अपने देश में गुरु थोक में मिलते हैं। गुरु के मामले में भारत का वर्ल्ड रिकॉर्ड बन सकता है। हजारों सालों से हमारा देश सबसे बड़ा गुरु उत्पादक देश रहा है। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते गुरुओं की नस्ल में तब्दीलियां आई हैं। कुछ गुरु बदलकर गुरुघंटाल बन गए हैं।
सीधे-सीधे यों कहना चाहिए, भारत एक गुरु प्रधान देश है। हर गांव, हर कस्बे, हर शहर, हर महानगर में गुरुओं का उत्पादन होता है। अपने यहां हर क्षेत्र में गुरु उपलब्ध हो जाते हैं। गुरुओं की ब्रीड पर निर्भर है, वह कैसा व्यवहार करेंगे। अच्छी ब्रीड के गुरुओं को अपने शिष्य स्वयं चुनने की आजादी है। हल्की ब्रीड के गुरुओं को शिष्यों के रहमो-करम पर रहना पड़ता है। यहां शिष्यों को पूरी आजादी है, वे जिसे चाहें अपना गुरु बना सकते हैं।
पिछले सीजन में नासिक और लासलगांव में प्याज का अधिक उत्पादन हुआ था। नतीजा यह निकला कि प्याज गोदामों में ही सड़ गया। जब से भारत में धार्मिक प्रचार के लिए किसिम-किसिम के चैनल आए हैं, तबसे गुरुओं का उत्पादन भी बढ़ गया है। गुरुओं के अत्यधिक उत्पादन से फसल सड़ने का खतरा बढ़ गया है।
भारत में गुरुओं की फसल के बीज आदिकाल में ही खोज लिए गए थे। ठीक-ठीक यह कहना संभव नहीं है कि भारतीय आदिमानव ने पहले अग्नि को खोजा था या गुरु को। गुरुओं के प्रभाव को देखकर यह मानना सुविधाजनक हो सकता है, गुरु का आगमन अग्नि से पहले हुआ होगा। गुरु पनपने लगे। जंगलों में मंगल होने लगा। जहां जगह देखी, वहीं डेरा जमा दिया। गुरुओं का आतंक वातावरण में तैरने लगा। सारे चैनलों पर गुरुओं का कब्जा होने लगा है। गुरु जनता को डराने लगे हैं। पहले-पहल जब गुरुओं का बीजवपन हुआ था। पुरुष गुरुओं की पैदावार हुई थी। इक्कीसवीं सदी में गुरुओं की जो पैदावार हुई, उसमें देवियां और माताएं भी शामिल थीं।
गुरुओं का उत्पादन दिनोदिन बढ़ रहा है। खपत भी बढ़ रही है। पहले शनि ग्रह से लोग डरते थे। अब शनि भक्त गुरु का आतंक बढ़ रहा है। एक गुरु ज्योतिष बताता है तो दूसरा योग सिखाता है। एक साथ कई महिला गुरु उग आई हैं। डरावनी बिंदी लगाकर टेरो कार्ड पढ़ती हैं। बताती हैं किसके लिए कौन से रंग के कपड़े पहनना लकी रहेगा। रंगीन गारमेंट की खपत एकाएक बढ़ गई है। हर चैनल गुरुओं के रंग में रंगा है। दर्शकों पर गुरु रंग चढ़ाया जा रहा है। गुरुओं की फसल पकने लगी है।
कलियुग चल रहा है। त्रेता और द्वापरयुग में कुल मिलाकर भी शायद इतने गुरु नहीं हुए होंगे, जितने कलियुग के वर्तमान चरण में हो गए हैं। जिधर भी नजर फैलाओ उधर गुरुओं की फसल लहलहा रही है। सस्ते गुरु, महंगे गुरु। जिसकी जैसी कुव्वत है, वह वैसा गुरु पसंद करके ले जा सकता है।
गुरुओं की गद्दी सजने लगी है। नुक्कड़ पर गुरु छाए हैं। मैदानों में गुरु रम गए हैं। नर गुरु और नारी गुरु में प्रतियोगिता है, कौन श्रेष्ठ है। गुरुओं की बढ़ती आबादी देखकर नारायण परेशान हैं। सभी भक्त गुरु वंदना करने में लगे हैं। नारायण के लिए समय ही नहीं बचा किसी के पास।
हम भारतीय इंपोर्टेड चीजों के दीवाने हैं। विदेशों से भी गुरु मंगाने लगे हैं। भारतीय गुरु इससे परेशान हैं। वे घर का जोगी जोगना बनकर रह गए हैं, जबकि आनगांव के गुरु सिद्ध माने जाने लगे हैं। इंपोर्टेड गुरुओं की खेप आने से भारतीय गुरुओं की सड़ती फसल से उठती दुर्गंध का खतरा जानलेवा हो गया है।
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