Taai ka Kanya Pujan
Taai ka Kanya Pujan

Short Story: आज इतने वर्षों के बीत जानें के बाद भी अपने बचपन के दिनों के ‘कन्या पूजन’ को याद कर के मन प्रफुल्लित और हर्षित हो उठता है।
दरअसल यह उस समय कि बात है जब मैं सात साल की थी ,मेरी बड़ी मां जिनको हम सभी बच्चे ‘ताई जी ‘बोलते थे उन्होंने नवरात्र में नौ दिनों का व्रत किया था और ताई जी को नौ कन्याओं के पूजन द्वारा ही व्रत का समापन करना था।
ताई जी के अति कंजूस स्वभाव से हम सभी बच्चे परिचित थे ।
इसलिए बच्चों के उत्साह में कमी लग रही थी।
जैसे ही कन्या पूजन का दिन आया ताई जी ने सभी बच्चों को अपने घर बुलाया। एक तो उनका कंजूस स्वभाव उसपर से नौ की जगह दस कन्याएं पहुंच गई थी।
संयोग से एक छोटी बच्ची भी अपने बहन के साथ आई और एक वाक्या और ये हो गया कि एक छोटी बच्ची रोने लगी कि मेरी मम्मी को बुलाया जाए क्योंकि वो अपनी मम्मी के हाथों से ही खाना खाती थी चार वर्ष की बच्ची को समझाया जाना मुश्किल था वो तो जिद पकड़ कर रोए ही जा रही थी।
बेहद कंजूस ताई जी ने किस प्रकार नौ बच्चों को खिलाने का सोचकर हलवा पूड़ी और चने बनाए थे और सबको देते समय वो ये भी ध्यान रखें जा रही थी कि कोई ज्यादा तो नहीं ले रहा है थाली में छोड़ तो नहीं रहा इसलिए वो बराबर सभी बच्चों को बोले जा रही थी “देशी घी की पूड़ी बनी है हलवा में काजू बादाम डाला है कोई थाली में छोड़ दिया तो अच्छा नहीं होगा” उनको सभी पकवानों में लगे पैसों की जितनी चिंता थी उसपर से उस रोती हुई बच्ची के मां को भी बुलाना पड़ा और समस्या यही खत्म नहीं हुई उस बच्ची की मां अपने एक बेटे को लेकर आ गई।अब तो ताई जी का चेहरा देखने लायक था, मैं ताई को मुंह देखकर लगातार हंसे जा रही थी मुझे भी उस समय ये समझ नहीं थी कि कन्या पूजन में चुप होकर प्रसाद खाऊं।
चूंकि वो मेरी ताई थी इसलिए बाहरी बच्चों को कुछ न कहकर मुझे ही अपना गुस्सा दिखाने लगी “बैठो चुपचाप क्यों इतना हंस रही हो” उनका कंजूस नेचर सोचकर मेरी हंसी बंद नहीं हो रही थी।
आज भी नवरात्र में कन्या पूजन करने का सोचती हूं तो बचपन वाला वो कन्या पूजन सोचकर ही हंसी आती है।

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