mera beta ramani
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

(अम्मा भारत के गोले बनाकर खिड़की से मुझे दे रही हैं और मैं लपक कर खा रहा हूं। भैया यह सब घूर कर देख रहे हैं। उसी समय बड़े भैया अंदर आ जाते हैं)

वसंत कॉलोनी में 30 मकान है। दो कमरों का हमारा घर तीसरा है। एक बेडरूम में छोटे भैया और भाभी, दूसरे में मैं और अम्मा। इस कॉलोनी का मैं हीरो हुआ करता था, पर अब तो यह अतीत की बात है।

मेरे साहब थोड़ा-सा आगे आकर देखो, वहां जो लड़की नीला लेटी हुई पढ़ रही है…. उसकी मेज पर कभी मेरी तस्वीर हुआ करती थी, पर अब उस जगह रितिक रोशन का फोटो लगा हुआ है। मुझे तो वह बिलकुल भूल गई। पहले उसकी डायरी में हर जगह मेरा ही नाम लिखा हुआ था। एमटीवी के वीजे को देखकर कहते नहीं थकती थी, ‘देखो बिल्कुल तुम्हारे जैसे लगता है।’

अरे एक ऑटो आ रहा है। बिलकुल घर के सामने रूका है। अरे….. इसमें से तो बड़े भैया उतरे हैं। जो भाई दस साल से नहीं आए थे, आज आए हैं। कान के पास कुछ सफेद बाल दिखाई दे रहे हैं। पर ज्यादा बदलाव नहीं आया है। हमेशा जैसे दंभ से भरा हुआ कठोर चेहरा। उतरने के बाद ड्राइवर से किराया पूछते हैं। ड्राइवर ने साढ़े 35 बताएं तो उस पर भी बिगड़ने लगे।

कहने लगे, ‘तुम्हारी कहानी मैं अच्छे से जानता हूं। यही शहर है जहां ऑटो वाले दबंग हो रहे हैं। सुबह-सुबह मूड खराब मत करो।’ लापरवाही से उसे गिन कर 25 दिए और ड्राइवर के बड़बड़ाने की परवाह किए बिना ही अंदर चले गए। बेचारा ड्राइवर गिड़गिड़ाता ही रह गया। बड़े भैया को देखकर छोटे भैया घबराकर तेजी से बाहर आए, कहने लगे, ‘आओ भैया, आओ….. इतनी जल्दी आ जाओगे, सोचा नहीं था।’ छोटे भैया उनको अंदर लिवा ले गए।

बड़े भैया जोर-जोर से कह रहे हैं, ‘जो अपना धंधा करते हैं, उनकी परेशानियां वही जानते हैं। कोई सरकारी नौकरी थोड़े ही है कि सीएल ले लो, पीएल ले लो या मेडिकल।’ कहते हुए वो बाथरूम चले गए। मैं खिड़की से छोटे भैया का डरा हुआ चेहरा देखता हूं। कितना डरते हैं भैया, बड़े भैया से। थोड़ी देर बाद भैया आ जाते हैं तो छोटे भैया से कहते हैं, ‘अभी तो सो रही है अम्मा।’

‘फिलहाल तो ठीक है, पिछले हफ्ते तो बहुत ही हंगामा हो गया था।’ भाभी बोली। बड़े भैया अम्मा के कमरे का दरवाजा खोलते हैं। मैंने कमरे की खिड़की से देखा, अम्मा गहरी नींद सो रही हैं।

‘डॉक्टर क्या कह रहें हैं?’

‘कोई साइक्लोजिकल प्रॉब्लम बता रहे हैं। कुछ दिन लगेंगे।’

‘फिर थोड़ा वेट कर लेते हैं।’

‘डर लगता है भैया! बिलकुल भी खाना नहीं खाती।’

‘सोते ही रहेंगी तो कैसे लगेगी भूख?’

‘नहीं भैया, डॉक्टर कहते हैं कि कोई बड़ा सदमा या दुख से लोगों को ऐसा हो जाता है।’

‘नाश्ता तैयार है।’ भाभी बोली।

‘वह अपने आप उठेगी या उठाना पड़ेगा।’ बड़े भैया पूछते हैं।

“ठीक साढ़े दस बजे उठेगी और ग्यारह बजे ही उनका नाटक शुरू। छोटे भैया ने कहा।

‘अभी साढ़े आठ बजे हैं। मैं कुछ देर में आ रहा हूं।’ कहकर बड़े भैया बाहर चले जाते हैं।

ठीक साढ़े बजे अम्मा उठी। घड़ी को देखकर रसोई की तरफ भागी। छोटे भैया और भाभी एक-दूसरे को देखने लगे। ‘बहू कुकर में दाल चढ़ा दी क्या?’

‘नहीं अम्मा, दोपहर को ही तो खानी है। क्या जल्दी है।’

‘देर हो गई।’ कहकर अम्मा कांपते हाथों से दाल चढ़ाती है।

‘बड़े भैया आ गए हैं, तुम्हें पता है?’

‘वह नहीं रे…. अपना रमणी….।’ इतना कहकर अम्मा ने गैस जला दी। वह बार-बार खिड़की की ओर देख रही हैं। मक्खन को गर्म करने के लिए दूसरी गैस पर चढ़ा देती हैं। अम्मा पीछे का दरवाजा खोलने का प्रयास करती हैं।

‘क्या चाहिए तुम्हें अम्मा?’ भैया चिल्लाते हैं।

‘सहजन के पत्ते, घी में डालकर गर्म करना है।’

‘तुम ठहरो मैं ला कर देता हूं।’ कहकर भैया पत्ते लाने बाहर चले गए। अम्मा कुकर उतारकर खोलने लगती हैं।

‘अम्मा कुकर गर्म हैं, हाथ जल जाएगा।’ पर अम्मा पर कोई असर नहीं होता। वह दो-तीन बड़े चम्मच भात लेकर उसमें खूब घी मिलाने लगी। यह सब देख कर तो मेरी भूख और भी बढ़ गई। अम्मा को पता है कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। कॉलेज के दिनों में भी मैं तो भूख से रोने लग जाता था।

अम्मा भात के गोले बना बना कर खिड़की से मुझे दे रही हैं और मैं लपक कर खा रहा हूं। भैया यह सब घूर कर देख रहे हैं। उसी समय बड़े भैया अंदर आ जाते हैं।

‘देखा…. इसीलिए आपको यहां आने को बोला था।’ छोटे भैया ने कहा।

‘अम्मा’ बड़े भैय्या जोर से चिल्लाते हैं। पर अम्मा का पूरा ध्यान सहजन से पत्तों पर भात मिलाने में ही है। भैया दोबारा चिल्लाते हैं।

मैं खिड़की से यह सब देख रहा हूं।

‘क्यों अम्मा…. क्या पागल हो गई हो? कौआ को भात देना बुरा नहीं, पर तुम्हें तो यह भी ख्याल नहीं कि मैं आया हूं।’ इतना कहकर भैया थाली को खींचने की कोशिश करने लगे। इसी कोशिश में अम्मा के हाथ से गोला गिर जाता है। मैं थोड़ी दूर से यह सब देखने लगता हूं। अम्मा थाली को छीनने की कोशिश करती हैं। मगर भैया हाथ को ऊपर कर लेते हैं।

‘तुम सब क्यों गुस्सा कर रहे हो? मुझे दाल-भात तो दो, अपने रमणी को खिलाना है। वह देख अपना रमणी।’ अम्मा मेरी ओर इशारा करते हुए कहती है।

‘वह कहां है अम्मा…’ भैया गुस्से से चिल्लाते हैं।

यह सुनकर अम्मा जोर-जोर से रोने लगती हैं।

‘जब वह डेढ़ साल का था, तभी से ऐसा ही है। जब मैं हाथ में भात का गोला रख आंख बंद करके कहती कि अब मेरा कौआ आकर इसको ले जाएगा तो वह मेरी आंख खोलने से पहले ही वह आता और भात का गोला ले जाता। यह बिलकुल वो ही है।’ अम्मा गिड़गिड़ाते हुए कहती हैं।

‘कोई भी जानवर एक निश्चित समय तक खाना देने पर रोज उसी समय आने लगेगा। जंगली, गंवारों जैसी सोच….’ इतना कहकर बड़े भैया अम्मा को खींचकर एक स्टूल पर बैठा देते हैं। उस कठोर बंधन से अम्मा छूट नहीं पाती।

‘उसे भूख लगी है….. उसके भूख का समय है। उसे भूख सहन नहीं होती।’ अम्मा रोते हुए कहती है।

‘अभी वैन आ ही रही होगी। एक महीना अस्पताल में रहने दो। फीस मैं भर दूंगा।’ बड़े भैया कहते हैं।

‘सब जान-बूझ कर करती है बाकी काम तो ठीक-ठाक करती है।’ भाभी बोलती हैं।

बड़े भैया थाली लेकर बाहर फेंकने जा रहे हैं कि तभी ना जाने उस बूढ़े शरीर में कहां से इतनी जान आ गई कि उसने तेजी से आकर भैया से थाली छीन ली। भैया गुस्से से पागल ही हो गए। जोर से उन्होंने अम्मा को एक चांटा लगाया। अम्मा रसोई की चौखट पर गिर गई। उनके माथे से खून बहने लगा। भाभी दौड़ कर गीला कपड़ा लाई और खून को रोकने का प्रयत्न करने लगी।

‘दर्द हो रहा है अम्मा?’ छोटे भैया पूछते हैं, पर अम्मा का पूरा ध्यान तो खिड़की पर लगा है। वो उन सब से बेखबर बड़बड़ाती रहती है। ‘बेचारा…. अपने ही नहीं डालेंगे तो कौन डालेगा?’

बड़े भैया का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ है। उन्होंने भात को बाहर फेंक दिया। ‘कौआ अपने आप खाएगा देखना’

मुझे जोर से भूख लग रही है, पर अम्मा के सिर से खून बह रहा है। पापी कहीं के।

‘वो देखो… नीचे वाला तो उसने नहीं खाया।’ अम्मा कहती है। तभी बाहर एक वैन आकर रूकती है। उसमें से तीन आदमी अंदर आते हैं।

‘अम्मा चलो, अस्पताल चलते हैं।’ छोटे भैया अम्मा को उठाना चाहते हैं, पर वह दरवाजे को जोर से पकड़ लेती हैं।

‘नहीं….. नहीं जाना। मेरे बेटे को खाना देना है।…. बेचारा…. भूखा है।’

बड़े भैया अम्मा का हाथ बहुत ही बेरहमी से खींचते हैं। ऐसा लगता है, हाथ टूट जाएगा। पर अम्मा को तो दर्द जैसे महसूस ही नहीं हो रहा।

‘साहब आप रहने दीजिए, हम देख लेंगे।’ एक आदमी कहता है। इतने में अम्मा के हाथ में इंजेक्शन लगा दिया जाता है और अम्मा बेहोश हो जाती हैं। फिर भी कुछ धीरे-धीरे बड़बड़ाती रहती है। वैन उसे लेकर चली गई। मैं आम के पेड़ पर जाकर बैठ जाता है। न जाने अब अम्मा कब लौटेंगी। उसके आने तक मैं खाना नहीं खाऊंगा।

टिप्पणी- दक्षिण भारत में खाना बनाकर भगवान को भोग लगाते हैं। उसके बाद चावल के ऊपर दाल और घी डालकर उस भात का गोला बनाकर कौए को खिलाया जाता है। उसके बाद ही सब लोग खाना खाते हैं। यह रोज का नियम है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’