बाहर वाले कमरे से ताईजी और पापा की धीरे-धीरे बातें करने की आवाजें आ रही थीं, परंतु इतनी धीरे-धीरे आवाज में कहे गए शब्द भी सूई की तरह चुभ रहे थे। क्या दोष था उसका? संयुक्त परिवार में जन्मी काजल का रूप-लावण्य देखते ही बनता था। घर में ताऊजी और ताईजी थे, पर उनका बेटा रवि यानी कि रवि भैया अब कनाड़ा में वैज्ञानिक थे। मेरे और मम्मी-पापा के अलावा हमारी प्यारी शन्नो बूआ थी। चेहरे पर चेचक के दाग के कारण उनका कहीं रिश्ता नहीं बन पाया। ईश्वर ने उन्हें बहुत कोमल और खूबसूरत दिल जरूर दिया था। बारहवीं पास करने के बाद जब मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में मेरा चयन नहीं हुआ तो मैंने दो वर्ष का पैथोलोजी का कोर्स करने की ठानी। ताईजी के बहुत मना करने के बाद भी पापा ने एक न मानी। मैं उनकी लाडली बेटी जो ठहरी। शहर की गल्ला मंडी में हमारा बहुत पुराना थोक का काम था, ताऊजी दिन भर मंडी में दुकान पर ही रहते थे। मेरी पढ़ाई के मामले में पापा ने किसी की नहीं सुनी। जि़ंदगी तो अपनी रफ्तार से चल ही रही थी, तभी ब्रेक लगा, जब यह हुआ कि पैथोलोजी की कक्षाएं सायंकाल 6 से 8 बजे तक होंगी। घर में सब बाहर जाने और लौटने के बारे में समझाते तो मुझे सभी की बातें भाषण लगतीं। मुझे यह दुनिया बहुत ही खूबसूरत लगती थी। लगता था जैसे पूरा आसमान मेरी मुट्ठी में समा जाएगा। मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास न कर पाने के कारण जो ग्लानि के बादल मेरे ऊपर छा गए थे, वह पैथोलोजी के हर टैस्ट में अव्वल आने के कारण छंटने लगे थे। एक वर्ष कैसे पलक झपकते ही बीत गया। अपने कॉलेज के सात सौ विद्याॢथयों में मैं प्रथम आई थी। खुशियां सिमट ही नहीं पा रही थीं। मेरे कोर्स का दूसरा और अंतिम वर्ष पूरा होने वाला था। मैं दिन-रात एक कर के मेहनत में जुटी हुई थी। घर में भी मां व ताईजी और शन्नो बुआ सभी मेरा बहुत ध्यान रखते थे।

हफ्ते भर बाद इम्तिहान थे। वो सोमवार की काली रात जब लाइब्रेरी में काम करते-करते मुझे समय का पता ही नहीं चला। रात के साढ़े नौ बज गए। घड़ी पर निगाह पड़ते ही मेरे चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। आज मोबाइल भी घर पर ही भूल आई थी। जल्दी-जल्दी किताबें बैग में ठंूसते हुए गेट पर पहुंची तो वहीं खड़े ऑटो को देख कर मेरी जान में जान आई और बैठ कर बोली भैया इंद्रापुरम जाना है। ऑटो मोहननगर पार करके आगे पहुंचा ही था कि अचानक तीन लड़के लाल बत्ती पर हमारा ऑटो रुकते ही उसमें चढ़ गए।

उसके बाद होश तो तब आया जब, मैं घर पहुंच चुकी थी, कैसे और किसने मुझे घर पहुंचाया पता नहीं, पर मेरी जाड़ों सी खिली-खिली धूप उन हैवानियत के दुश्मनों ने अमावस की काली रात बना दिया था। पापा और ताईजी का अंतिम निर्णय मुझे इम्तिहान न दिलाने का था। मां ने हमेशा की तरह चुप्पी की चादर ओढ़ रखी थी। थोड़ी देर बाद बाहर बैठक से आवाजें आनी बंद हो गई और पापा मेरे पास आकर बैठ गए। बहुत देर तक मैं रोती रही और पापा मेरे बाल सहलाते रहे। फिर पापा ने कहा, ‘बेटा कनाडा में रवि से बात हो गई है, तुम कल की फ्लाइट से कनाडा जा रही हो।’

सुबह पापा मुझे एयरपोर्ट छोड़ आए। शायद घर में सबने राहत की सांस ली होगी, पर सारा परिवार तब स्तब्ध हो गया, जब अगले दिन रवि भैया का फोन आया कि काजल पहुंची ही नहीं थी। पुलिस की मदद ली गई। रिश्तेदार-मित्रगण सभी तरफ से निराश हो कर बैठ गए। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि घर में सबके निर्णय के आगे चुप्पी साध कर बैठे-बैठे मैंने बहुत बड़ा निर्णय ले लिया था। हमारे प्रैक्टिकल में जो बाहर से निरीक्षक आए थे, वह उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले से आए थे, वह मुझसे बहुत प्रभावित थे। लेक्चरार होने के साथ-साथ उनकी अपनी कैमिकल फैक्ट्री भी थी। मैं गाजियाबाद से सीधे रामपुर आ गई थी। खुद को बर्बादी के कगार पर पहुंचाने वालों को सजा दिलाने के लिए मुझे पैसे और ताकत की सीढ़ी जो बनानी थी। जो घाव मेरे सीने में लगे थे, वह शायद कोई लड़की भी तभी महसूस कर पाती जब वह खुद इस दौर से गुजरती।

मैं क्यों शॄमदा होऊं? मैंने क्या गुनाह किया? शरीर के साथ-साथ आत्मा तो मेरी छलनी हुई और मुंह छिपा कर मैं क्यों कनाडा जाऊं। प्रोफेसर शर्मा की फैक्ट्री में मैंने नौकरी कर ली। मि. शर्मा का बेटा नकुल यह फैक्ट्री संभालता था, शायद मेरी खामोशी, काम की लगन और उदासी ने शर्माजी और उनके बेटे नकुल के मन में मेरे बारे में जानने की उत्सुकता भर दी थी। वह मुझसे अपनी बेटी की तरह बात करते थे। मैं प्रोफेसर शर्मा को अब चाचाजी कहने लगी थी, फैक्ट्री के सारे कर्मचारी फैक्ट्री से जुड़े क्वार्टर में ही रहते थे। मैं भी वहीं रहती थी। एक दिन बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। चाचाजी ने कहा, ‘बेटा रात बहुत हो गई है, तुम आज रात यहीं रुक जाओ।’ रात ग्यारह बजे सभी टीवी पर समाचार सुन रहे थे। मैं सभी के लिए गरम-गरम कॉफी ले कर दाखिल हुई। कॉफी की चुस्कियों के साथ अचानक चाचाजी बोले, ‘अगर थोड़ा-सा भी अपना समझती हो तो या विश्वास कर सकती हो तो अपने दिल का बोझ आज हल्का कर डालो’, प्रोफेसर शर्मा की पत्नी जो हिंदी अध्यापिका थीं, बोली, ‘बेटा मेरे कोई लड़की नहीं है, लेकिन सारा दिन लड़कियों के महाविद्यालय में उन्हीं के साथ रहते-पढ़ाते मुझे बहुत अनुभव हो गया है।’ नकुल बिल्कुल चुपचाप भावहीन बैठा था। मैंने जब अपनी आपबीती सुनानी शुरू की तो सभी के पैरों के नीचे से जैसे जमीन निकल गई हो। ‘हाय राम, इतना बड़ा और गहरा जख्म लेकर तुम जिंदा कैसे हो?’ चाचीजी बोली। मैंने बिना रुके आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘उन पापियों को सजा दिलवाने के लिए।’ नकुल ने जोश में आकर कहा, ‘काजल तुम चिंता मत करो। इस काम में मैं तुम्हारी मदद करूंगा।’ तभी चाचाजी बोले, ‘बेटा यह जोश में आने का वक्त नहीं है। काजल के माता-पिता, जिनकी यह बेहद लाडली थी, इसे मृत समझ रहे हैं। शायद गाजियाबाद की पुलिस इसे आज भी ढूंढ़ रही हो। तुम समझ रही हो न मैं क्या कह रहा हूं।’

‘हां अंकल, जानती हूं आप क्या कह रहे हैं। एक तरफ अपनी ही आत्मा को मार कर अपनी ही नजरों से गिरना है, इसलिए मैं कनाडा नहीं गई। यहां के अपनों की नजरों से दूर चली जाऊंगी, लेकिन खुद से कहां भागूंगी।’ चाचाजी ने नकुल को संबोधित करते हुए कहा, ‘अरे नकुल वो सिविल लाइंस वाले महेश सक्सेना हैं ना, उनका बेटा पिछले अक्टूबर में ही गाजियाबाद में पुलिस सुप्रिटेंडेंट बन कर गया है। हम उससे बात करते हैं। मैंने कहा, ‘चाचाजी मुझे पुलिस की मदद नहीं चाहिए। उन्हें सजा मैं ही दिलवाऊंगी।’ सभी चुप थे, शायद रास्ता मिलना बहुत मुश्किल था या फिर असंभव लग रहा था। रात का डेढ़ बज चुका था। सभी अपने-अपने कमरों में सोने चले गए। अगले दिन मैं फैक्ट्री में भेजने वाली दवाइयों की रिपोर्ट तैयार कर रही थी कि चपरासी ने आकर कहा, ‘मैडम आपको नकुल साहब ने बुलाया है। जैसे ही मैं नकुल के कमरे में पहुंची। बिना इधर-उधर की बात किए उसने रात वाली बात छेड़ दी। तुम्हारी मदद करना चाहता हूं’, मैंने कहा, ‘मुझे खुशी होगी, यदि तुम मेरे मकसद को अंजाम देने में मेरे साथ चलोगे लेकिन अभी मैं खुद ही नहीं जानती कि क्या और कौन-सा रास्ता चुनूं। मैंने पर्स में से एक आई कार्ड निकाला। नकुल यह मैंने अभी किसी को नहीं दिखाया है, यह शायद उन्हीं लोगों में से किसी का है। यह मेरे बैग में, जो जल्दी में बंद नहीं हो पाया था, उसी में गिर गया था। नकुल बोला, ‘यह हमारी बहुत मदद करेगा। नकुल आने वाले मंगलवार को ही गाजियाबाद चला गया और वहां से उस प्रमाण पत्र से सारी जानकारी निकाल लाया। वो प्रमाण पत्र सुखदेव महाविद्यालय के बीए के छात्र वरुण मिश्रा का था। मैंने कहा, ‘बस नकुल तुम मेरा दाखिला किसी तरह सुखदेव कॉलेज में करा दो, लेकिन मैं इससे ज्यादा तुम्हारी मदद नहीं लूंगी, क्योंकि मैं तुम्हें इस गुनाह में शामिल नहीं करना चाहती।

नकुल की बहुत कोशिशों के कारण मुझे सुखदेव कॉलेज में दाखिला मिल गया। नकुल की ही सलाह पर मैंने अपने बाल छोटे करा कर हुलिया बदल लिया और वहीं लड़कियों के छात्रावास में आकर रहने लगी। मेरी कोशिश और खूबसूरती के कारण वरुण मेरी ओर आकॢषत होने लगा। मैं ज्यादा समय वरुण के साथ बिताने लगी। नकुल हर रोज मुझसे बातचीत करता रहता था। एक शाम को अतिरिक्त कक्षा के पश्चात मैंने वरुण से झूठ कहा, ‘वरुण आज मेरा जन्मदिन है।’ वरुण ने उत्साहित होकर कहा वाह फिर तो पार्टी हो जाए, वरुण सोमानी हट जो कि एक छोटा सा रोस्तरां था, वहां मिलेंगे सायं सात बजे। तुम अपने खास दोस्तों को साथ ले कर आना, मैं भी अपनी फ्रेंड्स के साथ पहुंच जाऊंगी। ठीक सात बजे, मैंने अकेले ही रेस्तरां में प्रवेश किया तो देखा, सामने की मेज पर वरुण अपने दो दोस्तों के साथ बैठा है, मुझे देखते ही बोला, ‘अरे तुम अकेली?’ मैंने हंस कर बात टालते हुए कहा, ‘मैं अकेली ही दस के बराबर हूं’ और कुर्सी खिसका कर बैठते हुए बोली, ‘हां वरुण, बताओ खाने में क्या ऑर्डर किया है।’ वरुण ने सामने रखा हुआ गुलदस्ता मुझे थमाते हुए कहा, ‘जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।’ 

मैं भांप चुकी थी कि वरुण और उसके दोस्तों में कुछ इशारा हुआ है। अचानक दोनों लड़के उठे और बोले, ‘यार वरुण हम चॉलेकट केक लेने जा रहे हैं जब तक तुम लोग गपशप करो। उनके जाने के बाद वरुण बोला, ‘तुम्हारे खास दोस्त को आज कुछ नहीं मिलेगा’, कहते हुए उसने अपनी बाईं आंख दबा दी। ‘वरुण आज मैं तुम्हें एक सच्चाई से वाकिफ कराना चाहती हूं। वरुण बात यह है कि बचपन में ही मां-बापूजी की मौत के बाद दूर के रिश्ते की बुआ ने मुझे पाला-पोसा अपनी जरूरतों को पूरा करने में उन्होंने मेरे सोलहवें साल में प्रवेश करते ही मेरा जीवन नरक बना दिया। डेढ़ दो वर्ष तक तो मैं आंसुओं के समुंदर में डूबी रही लेकिन फिर मैंने जिंदगी से समझौता कर लिया और धीरे-धीरे खुद को उनके अनुरूप ढाल लिया। बुआ ने मुझे पैसा बनाने की मशीन बना कर मुझसे कॉलगर्ल का काम कराना शुरू कर दिया था। यह खूबसूरती मेरे लिए अभिशाप बन गई। छोटा भाई न होता तो मैंने अब तक खुद को खत्म कर लिया होता। तुम मेरी जिंदगी में आए तो लगा इस अंधेरी रात सी जिंदगी में खुशनुमा सुबह आ गई लेकिन मैं तुम्हें धोखा नहीं दे सकती। वरुण प्लीज मुझे माफ कर देना मेरी किस्मत में किसी के घर की रानी बनना नहीं लिखा।’वरुण की भाव-भंगिमा बदली फिर बालों को लापरवाही से झटका देते हुए बोला डोंट वरी काजल, हमारे रास्ते अभी अलग नहीं हुए हैं। मेरा यह दोस्त मयंक जो अभी-अभी यहां बैठा था, वह इस धंधे का शातिर है। कल ग्रीन पार्क में जो गांधी जी की मूॢत है, वहीं मिलेंगे। मयंक तुम्हें बहुत अच्छे पैसे दिलवाएगा। तुम दो लड़कियों के साथ सायं सात बजे वहीं मिलना। ठीक है कह कर मैं आनन-फानन में वहां से रवाना हुई और कमरे पर आकर सबसे पहले वरुण को फोन करके सारी कहानी सुनाई। नकुल ने आश्वासन दिया कि वह कल सुबह ही गाजियाबाद पहुंच जाएगा और पुलिस के साथ ग्रीन पार्क में उपस्थित रहेगा। बोला, ‘बस अपने फोन की रिकाॄडग चालू रखना। अगले दिन ठीक समय पर मैं ग्रीन पार्क पहुंची तो देखा बहुत बेसब्री से वरुण और उसके दोस्त मेरा इंतजार कर रहे थे। मैंने कहा, ‘लड़कियां बाहर गाड़ी में है, लेकिन तुम को देख कर विश्वास नहीं हो रहा कि तुमने कभी कोई गलत काम भी किया होगा। मयंक ठहाका मार कर हंसते हुए बोला, ‘अरे बेबी इन्हें बच्चा मत समझो। तीन महीने पहले ही पैथोलोजी लैब के बाहर से एक लड़की का पीछा करते हुए इंद्रापुरम में उसे धर दबोचा था। क्या मस्त थी यार… और तीनों हंस पड़े। तभी पुलिस और नकुल जो आसपास ही छिपे हुए थे, निकल आए और तीनों को गिरफ्तार कर लिया। हथकड़ी लगने से पहले मैंने वरुण को अपने मोबाइल की रिकाॄडग सुनवाई और कहा गौर से ये चेहरा देखो यह वही चेहरा है जो इंद्रापुरम ऑटो में था, वरुण और उसके दोस्तों को जेल हो गई, पर काजल के लिए यह काफी नहीं था। क्या देश में शोषण का शिकार हुई हर लड़की को नकुल जैसा साथी मिल सकता है। या हर लड़की काजल जैसा जज्बा दिखा सकती है? सरकार ऐसा नहीं सोच पाती कि इस शोषण के बाद शारीरिक घाव तो भर जाते हैं परंतु मानसिक घाव जीवन भर पीछा नहीं छोड़ते। शायद देश के कानून में वरुण जैसे लोगों को जेल नहीं, अपितु नपुंसक बना कर छोड़ देना चाहिए, जिससे वह भी बची हुई जिंदगी एक सजा की तरह काटें। 

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