Motivational Story in Hindi: शुभम बारहवीं कक्षा का छात्र था। एक आम से परिवार का इकलौता बेटा था और एक आम से स्कूल में पढ़ता था। एक साधारण से परिवार का बेटा होने के बावजूद उसके अंदर पैसों की कोई अहमियत नहीं थी; साथ ही ना वो दूसरों का सम्मान करता था। कर्तव्यप्रायणता उसमें रत्ती भर नहीं थी। बेटा होने के नाते ना तो मां-बाप की कभी किसी काम में मदद करता ना स्कूल में शिक्षकों के लिए आदर था। प्रभु ने उसे जितना अच्छा दिमाग दिया था उतनी ही कम उसके अंदर अपने कर्तव्य के लिए समझ थी।
स्कूल में शिक्षकों की बात का अनादर करना या कभी तो चिढ़ का जवाब देना उसकी आदत सी बन गई थी। समय पर कभी काम नहीं करता था और डांटने पर उल्टा जवाब दिया करता था।
सबसे ज़्यादा जो उसका खराब स्वभाव था वह था छोटे कर्मचारियों की तरफ़। गेट पर खड़े देशराज गार्ड का तो वह हमेशा अनादर करता। हर समय किसी न किसी बात पर झिड़क देता, “तुम्हें काम ही क्या है। सारा दिन बस खड़े रहते हो…दरवाज़ा तो पूरा खोला करो ना, एक तरफ़ साईड में खड़े हो जाओ…।” बाकी गार्ड तो पलट कर अपनी बात कह भी देते थे पर देशराज उसको प्यार से समझाते, “ शुभम बेटा तुम एक बहुत होशियार और अच्छे बच्चे हो। बस सब की तरफ़ तुम्हारा क्या कर्तव्य है उसको समझ जाओ तो एक चमकता हीरा हो।” वो चिढ़ कर कहता, “ ज़्यादा ज्ञान देने की ज़रूरत नहीं है।”
एक दिन जब देशराज काका उसको समझा रहे थे वह ज़ोर से तुनक कर बोला। देशराज ने जब प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसने झटके से उनका हाथ हटा दिया। शुभम ने इतनी ज़ोर से हाथ को धक्का दिया कि पास में रखी चाय का कप देशराज काका पर गिर गया। प्रभु कृपा से चाय उतनी गर्म नहीं थी पर काका को थोड़ी जलन तो हुई और उससे कहीं ज़्यादा उनकी वर्दी खराब हो गई। प्रिंसिपल मैडम ने शुभम को डांट लगाई और उसके बुरे व्यवहार के लिए उसके माता-पिता को फ़ोन मिलाने लगीं, तो देशराज ने उन्हें रोक दिया, “ कोई नहीं मैडम जी, बच्चा है। जाने दीजिए।” बात आई गई हो गई।
दो दिन बाद से दस दिनों की स्कूल की छुट्टियां थीं। ग्यारहवें दिन जब स्कूल खुला तो मानो एक बिल्कुल नई शुरुआत थी। आज शुभम समय से उठ कर स्कूल के लिए निकल पड़ा था। स्कूल के गेट पर खड़े गार्ड को मुस्कुरा कर देखा। वहां बाकी के पुराने गार्ड के साथ एक नया गार्ड था देशराज काका की जगह।
शुभम अब कक्षा में मन लगाकर पढ़ाई करने लगा था। समय पर काम करना, शिक्षकों की बात को आदर से सुनना और मानने लगा था। सही मायने में वो अपने कर्तव्यों को समझने लगा था। अचानक से उस बदलाव से सबको बहुत आश्चर्य हुआ था पर मां-बाप और शिक्षकों को खुशी भी बहुत थी।
स्कूल के इम्तहान में उत्तीर्ण होकर बच्चे अपनी मंजिल की तलाश में निकल जाते हैं। कुछ वर्ष यूं ही बीत जाते हैं और आज शुभम अपने स्कूल की सभागार के स्टेज पर खड़ा था।
अब वह एक आईएएस ऑफिसर बन चुका था और आज उसे प्रेरक भाषण देने के लिए बुलाया गया था। शुभम अपनी बात कहता है, “प्रेरक भाषण मैं क्या दे सकता हूं!! वही कहूंगा जो एक दिन मुझसे किसी ने कहा था और पूरे जीवन के लिए प्रेरित कर दिया था। उसके लिए आपको एक कहानी सुनाता हूं जिसने मुझे पूरा बदल दिया। स्कूल की छुट्टियां शुरू होने के बाद एक रात मैं घर की तरफ़ जा रहा था तो गली में दूसरे स्कूल के कुछ लड़कों ने मुझे पकड़ लिया और धमकाकर मारने लगे। कुछ दिनों पहले मेरा उनसे झगड़ा हुआ था किसी बात पर और सच कहूं तो करीब करीब सारी गलती मेरी ही थी। जैसे ही उन्होंने मुझे मारना शुरू किया कि वह बुज़ुर्ग मेरे रक्षक बनकर आए। उन्होंने पास में पड़े डंडे को उठाकर उन लड़कों को धमकाया। एक लड़का मौका देख मुझे मारने ही वाला था कि उसका डंडा उनके पैर पर लगा और वह दर्द से कराह कर गिर पड़े। तभी उन लड़कों में से एक ने मेरे सर पर मारा। वह बुज़ुर्ग रक्षक किसी तरह उठे और गरजती आवाज़ में उन लड़कों को धमकाया, “ अब किसी ने भी हाथ उठाया तो मैं नहीं छोडूंगा।” शायद उनकी हिम्मत भरी आवाज़ को सुनकर वह लड़के वहां से चले गए या शायद वो लड़के मुझसे ज़्यादा तमीज़दार थे कि उन्हें उनकी बड़ी उम्र का लिहाज़ था।
सर पर चोट की वजह से मुझे चक्कर आने लगे थे। उन्होंने एक ऑटो को रोका और मुझे अस्पताल लेकर गए। वहां उन्होंने अपने पैसों से मेरी मरहम पट्टी कराई और वापस घर छोड़ा। छोड़ते वक्त मैंने जब पूछा कि मेरे इतने बुरे व्यवहार का उन्होंने ऐसा सकारात्मक बदला क्यों दिया तो उन्होंने कहा था, “कर्तव्य बेटा! तुम्हारी हिफ़ाज़त मेरा कर्तव्य है। स्कूल में तो है ही लेकिन तुम सब मेरे बच्चे हो और मैं हमेशा ही ऐसा समझता हूं तुम सब की तरफ़। फ़िर एक इंसान होने के नाते भी मेरा फ़र्ज़ है कि मैं किसी के काम आ सकूं। मानो तो बेटा मैं अपना कैसा भी कर्तव्य पूरा करना एक तरह से देश सेवा ही समझता हूं।” “ मैं क्या कर सकता हूं आपके लिए” मैंने उनसे पूछा।
उन्होंने बस इतना कहा, “अगर दिल से कुछ करना ही चाहते हो तो एक शिष्य का और एक पुत्र का अपना कर्तव्य पूरा करो। पढ़ो लिखो और ऊंचा पद हासिल करके उन सब का नाम रोशन करो; फिर ईमानदारी से अपने पद को संभाल कर देश के लिए अपना कर्तव्य पूरा करना।” कहानी पूरी करते करते शुभम की आंखें नम हो गईं।
“मैं आज अपने असाधारण शिक्षक से आप सबको मिलाता हूं। देशराज काका यहां आइए।”
देशराज बहते आंसुओं के साथ बैसाखी संभालते हुए आगे बढ़ते हैं। “उस दिन के बाद से काका का पैर बेकार हो गया था जिसकी वजह से उनकी नौकरी चली गई थी। तब से मेरा परिवार उनके साथ है।” बोलते हुए शुभम सीढ़ियों से उतरता हुआ देशराज काका की तरफ़ हाथ बढ़ाता है।
