसे तर्क-वितर्क करता कि आखिर वह अपनी कुढ़न शन्नो पर क्यों निकालता है। उस मासूम का भला क्या दोष? मगर पाता कि वह अब तक उस अप्रिय स्थिति से उबर नहीं पाया है। शन्नो को देखते हो उसके दिमाग की नसे तमतमाने लगतीं । हथौड़े-से टनकने लगते । उसे लगता कि उसका पूरा घर अनपढ़, गवारों, उजड्डो, कमीनों और अविवेकियों का अड्डा है, जिसमें उसके जैसे शिक्षित का कोई स्थान नहीं ।

याद हो आई सहकर्मी शर्मा की शन्नो के जन्म पर दी गई बधाई। कोशिश करके भी वह अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाया। शर्मा का फूहड़ मजाक उसे भीतर तक छलनी कर गया-‘यार, मान गए तेरे दद्दा को । हमें तो इस उम्र में जड़ी-बूटी लेनी पड़ेगी…पर सच्ची बताना, यार। मजा आ जाता होगा, नहीं। ऊपर तुम लोग लगे रहते होगे और नीचे बुढ़ा-बुढ़ऊ।’

‘तुम छिछोरे…’ उसने आवेश से कांपते हुए शर्मा का कॉलर दबोच लिया । दांत किटकिटाकर अभद्र हो बोला, ‘पूछ देख, तेरे अम्मा-बप्पा जड़ी-बूटी लेते हैं कि नहीं! ”

उसी क्षण उसे आभास हुआ कि वह मानसिक रूप से बदमिजाज, अशिष्ट और अधीर हो उठा है । वह अंदरूनी तौर पर बीमार है और ऊपरी तौर पर ठहरा-संयत। दोनों ही स्थितियां असहज-खतरनाक भी। यह सही है कि निजी तौर पर वह बड़ा अनुशासनबद्ध दीखता है, लेकिन भीतर-ही-भीतर अंतर्द्वंद्व में उलझा सोचता रहता है कि आखिर घर में और भी तो लोग हैं, उन्हें इस घटना ने किसी भी रूप में क्यों नहीं कचोटा? क्यों वे इस प्रकरण को लेकर अटपटा महसूस नहीं करते? अब तो वह घर में अपने-आपको इतना गैर और अनुपयुक्त अनुभव करने लगा है कि कभी-कभी उसे लगता है कि वह वहां बना हुआ क्यों है? शायद अब भी वह सारी खिन्नता और असहमति के बावजूद अम्मा से कट नहीं पाया । भले ही वह अरसे से अम्मा से नहीं बोलता-चालता, मगर…अनी से वह उनके विषय में जरूर पूछता-पालता रहता है। सीधे-सीधे वह भी नहीं। घुमा-फिराकर वह पहले आजी की तबीयत के बारे में पूछता, फिर दद्दा की, फिर बड़े भैया की, फिर गुड्डी, किन्नी, हरीश, काकी, भाभी की। इन्हीं रिश्तों को फलांगते हुए वह आहिस्ता से अम्मा पर आ जाता ।

अब भी, कॉलेज से लौटकर वह सीधा ऊपर जाने लगता तो यह खयाल उसे उदास कर देता कि पहले वह नीचे आंगन में ठहरता था । अम्मा से सिर्फ उन्हीं के हाथों की चाय पीता । वे कभी किसी काम में उलझी होतीं और किसी बहू या लड़की को आदेश दे देतीं कि चाय का पानी चूल्हे पर चढ़ा दे तो वह बिगड़ उठता। जोर-शोर से ऐलान कर देता कि वह उस चाय को कतई हाथ नहीं लगाएगा। अनी अकसर उसके अम्मांशपने का उपहास उड़ाती, खिचाई करती कि अब तक वह बछड़े-सा अपनी अम्मा के थन में मुंह मारने को ललकता रहता है।

बरसों हो गए झोलवाली उनकी खटिया में उनसे सटकर लेटे!। उनके थुलथुल पेट में मुंह से बुड़बुड़ किए। चौके में खाना खाए। उनसे पैसे मांगे। कैसे झटक देतीं-‘जा, अपनी मेहरिया से लेकारू का खजाना गड़ा है हमरे लगे!’

दिल का कितना मजबूत हो गया है। मजबूत या ढीठ ही शायद । आज नहानघर के भीतर अम्मा हाल-बेहाल जिस तरह उकला रही थीं, पिछले दिन होते तो वह चिंतित-सा पलट पड़ता। दौड़कर उनके कंधे पकड़ लेता । पानी से लोटा भर, कुल्ला करवाता, पोंछता और माथे से सरक गया पल्ला खींच देता । गोद में भरकर उठा लाता, खटिया पर लिटा देता ऊपर से टेबिल फैन नीचे मंगवाकर ठीक उनके सामने रखवा देता… प्यास महसूस हुई। उठा । सुराही के मुंह से गिलास में पानी उड़ेलने लगा। पानी की ‘कुलकुल’ से अनी की नींद उचटी तो वह उठ बैठी-“अरे, कब आए? ” खुले हुए बालों को हाथों से मरोड़कर जूड़े में बांधते हुए उसने पूछा ।

“घटा भर हो गया ।”

“जगाया क्यों नहीं?” पलंग से नीचे उतरकर साड़ी की प्लीट्स ठीक करती हुई वह बुदबुदाई, “पता नहीं आजकल क्या हो गया है। ऐसी बेहोशी की नींद आती है। क्या लोगे?”

“चाय पिलवाओ तो तुम्हें एक बढ़िया समाचार दूं।”

“पहले ही बता दो।” वह ठुनकी!

“बैठकर बात करते हैं, चाय ले आओ ।”

अनी सिर पर पल्ला लेती हुई नीचे उतर गई।

दिमाग में अम्मावाला प्रसंग कौंधा । अनी से पूछ, शंका निवारण कर ले कि कहीं सचमुच शन्नोवाली स्थिति कि पुनरावृत्ति तो नहीं हो रही? फिर लगा, पूछकर क्या होगा? जो होना होगा उसे वह बदल नहीं सकता । पहले ही कौन बदल पाया? आज मूड कुछ हल्का है, प्रसन्न भी । हालांकि सुबह अनी ने जिस गड़बड़ का संकेत दिया था, उसे ले वह दोपहर तक चिंतित रहा। फिर इस निश्चय पर पहुंचा कि गड़बड़ अगर हो गई तो सफाई आदि के चक्कर में नहीं पड़ेगा। यह निर्णय सहजता से शायद इसी कारण ले पाया कि डॉ. मजूमदार का पत्र उसे दोपहर से पहले ही कॉलेज में मिल गया था । पत्र में उन्होंने सूचित किया है कि अगले सत्र में डीएवी कॉलेज में उसकी नियुक्ति निश्चित है। हालांकि यह उनका पिछले दो वर्षों से दिया जा रहा आश्वासन है। मगर अबकी उन्होंने निर्णयात्मक सूचना दी है। थीसिस भी उसने उन्हीं के निर्देश में पूरी की है। अगले हफ्ते उन्होंने उसे कानपुर बुलाया है-मामूली औपचारिकताओं की खानापूर्ति हेतु। इस महीने के अंत तक वह अपनी थीसिस भी दाखिल कर देगा । टंकण का काम लगभग पूरा हो चला है । डॉक्टर साहब ने उसकी मेहनत के लिए उसे बधाई और शुभकामनाएं भी दी हैं, और सचमुच… यह पत्र पाकर वह बेहद खुश हुआ है ।

मन-ही-मन सोचता रहा है । यहां से निकल जाए तो अच्छा है । अब मौका स्वतः ही हाथ लग गया । कानपुर सतीश से कह भी आएगा, अपने आस-पास दो-तीन कमरों का एक अच्छा-सा मकान निगाह में रखे । मित्र की पत्नी का साथ मिलेगा तो अनी को अकेला नहीं लगेगा । अनी सुनकर खुशी से चौंकेगी-इस सोच ने उसे रोमांचित किया ।

एक तो वह सोया ही बड़ी देर में । मुंह-अंधेरे ही रोने-पीटने के शोर ने उसे चौंका दिया ।

कुछ पलों के बाद घबड़ाई अनी ने उसे झकझोरा, “उठो, उठो न… आजी…”

वह समझ गया । अरसे से बीमार और खटिया पर ही टट्टी-पेशाब करने वाली देह की दुर्गति से छीजती आजी को आखिर मुक्ति मिल ही गई ।

अनी रुंधे स्वर में अपनी बर्फ हुई हथेलियों को उसके दोनों गालों से छूआती हुई, बदहवास होती-सी बोली, “मैंने कभी किसी को मरे हुए नहीं देखा । डर लग रहा है मुझे ।”

“डर कैसा! बस, देह से प्राण ही तो निकलते हैं!”

“फिर भी…”

“घबराओ नहीं । तुम चलो, मैं आ रहा हूं ।”

“सीढ़ियों पर अभी अंधेरा है!”

“अरे, कमाल है! इतना डरने की क्या जरूरत है?” फिर उसकी अस्थिरता और मौके की नजाकत का खयाल कर वह उठ बैठा, “चलो, मैं सीढ़ियों पर खड़ा रहता हूं तुम नीचे उतर जाओ ।”

वह सीढ़ियों के ऊपर खड़ा हो गया, तभी अनी नीचे उतरने को तैयार हुई । आधी सीढ़ियां उतरते-उतरते अनी पलटी, “ऊपर ही मत बैठे रहना । सारा घर जुट गया है । फौरन नीचे आ जाओ ।”

जवाब दिए बगैर वह कमरे में लौट आया ।

आजी को देखकर वह अकसर उनके कष्ट का अनुमान लगा, सोचता कि इस घिसट-घिसट के जीने से तो बेहतर है कि वह जितनी जल्दी हो, कूच कर जाएं । हालांकि डॉक्टरों ने सलाह दी कि उन्हें इलाज के लिए जिला अस्पताल में रखना ज्यादा उचित होगा ।

अम्मा उन्हें अस्पताल में रखने के विरुद्ध थीं । उन्हें लगता कि एक तो वे लगातार अस्पताल में रह नहीं पाएगी और उनके बगैर उनकी उचित देखभाल संभव नहीं । आजी की बदतर हालत के बावजूद, बिना पस्त हुए और घिनाए अम्मा दिन-भर गू-मूत उठातीं । उनकी खैरियत के गंडे-तावीज बंधवाती रहतीं । और आजी? उनकी अभिलाषाओं का भी कहां कोई अंत था! छोटू का ब्याह देख लें तो मरें (उसकी शादी इसीलिए जल्दी हो गई) …नन्हें, मंझले भैया को बेटा हो जाए तो मरें । सावित्री (बड़ी बेटी) को बड़ी मानता के बाद इकलौता पोता हुआ है । उसका मुंडन अपने महादेवन के चौरे पर करवा लें तो मरें । धुन्नू का ‘जापा’ देख लें तो मरें । अनी की गोद अभी छूछी है । कुछ हो जाए तो मरे । और अब तो उन्हें शन्नो के ब्याह की दुश्चिंता भी घेरने लगी थी। उसका ब्याह अपने सामने कर लेतीं तो मरतीं! उनकी दुलारी बहू (अम्मा) पेट से है…पोते का मुंह देख लेतीं तो मरतीं! पीढ़ी-दर-पीढ़ी आशीषने के लिए वे हर बार मरना स्थगित करती रहतीं…कैसी सघन जिजीविषा!

उसे आजी का वह आक्रोश स्मरण हो आया, जब शन्नो के समय सफाई की बात उसने बड़ी जिज्जी से कहलावाई थी । वे क्रुद्ध शेरनी-सी बिफरी थीं-‘ कौनो चोरी-छिनारा के आय जो दुलहिन पेट गिरवा लें!’

रोने-पीटने के सम्मिलित स्वर कुछ अधिक ऊंचे हो उठे । अनी की हिदायत उसे याद हो आई । उसे नीचे होना चाहिए। वह फुरती से बदन पर कुरता डालकर नीचे उतर आया ।

आँगन में जमघट किसी मजमेबाज के इर्द-गिर्द जुड़ी भीड़-सा घेरा डाले हुए था । अंदाजा हो गया-आजी को बीच में लिटा रखा होगा । उसे देख लोगों ने हटकर रास्ता दिया । सांत्वना के कतिपय बोल उसे लक्ष्य कर संबोधित हुए।

गठरी ढकी-सी आजी! उनके पांवों के करीब अम्मा बैठी दिखीं । उनका पछाड़ें खाता रुदन उसे विचलित कर गया । औरतों ने उन्हें संभाल रखा था । उस पर निगाह पड़ते ही अम्मा रस्सा तुड़ाए गाय-सी अरराकर बेतहाशा लिपट गई ।

पहली बार भीड़ में अम्मा का नंगा चेहरा दिखा । हमेशा ठुड्डी तक खिंचे रहने वाले पल्ले में जब वे बहुओं के बीच आ बैठती तो लोग भरमा जाते कि सास कौन-सी है और बहुएं कौन-सी!

उनके सीने से लिपटी अम्मा दहाड़ें मारकर रो रही थीं । उसे महसूस हुआ कि अचानक उसके भीतर एक दबा-ढका सोता आवेग-सा फूट पड़ा और गालों पर धारासार बहता अम्मा के खिचड़ी बालों को भिगोने लगा ।

अम्मा हिचकियों में बोले जा रही थीं । टूटे-टूटे वाक्यों में-“जिया नहीं रहीं रे छोटू.. छाड़ि गई हमका… अब हमका दुलहिन कहिके को पुकारी रे दइया! को हमार तीज-त्योहार करी रे! हमरे बरे नेग-न्योछावर धरी रे! आज हम आ गइन रे छोटू, बुड्ढा गइन…जब तक जिया बैठी रहीं, हमका यहै लागत रहे कि हम बहुरिया हन । भले हमरे जवान-जहील बहू-बेटवा, नाती-पनाती हैं, दइया!”

सच ही तो कह रही थीं अम्मा । वह सोचने लगा । जब तक किसी बड़े का साया सिर पर होता है, आदमी छोटा बना रहता है । जिस दिन वह साया नहीं रहता, उसकी उम्र प्रौढ़ हो उठती है। बयालीस साल की दुलहिन, आज अम्मा रह गई हैं-काकी, दादी, नानी, जेठानी सास मात्र! वह कभी उनके इस एहसास को लेशमात्र भी महसूस ही नहीं कर पाया।

घर में तेरहवीं के बाद अतिरिक्त सन्नाटा था ।

उसने अम्मा को गहरी खोजती दृष्टि से ढूंढा । अम्मा कहीं दिखाई नहीं दीं । नियुक्ति-पत्र की खुशी सबसे पहले वह उनसे बांटना चाह रहा था और शायद…वर्षोपरांत वह कॉलेज से लौटकर सीधा अपने कमरे में न जाकर आंगन में खड़ा हुआ ।

ऊपर पहुंचा तो छूटते ही अम्मा के विषय में पूछे बिना न रह सका, “अम्मा नहीं हैं घर पर?”

शन्नो की बित्ते- भर की चुटिया पर रिबन का फंदा बनाती हुई अनी बोली, “अम्मा तो कानपुर चली गई हैं दोपहर वाली बस से ।”

“कानपुर क्यों? एकाएक?” सूचना चौंकाने वाली थी- अम्मा कहीं निकलतीं जो नहीं!

अनी ने शन्नो को ‘जा, नीचे खेल आ’ की हिदायत देकर बाहर भेज दिया । उसके जूते खोलते, न खोलते हुए अनी ने बताया । और जो बताया वह उसे स्तब्ध करने के लिए काफी था- अम्मा पुष्पा जिज्जी के घर गई हुई हैं । तीसरा महीना चल रहा है । कह रही थीं कि वहां किसी नर्सिंग होम में जाकर सफाई करवा लेंगी । यह भी कह रही थीं कि उस समय छोटू की सलाह उन्हें इसलिए नागवार गुजरी थी कि तब वे जिया के रहते कभी अपने को बुढा गया महसूस ही नहीं करती थीं । और अब… अब जवान-जहील बच्चों के सामने डुमका फुलाए घूमना बड़ा भद्दा लगेगा!

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