Summary: तुलना से टूटता रिश्ता जानिए 5 मुख्य वजहें
रिश्तों में तुलना धीरे-धीरे भरोसे, सुकून और भावनात्मक जुड़ाव को खत्म कर देती है। अगर रिश्ते को मजबूत और खुशहाल बनाना है, तो सोशल मीडिया, पुराने अनुभवों और परफेक्शन की तुलना से दूरी बनाना बेहद ज़रूरी है।
Comparison in Love: तुलना कभी भी रिश्ते को बेहतर नहीं बनाती, बल्कि धीरे-धीरे उसमें मौजूद भरोसे, अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव को कमजोर कर देती है। जब हम अपने रिश्ते की तुलना दूसरों के रिश्तों, सोशल मीडिया पर दिखने वाली परफेक्ट तस्वीरों या बीते अनुभवों से करने लगते हैं, तो अनजाने में असंतोष और शिकायतें बढ़ने लगती हैं। अगर किसी रिश्ते में सुकून, सम्मान और सच्चा प्यार बनाए रखना है, तो तुलना की आदत से समय रहते दूरी बनाना बेहद ज़रूरी है। हर रिश्ता अपनी समझ, भावनाओं और परिस्थितियों से बनता है, इसलिए उसे दूसरों के पैमानों पर नहीं तौलना चाहिए। याद रखें, मजबूत और खुशहाल रिश्ता वही होता है जिसे आप अपने दिल की आवाज़
से महसूस करते हैं, न कि बाहरी तुलना से।
सोशल मीडिया की चमक-दमक

आज के समय में रिश्तों में तुलना की सबसे बड़ी वजह सोशल मीडिया बन चुका है। इंस्टाग्राम पर परफेक्ट कपल, सरप्राइज़ डेट्स, महंगे गिफ्ट्स और हर समय मुस्कुराते चेहरे देखकर अनजाने में मन में सवाल उठने लगता है, हमारे रिश्ते में ऐसा क्यों नहीं? यहीं से तुलना का ज़हर धीरे-धीरे दिल में उतरने लगता है। हम यह भूल जाते हैं कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला हर रिश्ता हकीकत नहीं होता, बल्कि एडिटेड पल होते हैं। जब हम अपने रिश्ते को दूसरों की ज़िंदगी से तोलने लगते हैं, तो संतोष की जगह शिकायत जन्म लेती है। इसलिए अपने रिश्ते को स्क्रीन पर नहीं, अपने एहसासों में समझना सीखें।
पुराने रिश्तों की तुलना
कई बार लोग अनजाने में अपने मौजूदा रिश्ते की तुलना पुराने रिश्तों से करने लगते हैं। वो ऐसा करता था, वो ज़्यादा समझदार थी, ऐसे शब्द रिश्ते में धीरे-धीरे दरार डालते हैं। हर इंसान अलग होता है, उसकी प्यार जताने की भाषा, समझ और सीमाएँ भी अलग होती हैं। पुराने रिश्तों की तुलना वर्तमान पार्टनर को यह एहसास दिलाती है कि वह कभी पर्याप्त नहीं हो सकता। इससे आत्मविश्वास टूटता है और भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है। स्वस्थ रिश्ता वही होता है जहाँ बीते कल को सीख बनाकर रखा जाए।
दूसरों की राय को महत्व
जब रिश्ते में दो लोगों की बजाय चार या उससे ज़्यादा लोग शामिल हो जाते हैं जैसे दोस्त, रिश्तेदार, समाज तो ऐसे में तुलना अपने आप जगह बना लेती है। हर रिश्ता अपनी परिस्थितियों, समझ और भावनाओं से बनता है। दूसरों की राय को ज़रूरत से ज़्यादा सुनना, अपने रिश्ते पर भरोसे को कमजोर करता है। याद रखें, जो लोग बाहर से सब कुछ जानते हुए लगते हैं, वे अंदर की सच्चाई नहीं जानते।
आत्मविश्वास की कमी

कभी-कभी तुलना की जड़ हमारे अंदर होती है। जब इंसान खुद से खुश नहीं होता, तो उसे हर जगह कमी ही नज़र आती है। आत्मविश्वास की कमी व्यक्ति को यह महसूस कराती है कि मैं या मेरा रिश्ता दूसरों से कम है। ऐसे में छोटी-छोटी बातें भी बड़ी लगने लगती हैं। अगर खुद से संतोष नहीं होगा, तो कोई भी रिश्ता आपको अच्छा महसूस नहीं करा सकता। रिश्ते में तुलना से दूरी बनाने के लिए सबसे पहले खुद के साथ रिश्ता बेहतर करना ज़रूरी है।
परफेक्शन की चाह
फिल्में, वेब सीरीज़ और कहानियाँ प्यार की एक परफेक्ट तस्वीर बना देती हैं। जब असल ज़िंदगी उस तस्वीर से मेल नहीं खाती, तो तुलना शुरू हो जाती है। ऐसी तुलना भरी उम्मीदें रिश्ते को बोझ बना देती हैं। परफेक्शन की चाह हमें यह देखने नहीं देती कि सामने वाला अपनी पूरी कोशिश कर रहा है। रिश्ता परफेक्ट होने से नहीं, सच्चा और सुरक्षित होने से मजबूत बनता है।
