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कभी-कभी संस्कारों की इस पाठशाला में वे इतनी सख्ती अपनाते हैं कि यह रास्ता बच्चों के लिए मुश्किलों भरा हो जाता है। ज्यादा सख्ती के कारण बच्चे उन्हें दुश्मन मानने लगते हैं। यह स्थिति कहलाती है 'टाइगर पेरेंटिंग'।
Tiger Parenting Negative Effects: दसवीं के बाद बच्चे को कौनसा सब्जेक्ट लेना है, कौनसा स्पोर्ट्स खेलना चाहिए, करियर क्या बनाना है…ऐसे सभी निर्णय अक्सर बच्चों के लिए पेरेंट्स लेते हैं। लेकिन कई बार इसमें उनकी सहमति लेना भूल जाते हैं। दरअसल, हर माता पिता का यही सपना होता है कि उसका बच्चे हमेशा जिंदगी की ऊंचाइयों को छुए। वह अनुशासन और संस्कारों को साथ लेकर चले। कभी सफलत नहीं हो। ऐसे में वे बच्चों को बचपन से ही इसकी सीख देने लगते हैं। लेकिन कभी कभी संस्कारों की इस पाठशाला में वे इतनी सख्ती अपनाते हैं कि यह रास्ता बच्चों के लिए मुश्किलों भरा हो जाता है। ज्यादा सख्ती के कारण बच्चे उन्हें दुश्मन मानने लगते हैं। यह स्थिति कहलाती है ‘टाइगर पेरेंटिंग’। इस पेरेंटिंग को पेरेंट्स भले ही बच्चों के लिए अच्छा मानें, लेकिन असल में इससे बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर गहरा नकारात्मक असर पड़ता है। कई बार बच्चे पेरेंट्स के प्रति बगावती तक होने लगते हैं। उन्हें माता-पिता की सही बात भी गलत लगने लगती है। ऐसे में हर पेरेंट्स के लिए यह जरूरी है कि वे जानें कि कहीं वे सख्ती के दायरे को पार करके टाइगर पेरेंटिंग के रास्ते पर तो नहीं चल पड़े हैं।
जानिए आखिर क्या है टाइगर पेरेंटिंग ?

टाइगर पेरेंटिंग एक ऐसी पेरेंटिंग स्टाइल है, जिसमें पेरेंट्स अपने बच्चों को कठोर अनुशासन में रखते हैं। वह बच्चों के हर छोटे-बड़े फैसले पर नियंत्रण रखते हैं और उन पर लगातार हुक्म चलाते रहते हैं। इससे बच्चों की स्वतंत्र सोच और निर्णय लेने की क्षमता में कमी आती है। उन्हें हमेशा अपने पेरेंट्स की इच्छाओं के अनुसार काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।
कहीं आप तो नहीं कर रहे टाइगर पेरेंटिंग
कई माता-पिता यह नहीं समझ पाते कि उनका व्यवहार बच्चे के मानसिक विकास पर कितना गहरा नकारात्मक असर डाल रहा है। यदि बच्चे का हर फैसला आप खुद ही ले रहे हैं तो अनजाने में टाइगर पेरेंटिंग के शिकार हो सकते हैं। बच्चे की सोच को दबाना, उन पर अपने फैसले थोपना, किसी भी काम के लिए उन्हें प्रेशर करना, उनकी पसंद को नजरअंदाज करना आदि टाइगर पेरेंटिंग के लक्षण हो सकते हैं। अधिकांश पेरेंट्स मानते हैं कि अगर वे बच्चे को कठोर अनुशासन में पालेंगे तो बच्चे जीवन में ज्यादा सफल होंगे। वे पढ़ाई में आगे रहेंगे, खेलों में सफल होंगे और करियर भी अच्छा बना पाएंगे। क्योंकि इन सबके लिए अनुशासन जरूरी है। लेकिन इस सोच से उल्ट शोध बताते हैं कि ज्यादा सख्ती का बच्चों की मानसिकता पर गहरा असर पड़ता है। वे हमेशा मानसिक दबाव महसूस करते हैं, जिसके कारण वे तनाव और चिंता में रहते हैं। उनके आत्मविश्वास में कमी आने लगती है। अगर वे किसी क्षेत्र में असफल होते हैं तो पेरेंट्स के सामने जाने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं और अंदर से टूट जाते हैं।
अपनाएं परवरिश का सही तरीका
पेरेंट्स को समझना होगा कि बच्चों की सही परवरिश का मतलब सिर्फ सख्त अनुशासन नहीं है। बच्चों को प्यार, सपोर्ट और सही राह दिखाने की जरूरत होती है। यह पेरेंट्स और बच्चों का साझा सफर है, जिसमें बच्चों को भी अपनी भावनाएं रखने का पूरा मौका देना चाहिए। पेरेंट्स को बच्चों के फैसलों का सम्मान करना चाहिए। बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हें अपनी पसंद का रास्ता चुनने की स्वतंत्रता देना और उनकी छोटी-छोटी सफलताओं को सराहना बहुत जरूरी है। बच्चों को गलतियों से सीखने का मौका दें। इससे उन्हें जीवन के संघर्षों का सामना करना आ सके। उन्हें परिवार में इतना सहज माहौल दें कि वे खुलकर अपनी बातें आपको बता पाएं।
