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गृहलक्ष्मी की कहानियां :  मरूस्थल में गंगाजल
Stories of Grihalakshmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां : वो कृति के साथ बिताये पलों को ही जीवन के सार्थक क्षण माना करता और ये कृति है कि कभी जरा सा इशारा तक नहीं दिया कुछ नहीं बताया। क्या-क्या नहीं होता रहा होगा? लड़के से मिली होगी। आपस में बातों का आदान-प्रदान, फिर तारीख तय हुई होगी। निमंत्रण पत्र छपने गये होगें यानि कृति ने इस खुदबुदाहट को अपने भीतर दबाये रखा और वरुण के सामने जिक्र तक नहीं किया। रोज शाम की लम्बी मुलाकातों के बाद भी।

वरुण का मन हुआ निमंत्रण पत्र को फाड़कर टुकड़े टुकड़े कर दें, पर उससे क्या होता, उल्टा पूरे दफ्तर में वही मजाक का पात्र बनता उसी की हंसी होती। कृति उसके पास निमंत्रण पत्र रखकर सीधी अपने केबिन में चली गयी थी और काम भी करने लगी थी। एकदम सहज होकर, वरुण के मन में उमड़ते हुए ज्वार भाटा की भला उसे क्या पड़ी थी? अब वो शादी कर रही थी। 

वरुण का तो दिन ही खराब हो गया था। आज कोई काम करना उसके वश की बात नहीं थी न उसका दिमाग काम कर रहा था, न ही जबान। कृति तो उसके सामने आयी नहीं, उल्टे चपरासी और चाय वाले को तीन-चार बार वरुण की फटकार सुननी पड़ी। वरुण तो जैसे आसमान से जमीन पर पटक दिया गया था। उसके बस में आता तो वो जोर जोर से रो देता। एकदम तन्हा होता तो ऐसा भी कर देता पर चेहरा तो उसका एकदम रूआंसा सा ही हो चला था। सब इस बात को महसूस तो कर रहे थे पर कहने की हिम्मत किसी की नहीं थी। क्योंकि वरुण के तेवर थे ही कछ ऐसे। दफ्तर चलता रहा।

खैर! दफ्तर से छूटते ही कृति को झकझोर कर सब कुछ पूछने की मन ही मन ठान ली थी। बेसब्री से वह शाम होने का इंतजार कर रहा था। जाने का समय होते ही वह चट से उठकर सीधा सीधा कृति के केबिन में पहुंचा पर वो तो वहां ही नहीं। पता लगा किसी जरूरी काम की वजह से पहले ही निकल गयी है। वरुण ने गुस्से में अपनी आंखे बंद कर लीं। गयी होगी उसी से मिलने जिसके साथ पन्द्रह दिन बाद सात फेरे लेगी। वरुण ने तो अपशब्द भी कहने चाहे पर उसे नाम ही पता नहीं था कृति के मंगेतर का। कार्ड तो उसने खोलकर पढ़ा तक न था। क्यों पढ़ता? भला, अपनी मौत के फरमान को?

वरुण होश खोने लगा था, पर उसने खुद को संभाला, चुपचाप बाहर आया फिर समय देखा। उफ! आज इतनी जल्दी घर जाकर करूंगा क्या? नौ बजे से पहले उसे आदत ही नहीं थी घर में प्रवेश करने की। उसे पांच वर्षों से कृति की सिर्फ आदत ही नहीं थी अथाह प्रेम भी था। खैर! अपनी बाइक स्टार्ट करके वरुण ने सबसे पहले उसी रेस्तरां का एक चक्कर लगाया जहां कृति को उसके साथ कॉफी पीना सबसे ज्यादा पसन्द था। उसने थोड़ा गौर से देखा पर कोई कृति जैसी युवती वहां नहीं थी। कैसा पागल था वरुण लम्बी सांस लेकर उसने बाइक घर की तरफ ले ली।

बानी ने आश्चर्य से दरवाजा खोला और अचम्भित रह गयी उसका अति व्यस्त पति आज सात बजे घर कैसे आ गया? पहले तो उसके चेहरे पर प्रश्नचिन्ह उभरा, पर फिर वो खुश होकर उसका स्वागत करते हुए बोली। आज आपकी कनुप्रिया की तो लाॅटरी लग गयी। आवाज सुनकर तीन साल की नन्हीं सी बच्ची वरुण के पास दौड़ी आयी और वरूण ने उसे गोदी में उठाकर प्यार जताना शुरू कर दिया मानो अपने मन का सारा दर्द, सब तनाव छिपा लेना चाहता हो। कनु से खेलने के बहाने को बहुत सारे सवालों से बच गया जो बानी उससे पूछ सकती थी। पर बानी ने तो सचमुच कोई सवाल नहीं किया, उल्टा उसने जल्दी डिनर बनाकर, रात साढ़े नौ से बारह वाली पिक्चर की भी मन ही मन प्लानिंग भी कर डाली। वरुण ने हामी भर दी। 

नौ बजे तक वो तीनों खाना-पीना निबटा कर घर को ताला लगाकर बाहर निकल आये थे। सिनेमाहाल सिर्फ दस मिनट की दूरी पर था, इसलिए बानी ने पैदल जाने की इच्छा जाहिर की हालांकि वरुण तो बाइक से जाने की इच्छा रखता था ताकि रास्ते की चहलकदमी के दौरान होने वाली गपशप से बच जाये। बानी की फरमाइश पर वो फिल्म के लिए तैयार तो हो गया था पर अब एकदम मौन रहना चाहता था। बानी तो कुछ खास समझ में आया नहीं। उसने तो वरुण को शुरू से ऐसा व्यस्त, बहुत सारी जिम्मेदारियों में उलझा उलझा ही देखा था। इसलिए वो वरुण के चेहरे या बातों में से कुछ टटोलने या खंगालने की कभी कोई कोशिश नहीं करती थी। सिनेमाहॉल पहुंचकर टिकट लिये और पहुंच गये अपनी सीट पर।

वरुण ने कनु को प्यार से थाम लिया, पर आज उसे ये अहसास हुआ था कि जो सिनेमाहाल घर से केवल आधा किलोमीटर भी नहीं था वहां आज वो बानी के साथ पहली बार फिल्म देखने आया था? फिल्म अच्छी थी, बानी खूब मजे ले रही थी। पर वरुण का मन तो वहां था ही नहीं। उसने एक सेकेंड भी स्क्रीन पर अपनी आंख टिकाकर नहीं रखी। कभी दांये देखता कभी बांये, कभी यों ही खड़ा होकर फिर बैठ जाता। तीन-चार बार तो वह कनु को बानी की बाहों में लेकर टाॅयलेट कराने वाॅशरूम भी गया। उफ! आज वरुण का मन स्थिर था ही नहीं। जैसे-जैसे फिल्म खत्म हुई और बानी की उत्साहित प्रतिक्रिया पर हां हूं कहता हुआ वरूण, कनु को गोदी में थामे चुपचाप चलता रहा। नन्हीं कनु फिल्म और पापा के तनाव से बेखबर सो रही थी।

वरुण आगे था और हंसती-चहकती बानी पीछे-पीछे आ ही रही थी कि एक पुकार पर बानी और वरुण दोनों ठिठक गये। बानी ने पीछे मुड़कर देखा रात बारह बजे उसे भाभी- भाभी कहकर आवाज देने वाली कौन आ गयी? वरुण भी पलट गया और जो देखा तो वरुण के पसीने छूट गये। वो कुछ कहता या बचता उससे पहले ही भाभी- भाभी कहकर कृति ने बानी को अपनी शादी में आने का न्यौता दे डाला।कृति ने वरुण के फोन पर बानी के बहुत सारे फोटो देखे थे इसलिए उसे पहचानना कोई बड़ी बात नहीं थी। ‘‘भाभी आप पन्द्रह दिन बाद विवाह में आ रही हैं ना” ऐसा प्यार भरा आग्रह करके कृति अपने मंगेतर को वरुण से मिलवाये बगैर नमस्ते करके हंसती हंसती उसकी कलाई थामे आगे बढ़ गयी।

वरुण भी जरा सकपकाता, कुछ छिपाता बानी के साथ घर की तरफ मुड़ गया। मुड़ तो वह गया पर बाइक स्टार्ट करने की आवाज कृति की खिलखिलाहट और उसके मंगेतर की भी कुछ शरारतपूर्ण शब्दावली उसके कानों तक साफ-साफ पहुंच रही थी। घर पहुंचकर न बानी ने कुछ कहा, न वरुण ने कुछ बताया, पर सुबह के नाश्ते के समय जरूर बानी बड़े मन से कृति की तारीफ कर रही थी ‘‘कैसी संस्कारी और सुशील लड़की है।” मुझसे मिली इतने प्यार से बात की”,जरूर ले चलना आप मुझे उसके विवाह समारोह में।” बगैर वरुण की प्रतिक्रिया देखे-सुने बानी नाश्ता लगाती रही। टिफिन पैक करती रही और बस ऐसे ही सहज रही जैसी वो हमेशा से थी।

बानी हमेशा ही वरुण की बाइक पर प्यार से कपड़ा मारती थी ठीक एक मिनट पहले जब वरुण को दफ्तर निकलना होता था। कमाल है आज तक वरुण ने इन बातों पर न गौर किया न इनकी कीमत को समझा। न कभी बानी के लगाव को अहमियत दी। और बानी भी कैसी निश्छल, सरल थी। वरुण तो कृति के साथ शाम गुजारकर कभी दस-दस बजे भी घर आता तब वो काम का प्रेशर समझकर चिंतित ही होती थी, क्रोधित कभी नहीं। यही सब सोचते हुए वरुण ने बाइक स्टार्ट की और दफ्तर पहुँचा। आज शाम भी वह सीधा घर ही वापस आया था और डिनर के बाद वो लोग कनुप्रिया को एक बाल-मेला दिखाने ले गये। वरुण थोड़ा सशंकित था, मगर बाल-मेले में कृति या उसके मंगेतर से मुठभेड़ होना करीब-करीब नामुमकिन ही था।

कनु जितनी खुश बाल-मेला देखकर हुई थी। उससे कहीं ज्यादा वो अपने डैडी की उंगलिया थामकर उछलकूद कर प्रसन्न और उत्साहित हो रही थी। इस बात को आज वरुण अच्छी तरह समझ रहा था। इसी तरह दिन निकलते रहे। बानी के आग्रह पर वरुण सपरिवार कृति के विवाह समारोह में शामिल होने गया। वापसी के समय बानी की खिलीखिली आवाज हवा से बातें करती बाइक में वरूण तो साफ साफ सुन रहा था। दुल्हन बनी कृति ने कितने प्रेम से मंच से उतरकर बानी का स्वागत किया। गले मिली। कनु की किलकारी देर रात तक जारी थी। इधर वरुण मन ही मन चैन की सांसे लेता यह सोच रहा था चलो पीछा छूटा कृति जैसी मृग-मरीचिका से। कहां उसको नियति ने ऐसा अनमोल रत्न दिया बानी के रूप में और वो था कि विवाहित होते हुए भी कृति के चक्कर में पड़ा ! वो तो रेत में गंगाजल खोज रहा था, पता नहीं क्यों? 

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