Nikka's unique friends
Nikka's unique friends

Funny Stories for Kids: निक्का के जीवन में रोज कोई न कोई करिश्मा होता था । मगर एक दिन तो ऐसा करिश्मा हुआ कि …क्या बताऊँ ? निक्का उसे कभी भूल ही नहीं पाता । वह छुट्टी का दिन था और निक्का सुबह से ही खेलने के मूड में था । पर उसका दोस्त सत्ते आज आया ही नहीं था । निक्का ने बहुत इंतजार किया, फिर सोचा, चलो, आज अपने खिलौनों से अकेले-अकेले आखँ मिचौनी खेलूँगा और बातें करूँगा ।

और होते-होते यह खेल भी बड़ा मजेदार हो गया । निक्का आँख बंद करके अपने खिलौनों को जहाँ-तहाँ छिपा देता । फिर खुद ही ढूँढ़ता । उसे इसमें बहुत मजे आ रहे थे । उसे लगता, उसके खि लौने भी खूब हँस-हँसकर अपनी खुशी जता रहे हैं ।

तभी उसे याद आया, “अरे-रे, मेरा वह टूटी टाँग वाला घोड़ा कहाँ है ? मैंने तो खुद ही उसे छि पाकर रखा था अंदर वाली अँधेरी कोठरी में । पर उसे तो मैंने अभी तक ढूँढ़ा ही नहीं ।” याद आते ही निक्का झटपट भीतर वाली कोठरी में गया । अपना मिट्टी का बना घोड़ा ढूँढ़ने के लिए । तभी उसे कुछ खुस-खुस सुनाई दी । थोड़ी देर बाद आवाज कुछ साफ हो गई, “अरे निक्का आ गया…निक्का !”
निक्का ने आँखें फाड़कर इधर-उधर देखा, पर उसे कोई दिखाई नहीं पड़ा । ‘तो फि र यह आवाज कहाँ से आ रही थी ?’ निक्का ने अचरज से भरकर सोचा ।

निक्का इसी सोच में था कि अचानक उसे जमीन पर किसी के जोर-जोर से नाचने – कुदने की धम-धम आवाज सुनाई दी । ‘कहीं यह कोई चूहा तो नहीं ?’ निक्का हैरान । तभी निक्का की नजर लकड़ि यों के गट्ठर के पीछे गई । वहाँ छोटी-सी जगह में दो छोटे-छोटे बौने उछल-कूद कर रहे थे । वे इतने छोटे थे कि बड़े आराम से निक्का की हथेली पर आ जाते ।

देखकर निक्का की आँखें फटी की फटी रह गईं । उसने पूछना चाहा, ‘कौन हो तुम लोग ?’ पर वह कुछ पूछता, इससे पहले ही दोनों बौने एक साथ खिलखिलाकर हँसे । फिर कमर पर हाथ रखकर मजे-मजे में नाचते हुए बोले, “हम गिठमुठिए हैं, गिठमुठिए…! हाँज्जी , हाँज्जी , गिठमुठिए ! !” नाचते हुए वे गरदन मटका रहे थे, और उनकी आँखें दाएँ-बाएँ ऐसे घूम रही थीं, जैसे उनके साथ-साथ आँखें भी नाच रही हों ।

‘ओहो, यह तो अजब सी बात है । बड़ी अजब सी बात !’ देखते हुए निक्का की आँखें जैसे पलक झपकाना भूल गई हों । कुछ देर बाद उसके मन में आया, ‘बड़े अजीबोगरीब बंदे हैं ये तो ! मैंने आज तक नहीं देखे, जिंदा
खिलौनों जैसे लोग ।…मगर अब तो ये सच्ची -मुच्ची मेरे सामने हैं । मुश्किल से छह इंच लंबे ! मगर कैसी जिंदादिली है इनमें । डिस्कवरी चैनल वाले देख लें तो पागल हो जाएँ । खैर, मुझे इनसे थोड़ी बात तो करनी चाहिए ।’ निक्का ने कुछ हैरानी से पूछा, “अरे भई, तुम कह रहे थे कि हम गिठमुठिए हैं, गिठमुठिए !…पर यह गिठमुठिए होता क्या है ?” “हा-हा-हा, तुम्हें नहीं पता, गि ठमुठि ए कौन होते हैं ? हम बताते हैं हम ।” उनमें से एक ने कहा, और हँसने लगा, ‘ठी…हा-हा-हा !’ “देखो भाई निक्का , हम खड़े हों तो एक गि ठ यानी हाथ के बराबर, बैठें तो मुट्ठी के बराबर । इसीलिए हमें कहा जाता है गि ठमुठिए । क्यों, अब समझ गए ना ?” दोनों बौनों ने एक साथ हँसते-नाचते हुए कहा । “पर तुम लोग आए कहाँ से हो ?” निक्का ने पूछा तो उन्होंने कहा, “यह बात अपनी मम्मी से पूछ लेना । कहना कि मम्मी -मम्मी , पाताल लोक से गिठमुठिए आए थे मुझसे दोस्ती करने । मम्मी खुद ही समझ जाएँगी, और खुश
भी होंगी ।…ठीक ?”
लेकिन निक्का तो अब भी हकबकाया हुआ था । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि गिठमुठियों की बात सही है या गलत ? वह अजीब ढंग से उन्हें देख रहा था, और सोच रहा था, कि तना अनोखा इनका रंग-ढंग है । कोई सोच भी नहीं सकता ।

इतने में दोनों गिठमुठियों ने निक्का का एक-एक हाथ पकड़ा । फिर हँसते हुए कहा, “अच्छा , छोड़ो निक्का ! अभी तो चलो, साथ-साथ खेलते हैं ।” निक्का को लगा, ‘अरे, ये तो सचमुच दोस्त गिठमुठिए हैं !’ वह उन दोनों
गिठमुठियों के साथ देर तक खेलता रहा । उसे हैरानी हो रही थी कि पिंगपौंग वाली गेंद हो या फिर चकरी, लटटू, फिरकी, सब ये चलाना जानते हैं । भला कहाँ से सीख लिया इन्होंने ? यहाँ तक
कि कैरमबोर्ड, लूडो और साँप-सीढ़ी भी ये खेल लेते थे । और कहानियाँ तो उन्होंने इतनी मजेदार सुनाई कि हँसते-हँसते निक्का के पेट में बल पड़ गए ।
गिठमुठियों के साथ खेलते और मस्ती करते हुए निक्का को समय का कुछ होश ही नहीं रहा ।
इतने में एक गिठमुठिए की नजर निक्का के पुराने घोड़े पर गई । देखकर वह दुखी होकर बाला, “अरे, यह क्या ? इसकी तो एक टाँग ही टूटी हुई है । फि र ये दौड़ेगा कैसे ? भला टूटी टाँग वाला घोड़ा भी कहीं अच्छा लगता है ! लाओ हम इसे ठीक कर देते हैं ।”
दोनों गिठमुठिए उस घोड़े को हाथ में लेकर बैठ गए । फिर अपने झोले में से गीली मिट्टी जैसी कोई चीज निकाली । उससे उन्होंने घोड़े की टूटी टाँग को फिर से जोड़ दिया । इसके बाद छोटा सा रंगों वाला थैला निकाला । उससे घोड़े पर संदुर-संदुर, चमकीले रंग कर दिए ।
घोड़ा अब काफी अच्छा लगने लगा था । पर गिठमुठियों ने अब उसे रंग- बिरंगे कपड़ों से सजाना शुरू किया । उन्होंने पलक झपकते ही एक दूसरा थैला निकाला । इसमें छोटे-छोटे, रंग-बि रंगे रेशम के कपड़े थे । उनसे दोनों गिठमुठियों ने मि लकर घोड़े को इस तरह सजा दिया कि देखकर निक्का हैरान रह गया ।
उसका घोड़ा इतना संदुर लगने लगा था कि आँखें उस पर ठहरती ही नहीं थीं । “क्यों, कै सा लगा ?” वह संदुर घोड़ा निक्का को पकड़ा ते हुए गिठमठिुयों ने पूछा ।

“अच्छा , बहुत अच्छा !” निक्का रीझकर बोला, “मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि मेरा यह टूटी टाँग वाला पुराना घोड़ा इतना सज जाएगा । और इसकी टाँग तो अब बि ल्कुल ठीक हो गई, एकदम ठीक…!” “चलो तुम्हें अच्छा लगा, तो हमें भी बड़ी खुशी हुई । आखिर दोस्तों को एक-दूसरे के काम तो आना चाहिए न !” दोनों गिठमुठियों ने मुसकराते हुए कहा । निक्का इतना खुश था कि उसकी खुशी मन में समा नहीं रही थी । उसने
मुसकराते हुए कहा, “तुम मेरे बहुत प्यारे दोस्त हो । अब आते रहना ।” “हाँ जरूर, हाँ जरूर…!” दोनों गि ठमुठि ए एक साथ बोल पड़े, “तुम अच्छे हो निक्का , बहुत अच्छे । इसलि ए हमारा मन हुआ कि चलकर तुमसे बातें करें ।” फिर उन्होंने एक थैले में से दो संदु र हाथी निकाले । सँड़ू उठाए हुए बड़े
शानदार हाथी । उन्हें निक्का को देते हुए कहा, “लो निक्का , हमारी ओर से यह संदुर उपहार ।”

वे हाथी सचमचु अनोखे थे । निक्का गि ठमठिु यों के हाथ से वे संदु र हाथी लेकर, बड़े प्यार से उन पर हाथ फि राने लगा । फिर मुसकराते हुए बोला,
“थैंक्यू…!”
गिठमुठिए हँसकर बोले, “यह हमारी दोस्ती का उपहार है । तुम्हें हमारी याद दिलाएगा ।”
कुछ देर बाद गिठमुठियों ने अपने सारे थैले समेट लिए, जिन में एक से एक अनोखी चीजें थीं । कि सी जादूगर जैसी । उन्हें एक चमड़े के थैले में भरकर उन्होंने कंधे पर लटका लि या । फि र बोले, “अब हम जाते हैं निक्का , फिर आएँगे ।…तुम हमें भूलोगे तो नहीं ?” निक्का मुसकराया, “नहीं-नहीं, तुम तो मेरे दोस्त हो । बड़े अच्छे वाले दोस्त ! पर…तुम जा कहाँ रहे हो ?”

“अरे, अपने घर जा रहे हैं और कहाँ ?…जैसे तुम्हा रा घर है, वैसे ही हमारा भी घर है ।” गिठमुठिए हँसे और हँसते-हँसते गायब हो गए । निक्का हैरान-सा वहीं खड़ा का खड़ा रह गया ।

उसी रात निक्का ने मम्मी से कहा, “मम्मी …मम्मी , पता है, आज गिठमुठिए आए थे । बड़ी देर तक मेरे साथ खेलते रहे । खूब बातें हम लोगों ने कीं ।” “अरे ! यह तो मैं कि स्से -कहानियों में सुनती थी कि कभी-कभी गिठमुठिए आते हैं धरती पर । वे नीचे पाताल लोक से आते हैं ।…पर यह तो कि स्से –
कहानियों की बात है । हो सकता है, तूने कोई सपना देखा हो ।” “नहीं मम्मी , सचमुच !” निक्का बोला, “उन्होंने मुझे मिट्टी के बने ये दो हाथी भी दिए । दिखाऊँ…?”

मम्मी ने देखा, वो हाथी भी बौने हाथी थे, जैसे धरती पर कोई नहीं बनाता । उन पर लि खा था, ‘गिठमुठियापुर के गिठमुठिए हाथी ।’ अब तो उन्हें यकीन हो गया कि सचमुच गिठमुठिए ही आए थे निक्का के साथ खेलने के लि ए । बोलीं, “ओ निक्का , तू तो है ही ऐसा लाड़ला । अब वे आएँ तो उनके साथ प्यार से खेलना । मैंने सुना है, वे हम आदमि यों के बड़े पुराने दोस्त हैं ।” सुनते ही निक्का की आँखों के आगे एक बार फि र उन हँसोड़ नन्हे-मुन्ने गिठमुठियों के चेहरे आ गए । ओहो, कैसे वे बात-बात में हँसते, नाचते और कूदते थे । जैसे उनके शरीर में कोई स्प्रिं ग लगी हो । उनकी बातें भी कैसी प्यारी-प्यारी दिलखुश बातें थीं । और कि स्से तो ऐसे मजेदार कि कुछ पूछो ही मत ।
निक्का हँसते हुए बोला, “मम्मी , वे तो सचमुच जिंदा खि लौनों जैसे लोग हैं । छोटे-छोटे, पर बड़े ही खुशमिजाज ।”
मम्मी मुसकराईं, “हाँ निक्का , तेरी नानी भी मुझे कुछ ऐसा ही बताती थी । और यह भी, कि वे बड़ी प्या री कहानियाँ सुनाते हैं ।…” “अरे, हाँ मम्मी , हाँ ! एकदम सही बात । उन्होंने मुझे भी सुनाए थे बड़े ही दिलखुश कि स्से !” कहते हुए, उन गि ठमुठि यों के प्यारे-प्यारे मजेदार किस्से
याद करके निक्का मुसकरा दिया ।

ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ