Short Story in Hindi: जैसा कि सर्वविदित है कि नवरात्रि में अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन कर ,कन्याओं को भोजन कराया जाता है । ये सिर्फ एक परंपरा ही नहीं वरन् हर स्त्री के बाल जीवन की एक अनूठी याद भी है । ऐसी ही एक मधुर याद, मेरे बाल जीवन से भी जुड़ी है ।
दरअसल हम जिस मोहल्ले में रहते थे, वहाँ अधिकांश ब्राह्मण परिवार ही रहते थे । मैं अग्रवाल परिवार की कन्या थी । शायद ब्राह्मण कन्याओं को प्राथमिकता दी जाती होगी ,इसलिए लोग मुझे कन्या पूजन में नहीं बुलाते थे । मेरा बाल मन बहुत आहत होता था कि कोई मुझे कन्याओं में नहीं बुलाता है ।
एक बार नवरात्रि में हमारे पड़ोस की आंटी ने मुझे कन्याओं में बुलाया । मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । मैं सुबह ही नहा धोकर तैयार हो गई । उनके घर पहुँची ,तो उन्होंने बड़े प्यार से भोजन कराया, साथ ही एक फ्रॉक का कपड़ा भी दिया । वो फ्रॉक का कपड़ा, मेरे लिए मेरे सारे कपड़ों से ज़्यादा क़ीमती था ।उसका प्रिंट आज भी मेरे ज़ेहन में जीवित है ।
खाना खाकर, फ्रॉक का कपड़ा हाथ में लेकर ,मैं चहकती हुई अपने घर आई । मैंने अपनी दादी और मम्मी को वो कपड़ा दिखाया । मेरी दादी ने कहा कि उन्होंने सभी जाति की कन्याओं को भोजन करवाया है ,इसलिए तुझे बुलाया है । मेरा बालमन, पहली बार हुए कन्या भोजन की ख़ुशी में झूम रहा था । साथ ही सौगात में मिले कपड़े को देखकर बार- बार खुश हो रहा था ।
आज जब भी मैं उस ख़ुशी को याद करती हूँ तो मुस्कुराए बिना नहीं रह पाती हूँ, साथ ही ख़्याल भी रखती हूँ कन्या तो कन्या होती है वो जाति से निर्धारित नहीं होती । इसलिए मैं अपने कामवालों के और बाहर आए बच्चों का विशेष ध्यान रखती हूँ ।

