Bepanah Mohbbat ka samudra
Bepanah Mohbbat ka samudra

Hindi Motivational Story: रामदेव एक बहुत ही कुशल मछुआरा था। वह समुद्र में जाल डालता और हज़ारों मछलियों के साथ कोई ना कोई अनोखी मछली अक्सर आ ही जाती थी। अपनी कार्य कुशलता से उसने गांव में नाम और पैसा दोनों कमाए थे। पास के गांव के हरीश काका की बेटी मंगला उसको पसंद थी। हरीश काका के लिए मना करने की कोई वजह नहीं थी, “अरे बेटा तुम्हारे जैसा पति पाकर तो मंगला की किस्मत चमकेगी। मैं तुम्हारी शादी की तैयारी करता हूं।” काका ने खुश होकर कहा। आज उनकी शादी में पूरा गांव शामिल था। 

मौसम बदले और मंगला ने एक हृष्ट-पुष्ट सुंदर बालक को जन्म दिया। उसकी प्यारी सूरत देखते ही मां-बाप दोनों ने उसका नाम सुंदर रखा।

कुछ महीनों का होते-होते सुंदर ने पानी की तरफ़ अपना झुकाव दिखाना शुरू करा। वह टब में बैठ जाता और पानी के अंदर मुंह डालकर खेलता रहता था। थोड़ा बड़ा हुआ तो घर के पीछे छोटे से तालाब में बहुत जल्दी तैरना सीख गया था। वो घंटों तैरता, पानी के ऊपर भी और उसकी गहराई में भी। उसको देख कर ऐसा लगता जैसे किसी जलपरी ने सुंदर के रूप में जन्म लिया हो। इसी तरह पानी के साथ अठखेलियां करता सुंदर 11 साल का हो गया। 

अब उसने पानी का अपना दायरा बड़ा कर लिया। स्कूल में पढ़ाई के साथ जब भी सुंदर को मौका मिलता वह अपने बाबा के साथ मछलियां पकड़ने समुद्र में चला जाता। अपने बाबा के साथ जाल फेंकना और मछली पकड़ना उसी बहुत अच्छी तरह से आ गया था। वो इन कामों में तो माहिर हो ही रहा था पर उसके साथ साथ बल्कि कहीं ज़्यादा समुद्र के लिए उसकी बेपनाह मोहब्बत परवान चढ़ती जा रही थी। 

वह जब तब मौका मिलते ही समुद्र के पास बैठ जाता। हवा के रुख से, चांद की चांदनी से और सूरज के उदय एवं अस्त से वह समुद्र की भाषा समझता और उससे ऐसे बातें करता जैसे उसका कोई दोस्त हो। 19 साल का होते-होते सुंदर की दोस्ती समुद्र से पूरे तरीके से बेपनाह मोहब्बत में बदल गई। 

अब वह समुद्र के किनारे बैठकर उससे बातें नहीं करता था बल्कि समुद्र की गहराइयों में समा जाता। ऐसा लगता है जैसे कोई किसी के दिल की गहराइयों को टटोल रहा है। 25 साल तक आते-आते सुंदर के लिए समुद्र का बड़ा हिस्सा जैसे उसका दूसरा घर हो गया था। मानो तो जैसे कोई घर का हर कोना जानता है वैसे ही वो समुद्र को पहचानता था। 

समुद्र लेकिन घर की तरह एक दायरे में सीमित नहीं होता है। इसलिए सुंदर की समुद्र को जानने की भूख बढ़ती जा रही थी। वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके और आगे जाता। कभी दाएं तो कभी बाएं की तरफ़ बहुत दूर तक तैरता चला जाता। समुद्र के अलावा उसे अपने जीवन में किसी और के साथ की कभी ज़रूरत महसूस ही नहीं हुई। 

मां-बाप कहते कहते बूढ़े हो चले थे, “ तू शादी क्यों नहीं करता। एक परिवार ज़रूरी है बेटा। हमारी उम्र हो रही है, कब तक दुनिया में तेरे साथ रहेंगे।” सुंदर उन्हें प्यार से समझाता, “मेरा परिवार तो है बाबा, आप और मां और समुद्र। घर की तरह आठ दस लोग नहीं बल्कि अनगिनत जीव हैं मेरे परिवार में। सिर्फ़ वही जीव नहीं जिनको मैं जानता हूं, बल्कि रोज़ कोई ना कोई न‌ए मेहमान आते हैं जो मेरे परिवार का हिस्सा बन जाते हैं।”     

            मां-बाप भी अब उसकी ज़िद के आगे हार मान चुके थे। यूं ही वक्त बीत गया और सुंदर के 45 साल पूरे होते होते दोनों मां-बाप स्वर्ग सिधार गए। अब होने को तो सुन्दर दुनिया में अकेला हो गया था पर वह खुद को पूरी तरह कभी अकेला नहीं समझता था। उसके पास उसका भरा पूरा अनोखा परिवार समुद्र जो था। सुंदर अब और भी ज़्यादा अपने परिवार समुद्र के साथ समय बिताता था। समुद्र की लहरों को चीरता हुआ वह क‌ईं कदम आगे और क‌ईं गहरी गहराइयों में उसको और खोजता। 

एक दिन उसने थोड़ा आगे और गहराई में जाने का सोचा। अपना ध्यान रखते हुए वह गहराई में उतरने लगा। थोड़ा ज़्यादा गहराई में गया तो उसे लगा मानो कहीं से कुछ चमक सी आ रही है। चमक बहुत गहरी नहीं बल्कि बहुत ही धुंधली सी थी। रोशनी एक पतली सी लकीर की तरह आ रही थी मानो धूप की रोशनी ज़रा से खुले दरवाज़े से निकल के कमरे में आती है। समुद्र की उतनी गहराई में मामूली सी रोशनी ने भी सुंदर को सोचने पर मजबूर कर दिया, “इतनी गहराई में चमक कैसी है?” 

यह सोचता हुआ वह समझदारी से आगे जाता गया और उन सब पलों को एक फ़िल्म में उतारता चला गया। उसके पास एक खास कैमरा था। वह जब भी समुद्र की गहराई में जाता था तो उस कैमरे में वह अपने सारे काम को उतारता था और घर जाकर अपने कंप्यूटर में डाल देता था।

थोड़ा आगे जाने पर उसने देखा कि एक गुफ़ा के लिए रास्ता खुल रहा है। उसने पहली बार ऐसी कोई गुफ़ा देखी थी। वह उसकी तरफ़ चला तो चमक पतली धुंधली सी लकीर की जगह गहरी और फैलती जा रही थी। उसने पहले बाहर से झांका तो चमक और गहरी हो गई थी। गुफ़ा काफ़ी चौड़ी थी। चमक इतनी गहरी थी कि गुफ़ा के अंदर उसको वहां टॉर्च जलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। सुंदर उसके अंदर जाने लगा। आगे बढ़ते हुए उसको महसूस हुआ के गुफ़ा ऊपर की तरफ़ जा रही है। उसका अंदाज़ा बिल्कुल ठीक था। आगे जाकर वहां सीढ़ियां थीं, बहुत सारी। उसका दिमाग घूमने लगा कि वह रास्ता आखिर कहां खुलता होगा। हिम्मत करके वह सीढ़ियां चढ़ने लगा। जैसे ही वह आखरी सीढ़ी के करीब पहुंचा तो उसकी आंखें फटी रह गईं। 

वहां छोटा सा नहीं बल्कि बहुत बड़ा खज़ाना था। अनगिनत मोती, सोने एवं चांदी का सामान और कईं अनोखे चमकीले रंग-बिरंगे बेशकीमती पत्थर…उन कीमती चीज़ों को देखकर सोच में पड़ा ही था कि वो सब देखते देखते उसकी नज़र वहां एक दीवार पर पड़ती है। उस दीवार में एक थोड़ा बड़ा सा छेद था। सुंदर उसके पास गया तो वहां से उसको पंछियों की आवाज़ आती महसूस हुई।‌ उसने छेद से झांक कर देखा तो अचंभित रह गया। 

उसको ऐसा लगा कि वो दूसरी तरफ़ गांव का प्राचीन छोटा मंदिर देख रहा है जो न जाने कितने दशक से गुमनाम पड़ा था। वो कईं बार उस मंदिर के सामने से अपने बाबा के साथ निकला भी था। सुंदर वहां पड़े पत्थर से दीवार तोड़ने की कोशिश करता है तो वह आसानी से कुछ हद तक टूट जाती है। सुंदर उसी रास्ते से किसी तरह से बाहर निकलता है। उसका अनुमान सही था, वो गांव का प्राचीन मंदिर ही था। 

अगले दिन सुबह वह सरपंच को खबर करता है और उनकी मदद से पुरातन विभाग के दफ़्तर पहुंच कर सारी बात बताता है। सुंदर की खबर के बाद पुरातन विभाग अपना काम शुरू करता है। थोड़ी कागज़ी कार्रवाई और तोड़फोड़ के बाद खज़ाना बरामद किया जाता है। वो सारा खज़ाना सरकारी कोष में जमा कर दिया जाता है। 

             जब सुंदर को इनाम देने की बारी आई तो उसने मना कर दिया और कहा, “ माननीय अगर आप मुझे कुछ इनाम देना ही चाहते हैं तो कृप्या जो खज़ाना मिला है उसका कुछ अंश मंदिर के जीर्णोद्धार में लगाकर मंदिर को पहले की तरह पूजनीय स्थल बना दीजिए। यह हमारे पूर्वजों के धरोहर है।” 

सुंदर की बात का सरकार को बहुत पसंद आई। उन्होंने सिर्फ़ समर्थन ही नहीं करा बल्कि उसको वहां का अभीक्षक बना दिए जाने की घोषणा भी करी। आखिरकार मंदिर का पुनर्निर्माण का कार्यक्रम शुरू हुआ। वहां सुंदर और कुछ पुजारियों के रहने के लिए कमरे भी बनवाए गए। 

अब सुंदर 62 साल का है लेकिन अकेला नहीं। उसकी समुद्र के लिए बेपनाह मोहब्बत ने उसको एक और घर दिया, प्राचीन मंदिर। वहां पर सारा दिन भगवान की शरण में सुन्दर लोगों से घिरा रहता। उसका पहला घर समुद्र, मंदिर के पास था। 

अब उम्र के चलते वह समुद्र की गहराइयों में तो नहीं जाता था पर आज भी वक्त मिलने पर उसकी लहरों से पहले की तरह बातें करता और खेल करता। उसकी सच्ची बेपनाह मोहब्बत ने उसे आखिरी वक्त में इज़्ज़त और लोगों का भरपूर साथ दिया।